लेखक: इंद्र यादव
भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए सूचना के अधिकार (RTI) एक शक्तिशाली उपकरण है। यह नागरिकों को सरकारी कामकाज के बारे में जानकारी मांगने का अधिकार देता है, जिससे भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने और सुशासन को बढ़ावा देने में मदद मिलती है। हाल ही में महाराष्ट्र सरकार द्वारा सूचना के अधिकार (RTI) के नियमों में किए गए बदलावों को लेकर मचा घमासान अभी थमा नहीं है। सरकार ने हाल ही में अपने उस फैसले को वापस ले लिया है, जिसमें RTI के तहत आवेदन करते समय जानकारी मांगने का ‘उद्देश्य’ बताना अनिवार्य कर दिया गया था। यह ‘यू-टर्न’ सरकार की नीति-निर्माण प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े करता है, और नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं ने इसे ‘अधूरा फैसला’ करार दिया है।
महाराष्ट्र सरकार के RTI नियमों में बदलाव: एक संक्षिप्त घटनाक्रम
यह पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब महाराष्ट्र सरकार ने 12 जून 2026 को नए आरटीआई नियम जारी किए थे। इन नियमों में एक विवादास्पद शर्त यह थी कि आवेदकों के लिए यह अनिवार्य कर दिया गया था कि उन्हें आरटीआई लगाने का कारण और उद्देश्य बताना होगा। यह प्रावधान मूल आरटीआई अधिनियम, 2005 की भावना के विपरीत था, जिसमें स्पष्ट रूप से कहा गया है कि सूचना मांगने वाले नागरिक को जानकारी का उद्देश्य बताने की आवश्यकता नहीं है। इस फैसले पर नागरिक समाज, विभिन्न संगठनों और एक्टिविस्ट्स ने तीव्र प्रतिक्रिया दी, जिससे सरकार पर भारी दबाव बना।
भारी विरोध और त्वरित वापसी
सरकार के इस मनमाने निर्णय के खिलाफ पूरे महाराष्ट्र में जमकर आवाजें उठीं। सूचना अधिकार कार्यकर्ताओं, कानूनी विशेषज्ञों और आम जनता ने इस नियम को नागरिकों के अधिकारों का हनन बताया। विरोध प्रदर्शनों और सार्वजनिक आलोचना के बाद, सरकार को सिर्फ एक हफ्ते के भीतर यानी 19 जून 2026 को ही अपना यह फैसला वापस लेना पड़ा। यह घटनाक्रम सरकार की जल्दबाजी और बिना सोचे-समझे नीति बनाने की प्रवृत्ति को उजागर करता है।
सूचना अधिकार कार्यकर्ता अनिल गलगली के तीखे सवाल
महाराष्ट्र के जाने-माने सूचना अधिकार कार्यकर्ता अनिल गलगली ने इस पूरे घटनाक्रम पर सरकार को कटघरे में खड़ा किया है। उन्होंने मीडिया के सामने इस मुद्दे पर अपनी बात रखी और सरकार की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाए। गलगली जैसे सक्रिय कार्यकर्ता लंबे समय से सूचना के अधिकार के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए प्रयासरत रहे हैं, और उनका मानना है कि ऐसे मनमाने नियम इस अधिकार की मूल भावना को कमजोर करते हैं।
नीतिगत विरोधाभास और कानूनी प्रक्रिया का अभाव
- नीतिगत विरोधाभास: गलगली ने सवाल उठाया कि अगर यह नियम सही था तो इसे एक हफ्ते में क्यों हटाया गया! और अगर यह गलत था, तो इसे लाया ही क्यों था! यह विरोधाभास सरकार की निर्णय लेने की क्षमता पर संदेह पैदा करता है। ऐसे अस्थिर फैसलों से जनता का सरकार पर से विश्वास उठने लगता है।
- कानूनी प्रक्रिया का अभाव: उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार ने बिना किसी कानूनी सलाह या विधायी चर्चा के जल्दबाजी में यह फैसला लिया, जो मूलतः गलत था। आरटीआई अधिनियम, 2005 के अनुसार किसी भी नागरिक को सूचना मांगने के लिए कारण बताने की जरूरत नहीं होती। यह अधिनियम नागरिकों को बिना किसी बाधा के जानकारी प्राप्त करने का अधिकार देता है, और ‘उद्देश्य’ बताने की शर्त इस अधिकार का सीधा उल्लंघन थी।
- जांच की प्रक्रिया पर आपत्ति: गलगली ने इस बात पर भी आपत्ति जताई कि इस मुद्दे पर विधान सभा में चर्चा करने के बजाय, सिर्फ सामान्य प्रशासन विभाग के प्रधान सचिव स्तर पर ही फैसला ले लिया गया। इस तरह के महत्वपूर्ण फैसलों के लिए विधायी बहस और जन परामर्श आवश्यक होता है, खासकर जब वे सीधे नागरिकों के अधिकारों को प्रभावित करते हों।
सूचना के अधिकार: भविष्य की मांगें और सुधार की आवश्यकता
अनिल गलगली ने सरकार से सिर्फ ‘उद्देश्य’ वाला नियम ही नहीं, बल्कि आरटीआई से जुड़े अन्य विवादास्पद प्रावधानों को भी तुरंत खत्म करने की मांग की है। उनका मानना है कि जब तक इन अन्य बाधाओं को दूर नहीं किया जाता, तब तक सूचना के अधिकार का पूर्ण लाभ नागरिकों तक नहीं पहुंच पाएगा। ये मांगें RTI कानून को और अधिक मजबूत और नागरिक-केंद्रित बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं।
इन मांगों में शामिल हैं:
- नागरिकता के प्रमाण की अनिवार्यता खत्म करना: वर्तमान में, कुछ स्थानों पर आवेदन के साथ नागरिकता का सबूत देने की अनिवार्यता है। गलगली का तर्क है कि यह नियम अनावश्यक है और आरटीआई आवेदन प्रक्रिया को जटिल बनाता है। सूचना का अधिकार सभी नागरिकों का मूल अधिकार है, और इसे प्राप्त करने के लिए अतिरिक्त दस्तावेजीकरण की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए।
- आरटीआई अपील के लिए फीस हटाना: आरटीआई अपील के लिए लगने वाली फीस को हटाना चाहिए। अक्सर, पहली अपील के खारिज होने के बाद नागरिकों को सूचना प्राप्त करने के लिए अपील करनी पड़ती है, और इसके लिए शुल्क लगाना सूचना तक पहुंच में एक और बाधा पैदा करता है। सूचना की लागत केवल आवेदन शुल्क तक सीमित होनी चाहिए।
- आरटीआई प्रक्रियाओं में वकीलों पर लगे प्रतिबंध को हटाना: कुछ मामलों में आरटीआई प्रक्रियाओं में वकीलों की भागीदारी पर पाबंदी लगाई गई है। गलगली ने इस पाबंदी को हटाने की मांग की है, क्योंकि यह नागरिकों को उचित कानूनी सहायता प्राप्त करने से रोकती है, खासकर जटिल मामलों में जहां कानूनी सलाह की आवश्यकता होती है।
- आवेदन पर 150 शब्दों की सीमा हटाना: आरटीआई आवेदन पर 150 शब्दों की जो सीमा तय की गई है, उसे भी हटाया जाए। कई बार विस्तृत जानकारी मांगने के लिए 150 शब्द पर्याप्त नहीं होते, जिससे आवेदक को अपनी पूरी बात रखने में दिक्कत होती है। यह सीमा सूचना के दायरे को सीमित करती है और आवेदकों को अनावश्यक रूप से संक्षिप्त होने के लिए मजबूर करती है। [INTERNAL_LINK_HOLDER]
सरकार को क्या करना चाहिए: पारदर्शिता और विशेषज्ञता की आवश्यकता
अनिल गलगली के अनुसार, सरकार को भविष्य में ऐसे विवादास्पद फैसलों से बचने के लिए एक तकनीकी समिति का गठन करना चाहिए, जैसा कि पहले मुंबई महानगरपालिका ने किया था। यह समिति विभिन्न हितधारकों, कानूनी विशेषज्ञों और सूचना अधिकार कार्यकर्ताओं को एक साथ लाएगी, जिससे यह सुनिश्चित होगा कि भविष्य में किसी भी तरह के बदलाव सोच-समझकर और नागरिकों के अधिकारों को सुरक्षित रखते हुए किए जाएं। ऐसे कदमों से न केवल नीति निर्माण में गुणवत्ता आएगी, बल्कि जनता का विश्वास भी बना रहेगा।
सरकार का यह ‘यू-टर्न’ स्पष्ट करता है कि बिना सोचे-समझे थोपे गए नियम न केवल प्रशासन की छवि खराब करते हैं, बल्कि जनता के भरोसे को भी तोड़ते हैं। पारदर्शी और सहभागी नीति निर्माण ही एक मजबूत लोकतंत्र की नींव है। भविष्य में, महाराष्ट्र सरकार को ऐसे किसी भी नियम को लागू करने से पहले व्यापक विचार-विमर्श और सार्वजनिक परामर्श सुनिश्चित करना चाहिए, ताकि सूचना के अधिकार की पवित्रता और प्रभावशीलता बनी रहे।

