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    Home » लखनऊ अग्निकांड: कब जागेगा तंत्र, सुधारों की क्यों दरकार?
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    लखनऊ अग्निकांड: कब जागेगा तंत्र, सुधारों की क्यों दरकार?

    Nikunj GuptaBy Nikunj GuptaJune 23, 2026No Comments7 Mins Read
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    लखनऊ अग्निकांड
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    लेखक: ललित गर्ग

    उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के अलीगंज क्षेत्र में एक व्यावसायिक भवन में लगी भीषण आग ने केवल एक इमारत को नहीं जलाया, बल्कि शासन-प्रशासन की संवेदनहीनता, नियामक संस्थाओं की निष्क्रियता और व्यवस्था की खोखली पड़ चुकी जवाबदेही को भी उजागर कर दिया है। इस दुर्घटना में कोचिंग सेंटर के अनेक विद्यार्थियों की असामयिक मृत्यु ने पूरे देश को झकझोर दिया है। यह केवल एक हादसा नहीं, बल्कि उस सड़ी-गली व्यवस्था का परिणाम है, जो हर त्रासदी के बाद कुछ दिनों तक सक्रिय दिखती है और फिर गहरी नींद में सो जाती है। राजकोट के गेमिंग जोन में आग, दिल्ली के शिशु अस्पताल में नवजातों की मौत, दिल्ली के होटल अग्निकांड, मुजफ्फरपुर अस्पताल की दुर्घटना और अब लखनऊ का अग्निकांड-इन घटनाओं की श्रृंखला बताती है कि भारत में मानव जीवन का मूल्य लगातार घटता जा रहा है। हर बार वही बयान सुनाई देता है-‘दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा’, ‘जांच के आदेश दे दिए गए हैं’, ‘कड़ी कार्रवाई होगी’। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या जांच और मुआवजा ही शासन का अंतिम दायित्व है? क्या सरकारें केवल दुर्घटना के बाद शोक व्यक्त करने और मुआवजा बांटने के लिए हैं? इन जहरीली काली आग ने कितने ही परिवारों के घर के चिराग बुझा दिए। कितनी ही आंखों की रोशनी छीन ली और एक कालिख पोत दी कानून और व्यवस्था के कर्णधारों के मुँह पर।

    लखनऊ अग्निकांड: सुरक्षा मानकों पर गंभीर सवाल

    लखनऊ की जिस इमारत में आग लगी, वहां कोचिंग सेंटर और अन्य व्यावसायिक गतिविधियां संचालित हो रही थीं। यह अत्यंत गंभीर प्रश्न है कि क्या उस भवन को अग्निशमन विभाग से अनापत्ति प्रमाण पत्र (एनओसी) प्राप्त था? क्या भवन निर्माण मानकों का पालन किया गया था? क्या वहां आपातकालीन निकास मार्ग उपलब्ध थे? यदि थे, तो वे उपयोग में क्यों नहीं आए? और यदि नहीं थे, तो इतने लंबे समय तक प्रशासन की नजर इस पर क्यों नहीं पड़ी? यह केवल भवन स्वामी की लापरवाही नहीं है। यदि कोई व्यावसायिक संस्थान नियमों की अनदेखी करते हुए वर्षों तक संचालित होता रहता है, तो स्पष्ट है कि कहीं न कहीं प्रशासनिक तंत्र की मौन सहमति या भ्रष्ट गठजोड़ सक्रिय है। आखिर नगर निगम, विकास प्राधिकरण, अग्निशमन विभाग और स्थानीय प्रशासन की जिम्मेदारी क्या है? क्या उनका कार्य केवल लाइसेंस जारी करना और औपचारिक निरीक्षण करना भर रह गया है? या कमियों को ढंकते हुए अपनी जैबें गर्म करते रहना है?

    देशभर में सार्वजनिक सुरक्षा की दयनीय स्थिति

    वास्तविकता यह है कि देश के अधिकांश शहरों में सार्वजनिक सुरक्षा भगवान भरोसे है। ऊंची-ऊंची इमारतें खड़ी हो रही हैं, लेकिन उनमें सुरक्षा मानकों की स्थिति अत्यंत चिंताजनक है। बहुमंजिला भवनों में अक्सर एक ही प्रवेश एवं निकास मार्ग होता है। अग्निशमन उपकरण या तो अनुपस्थित होते हैं या वर्षों से निष्क्रिय पड़े रहते हैं। आपदा प्रबंधन की कोई नियमित मॉक ड्रिल नहीं होती। भवनों में क्षमता से अधिक लोगों को प्रवेश दिया जाता है। नियम पुस्तकों में सुरक्षा व्यवस्था भले मौजूद हो, लेकिन जमीन पर उसकी स्थिति नगण्य है। इस विडम्बना का सबसे दुखद पक्ष यह है कि हर बड़ी दुर्घटना के बाद जांच समितियां गठित होती हैं, रिपोर्टें तैयार होती हैं, लेकिन उन रिपोर्टों पर अमल नहीं होता। उपहार सिनेमा अग्निकांड से लेकर राजकोट और लखनऊ तक, देश ने अनेक त्रासदियों से सबक लेने की बात कही, परंतु व्यवस्था ने कुछ नहीं सीखा। प्रशासन की स्मृति अत्यंत अल्पकालिक हो चुकी है। कुछ दिनों तक छापेमारी, निरीक्षण और नोटिस जारी करने का नाटक चलता है और फिर सब कुछ पहले जैसा हो जाता है।

    भ्रष्टाचार और नैतिक पतन: सुरक्षा व्यवस्था की जड़ें

    यह स्थिति केवल प्रशासनिक अक्षमता की नहीं, बल्कि नैतिक पतन की भी है। भ्रष्टाचार ने सुरक्षा व्यवस्था की आत्मा को खोखला कर दिया है। निरीक्षण करने वाले अधिकारी सुविधा शुल्क लेकर आंखें मूंद लेते हैं। भवन स्वामी अधिक लाभ कमाने के लिए सुरक्षा उपायों की उपेक्षा करते हैं। परिणामस्वरूप निर्दोष नागरिक अपनी जान गंवाते हैं। प्रश्न यह भी है कि क्या हमारे शहरों का विकास मानव-केंद्रित है? हम स्मार्ट सिटी, मेट्रो सिटी और विश्वस्तरीय शहरों के निर्माण की बात करते हैं, लेकिन यदि नागरिक सुरक्षित नहीं हैं, तो ऐसे विकास का क्या अर्थ है? किसी भी सभ्य समाज की पहली पहचान उसके नागरिकों की सुरक्षा होती है। यदि एक कोचिंग संस्थान, अस्पताल, होटल या मॉल भी सुरक्षित नहीं है, तो हमें अपने विकास मॉडल पर पुनर्विचार करना होगा। आज आवश्यकता केवल दोष निर्धारण की नहीं, बल्कि व्यापक संरचनात्मक सुधारों की है।

    लखनऊ अग्निकांड

    आवश्यकता है व्यापक संरचनात्मक सुधारों की

    सबसे पहले देशभर में सभी व्यावसायिक भवनों, कोचिंग संस्थानों, अस्पतालों, मॉल, होटल और सार्वजनिक स्थलों का स्वतंत्र सुरक्षा ऑडिट कराया जाना चाहिए। जिन संस्थानों के पास अग्नि सुरक्षा प्रमाणपत्र नहीं हैं या जो मानकों का पालन नहीं करते, उन्हें तत्काल बंद किया जाना चाहिए। दूसरे, अग्निशमन विभाग को आधुनिक संसाधनों और पर्याप्त मानवबल से सुसज्जित करना होगा। अनेक रिपोर्टों के अनुसार देश में फायर स्टेशनों और प्रशिक्षित फायर कर्मियों की भारी कमी है। तेजी से बढ़ते शहरीकरण के अनुरूप अग्निशमन सेवाओं का विस्तार अत्यंत आवश्यक है। तीसरे, प्रत्येक सार्वजनिक भवन में हर छह माह में अनिवार्य मॉक ड्रिल आयोजित की जानी चाहिए। विद्यालयों, महाविद्यालयों और कोचिंग संस्थानों में आपदा प्रबंधन का प्रशिक्षण पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाना चाहिए, ताकि आपात स्थिति में लोग घबराने के बजाय संयमपूर्वक अपनी सुरक्षा कर सकें। चौथे, जवाबदेही की स्पष्ट व्यवस्था होनी चाहिए। केवल भवन स्वामी ही नहीं, बल्कि संबंधित विभागों के उन अधिकारियों पर भी कठोर दंडात्मक कार्रवाई होनी चाहिए, जिन्होंने लापरवाही बरती या नियमों की अनदेखी की। जब तक अधिकारी व्यक्तिगत रूप से उत्तरदायी नहीं बनाए जाएंगे, तब तक सुधार की उम्मीद करना व्यर्थ है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि शासन की प्राथमिकता ‘दुर्घटना के बाद की प्रतिक्रिया’ से बदलकर ‘दुर्घटना से पूर्व की रोकथाम’ पर केंद्रित होनी चाहिए। सुशासन का अर्थ केवल योजनाएं बनाना नहीं, बल्कि नागरिकों के जीवन की रक्षा सुनिश्चित करना भी है। प्रशासन की सफलता मुआवजा राशि में नहीं, बल्कि दुर्घटनाओं को रोकने की क्षमता में निहित होती है।

    प्रशासनिक अक्षमता और धनलोलुपता की कीमत

    कोचिंग सेंटर, हॉस्पिटल, कारखाने, होटल आदि के मिस मैनेजमेंट और लापरवाही का स्थानीय प्रशासन को अंदाजा होना चाहिए कि उसके कार्यक्षेत्र में किस तरह के व्यवसाय कानूनी प्रक्रियाओं की अनदेखी करते हुए चलाए जा रहे हैं? प्रश्न है कि इन बढ़ती दुर्घटनाओं की नृशंस चुनौतियों का क्या अंत है? बहुत कठिन है दुर्घटनाओं की उफनती नदी में जीवनरूपी नौका को सही दिशा में ले चलना और मुकाम तक पहुंचाना, यह चुनौती सरकार के सम्मुख तो है ही, आम जनता भी इससे बच नहीं सकती। मनुष्य अपने स्वार्थ और रुपए के लिए इस सीमा तक बेईमान और बदमाश हो जाता है कि हजारों के जीवन और सुरक्षा से खेलता है। दो-चार परिवारों की सुख समृद्धि के लिए अनेक घर-परिवार उजाड़ देता है। तंत्र की काहिली और आपराधिक लापरवाही के चलत ऐसेे हादसे होते हैं जिनमें भ्रष्टाचार पसरा होता है, जब अफसरशाह लापरवाही करते हैं, जब स्वार्थ एवं धनलोलुपता में मूल्य बौने हो जाते हैं और नियमों और कायदे-कानूनों का उल्लंघन होता है। आखिर क्या वजह है कि जहां दुर्घटनाओं की ज्यादा संभावनाएं होती हैं, वही सारी व्यवस्थाएं फेल दिखाई देती है? सारे कानून कायदों का वहीं पर स्याह हनन होता है।

    आत्ममंथन का समय: कब जागेगा तंत्र?

    जैसे-जैसे जीवन तेज़ होता जा रहा है, सुरक्षा उतनी ही कम हो रही है, जैसे-जैसे प्रशासनिक सर्तकता की बात सुनाई देती है, वैसे-वैसे प्रशासनिक कोताही के सबूत सामने आते हैं, मरने वालों की संख्या बढ़ रही है, लेकिन हर बड़ी दुर्घटना कुछ शोर-शराबें के बाद एक और नई दुर्घटना की बाट जोहने लगती है। सरकार और सरकारी विभाग जितनी तत्परता मुआवजा देने में और जांच समिति बनाने में दिखाते हैं, अगर सुरक्षा प्रबंधों में इतनी तत्परता दिखाएं तो दुर्घटनाओं की संख्या घट सकती है। लखनऊ का यह अग्निकांड एक चेतावनी है। यदि अब भी शासन-प्रशासन नहीं जागा, तो ऐसी त्रासदियां भविष्य में और अधिक भयावह रूप धारण कर सकती हैं। यह समय आत्ममंथन का है, क्योंकि हर अग्निकांड के बाद यदि केवल राख बचती है और व्यवस्था फिर उसी ढर्रे पर लौट जाती है, तो यह केवल लापरवाही नहीं, बल्कि एक प्रकार का संस्थागत अपराध है। देश को अब संवेदना नहीं-व्यवस्था चाहिए, जांच नहीं-जवाबदेही चाहिए और आश्वासन नहीं-ठोस कार्रवाई चाहिए। अन्यथा हर अग्निकांड के बाद यही प्रश्न गूंजता रहेगा-आखिर कब जागेगा तंत्र? [INTERNAL_LINK_HOLDER]

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