मृत्युंजय बर्मन,
कोल्हान प्रभारी (राष्ट्र संवाद)
“शिक्षक दिवस केवल शिक्षकों के सम्मान का अवसर नहीं, बल्कि यह आत्ममंथन का दिन भी है कि शिक्षा और शिक्षक समाज के निर्माण में कितनी बड़ी भूमिका निभाते हैं।”
लेक्चरर के रुप में जीवन की पहली पारी की शुरुआत के बाद राजनीति में पैर जमा चुके प्रो केपी सोरेन कहते हैं कि “अध्यापन ने मुझे केवल विषय का ज्ञान नहीं दिया, बल्कि समाज को करीब से समझने, युवाओं की आकांक्षाओं को जानने और उनकी समस्याओं को महसूस करने का अवसर भी दिया”
श्री सोरेन का मानना है कि जब कोई शिक्षक राजनीति में आता है तो राजनीति में ज्ञान, विवेक और संवेदनशीलता का प्रवेश होता है। शिक्षक का काम केवल पाठ्यक्रम पूरा करना नहीं होता; वह प्रश्न करना, तर्क करना, सही और गलत में अंतर समझना तथा जिम्मेदार नागरिक बनना सिखाता है। यही गुण यदि राजनीति में आते हैं तो जनप्रतिनिधित्व अधिक संवेदनशील और जवाबदेह बन सकता है।
शिक्षक राजनीति में आकर शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य, सामाजिक न्याय और वंचित वर्गों के अधिकारों को केवल आंकड़ों के रूप में नहीं, बल्कि मानवीय सरोकारों के रूप में देखता है। वह जानता है कि किसी गरीब परिवार के बच्चे के लिए एक किताब, एक छात्रवृत्ति या एक शिक्षक की उपलब्धता उसके पूरे जीवन की दिशा बदल सकती है।
आज आवश्यकता ऐसी राजनीति की है, जो समाज को बांटे नहीं, बल्कि जोड़े; जो केवल सत्ता प्राप्ति का माध्यम न हो, बल्कि समाज निर्माण का संकल्प बने। शिक्षक से राजनीति में आने वाला व्यक्ति यदि अपने शिक्षकीय मूल्यों को जीवित रखे, तो वह राजनीति को भी लोकसेवा और राष्ट्र निर्माण का माध्यम बना सकता है।

