लेखक: सोनम चौधरी
कहा जाता है कि अच्छी परवरिश डूबते हुए कुल का भी भाग्य बदल देती है और परवरिश में हुई एक छोटी-सी चूक पीढ़ियों की कमाई हुई प्रतिष्ठा को भी मिट्टी में मिला देती है। यह बात सुनने में जितनी सरल लगती है, जीवन उतना सरल नहीं होता।
क्योंकि कोई भी माँ अपने आँचल में बुराई नहीं पालती और कोई भी पिता अपने पसीने की कमाई इसलिए नहीं बहाता कि उसकी संतान एक दिन उसके सम्मान का बोझ बन जाए।
गरीब पिता अपनी किस्मत से लड़ता है ताकि उसका बच्चा किस्मत का मोहताज न रहे। माँ अपनी इच्छाओं का गला घोंट देती है, लेकिन बच्चे की इच्छा अधूरी नहीं रहने देती। उनके पास धन कम हो सकता है, पर सपनों की कोई कमी नहीं होती।
फिर भी कभी-कभी वही संतान, जिसके जन्म पर पूरे घर में दीप जलाए गए थे, एक दिन उसी घर के चिराग बुझा देती है।
तब समाज बहुत जल्दी एक निर्णय सुना देता है—”परवरिश ठीक नहीं रही होगी।”
लेकिन क्या हर कहानी इतनी ही छोटी होती है?
परवरिश और परिवेश का द्वंद्व
सच तो यह है कि परवरिश बच्चे को चलना सिखाती है, लेकिन परिवेश उसे रास्ता चुनना सिखाता है।
यदि घर संस्कारों का विद्यालय है, तो समाज उसका विश्वविद्यालय है। घर की चौखट के बाहर मित्र मिलते हैं, आकर्षण मिलते हैं, प्रलोभन मिलते हैं, प्रतिस्पर्धा मिलती है और कभी-कभी ऐसे रास्ते भी मिल जाते हैं, जहाँ लौटना आसान नहीं होता।
आज आधुनिक जीवन की चमक के पीछे एक ऐसा अंधेरा भी खड़ा है, जो दिखाई नहीं देता, लेकिन घरों की रोशनी निगल रहा है।
उस अंधेरे का नाम है—एम.डी. ड्रग्स… “सफेद ज़हर“।
यह केवल एक नशा नहीं, बल्कि धीरे-धीरे मनुष्य की चेतना पर चढ़ने वाला धुआँ है। पहले यह सपनों को धुँधला करता है, फिर सोच को, फिर संस्कारों को और अंत में रिश्तों को। इसके बाद जो बचता है, वह केवल एक ऐसा परिवार होता है जो हर दिन जीते-जी बिखरता रहता है।
यहाँ प्रश्न केवल इतना नहीं कि परवरिश कैसी थी।
प्रश्न यह भी है कि उस बच्चे के चारों ओर कैसा परिवेश था?
हमारे बुज़ुर्ग एक बात अक्सर कहा करते थे—”कोयले की खान में उतरोगे तो कालिख लगना स्वाभाविक है।” यह कहावत केवल कोयले की नहीं, जीवन की भी सच्चाई है। वातावरण का प्रभाव धीरे-धीरे पड़ता है। कभी मित्रों के रूप में, कभी आदतों के रूप में और कभी उस एक गलत निर्णय के रूप में, जो पूरी ज़िंदगी बदल देता है।
इसका अर्थ यह नहीं कि परवरिश का महत्व कम हो गया, और न ही यह कि परिवेश ही सब कुछ है। सत्य शायद इन दोनों के बीच कहीं खड़ा है।
परवरिश जड़ों को मजबूत करती है, और परिवेश शाखाओं की दिशा तय करता है।
यदि जड़ें मजबूत हों तो आँधियों से लड़ने की शक्ति मिलती है, लेकिन यदि आँधी लगातार चलती रहे तो सबसे मजबूत वृक्ष भी थक जाता है।
आज आवश्यकता केवल अपने बच्चों को अच्छे संस्कार देने की नहीं, बल्कि ऐसा वातावरण बनाने की भी है जहाँ अच्छे संस्कारों को जीवित रहने का अवसर मिले। जहाँ सफलता का रास्ता मेहनत से होकर जाए, नशे से नहीं। जहाँ दोस्त हाथ पकड़कर आगे बढ़ाएँ, अंधेरे में धकेलें नहीं।
क्योंकि आने वाली पीढ़ियाँ केवल हमारे घरों में नहीं, हमारे समाज में भी पल रही हैं।
और शायद यही कारण है कि आज सबसे बड़ा प्रश्न परवरिश पर नहीं, परिवेश पर भी उतना ही है।
क्योंकि…
एक अच्छी परवरिश इंसान बना सकती है, लेकिन एक बुरा परिवेश उसी इंसान को खुद से भी अनजान कर सकता है।
इसलिए अगली बार किसी भटकी हुई संतान को देखकर केवल उसके माँ-बाप का निर्णय मत कीजिए।
एक बार उस दौर, उस संगति, उस वातावरण और उस समाज को भी देखिए…
जहाँ शायद एक इंसान नहीं, पूरी पीढ़ी अपनी सबसे कठिन परीक्षा से गुजर रही है।

