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    Home » दिल्ली में जीवंत हुई पूर्वोत्तर की पारंपरिक शिल्प: सचिव चंचल कुमार ने सराहा कला और संस्कृति का संगम
    राष्ट्रीय

    दिल्ली में जीवंत हुई पूर्वोत्तर की पारंपरिक शिल्प: सचिव चंचल कुमार ने सराहा कला और संस्कृति का संगम

    Devanand SinghBy Devanand SinghJuly 3, 2026No Comments5 Mins Read
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    पूर्वोत्तर की पारंपरिक शिल्प
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    नई दिल्ली, 2 जुलाई। देश की राजधानी दिल्ली में पूर्वोत्तर की पारंपरिक शिल्प का एक मनमोहक नजारा देखने को मिला। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आईजीएनसीए) में आयोजित ‘लिविंग हेरिटेज इन मेटल, बैम्बू एंड क्ले: ट्रेडिशनल यूटेंसिल्स ऑफ नॉर्थईस्ट इंडिया’ नामक प्रदर्शनी ने क्षेत्र की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को एक मंच प्रदान किया। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के सचिव श्री चंचल कुमार ने इस अनूठी प्रदर्शनी का अवलोकन किया और शिल्पकारों के हुनर और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के उनके प्रयासों की जमकर सराहना की। यह आयोजन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ‘अष्टलक्ष्मी’ परिकल्पना से प्रेरित है, जिसका उद्देश्य पूर्वोत्तर भारत की अप्रतिम कला और संस्कृति को जन-जन तक पहुंचाना है।

    पूर्वोत्तर की पारंपरिक शिल्प: हर कोने से जीवंत कला

    प्रदर्शनी में कदम रखते ही, दर्शकों को पूर्वोत्तर भारत के हरे-भरे परिदृश्य और वहां की मिट्टी में घुली कला की खुशबू महसूस हुई। श्री चंचल कुमार ने विशेष रूप से मणिपुर की प्रसिद्ध लॉन्गपी पॉटरी, जिसकी मिट्टी और पत्थर से बनी बनावट अपने आप में अनोखी है, और मेघालय की लार्नाई पॉटरी की बारीक कारीगरी की खूब प्रशंसा की। इन कलाकृतियों को देखकर यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि ये सिर्फ बर्तन नहीं, बल्कि अपने साथ सदियों पुरानी परंपराओं और कहानियों को समेटे हुए हैं।

    बेल-मेटल शिल्प, विशेषकर असम की प्राचीन बेल-मेटल शिल्पकला, जो अपनी चमक और टिकाऊपन के लिए जानी जाती है, ने भी सभी का ध्यान अपनी ओर खींचा। शिल्पकारों ने बताया कि कैसे पीतल और कांस्य को मिलाकर वे ऐसे सुंदर और उपयोगी बर्तन बनाते हैं जो उनकी दैनिक जीवनशैली का अभिन्न अंग हैं। यह सिर्फ एक व्यावसायिक गतिविधि नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक जुड़ाव भी है, जहां हर कलाकृति में एक कहानी और भावना छिपी होती है।

    सचिव महोदय ने प्रदर्शनी में मौजूद बांस शिल्प की विविधता और उसकी उपयोगिता को भी सराहा। पूर्वोत्तर भारत में बांस केवल एक पौधा नहीं, बल्कि जीवन का आधार है। यहां बांस से घरों से लेकर खाने के बर्तन, संगीत वाद्ययंत्र और सजावटी सामान तक सब कुछ बनाया जाता है। प्रदर्शनी में दिखाए गए बांस के बर्तनों की सादगी और मजबूती ने ग्रामीण जीवन के सरलता और स्थिरता का संदेश दिया।

    शिल्पकारों से सीधा संवाद: विरासत को सहेजने का अटूट संकल्प

    श्री कुमार ने इस दौरान विभिन्न राज्यों से आए शिल्पकारों से सीधा संवाद किया। उन्होंने उनके काम की बारीकियों को समझा और उनके संघर्षों तथा उम्मीदों पर भी बात की। एक शिल्पकार ने बताया कि कैसे यह प्रदर्शनी उन्हें अपने काम को बड़े मंच पर लाने का अवसर देती है और नई पीढ़ी को अपनी विरासत से जुड़ने के लिए प्रेरित करती है। सचिव ने उनकी कला को जीवित रखने और नई पीढ़ियों तक पहुंचाने के उनके समर्पण की दिल खोलकर प्रशंसा की। यह संवाद केवल औपचारिक नहीं था, बल्कि इसने मानवीय संबंधों की एक नई परत खोली, जहाँ कला और कलाकार के बीच का सीधा जुड़ाव स्पष्ट रूप से महसूस किया जा सका।

    आईजीएनसीए के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने श्री चंचल कुमार का स्वागत किया और प्रदर्शनी के उद्देश्यों पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि यह प्रदर्शनी राष्ट्रीय सांस्कृतिक मानचित्रण मिशन (एनएमसीएम) की एक महत्वपूर्ण पहल है, जिसका लक्ष्य भारत के विविध सांस्कृतिक रूपों को प्रलेखित करना और संरक्षित करना है। यह मिशन देश भर की कला और संस्कृति को डिजिटल प्लेटफॉर्म पर लाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

    राष्ट्रीय सांस्कृतिक मानचित्रण मिशन (NMCM) का यह प्रयास वास्तव में सराहनीय है। यह न केवल इन अद्भुत शिल्पों को एक पहचान देता है, बल्कि इन शिल्पकारों के जीवन में भी सकारात्मक बदलाव लाने की उम्मीद जगाता है। प्रदर्शनी का उद्देश्य प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ‘अष्टलक्ष्मी’ परिकल्पना को साकार करना है, जिसमें पूर्वोत्तर के आठ राज्यों को देश के विकास का अभिन्न अंग माना गया है।

    यह प्रदर्शनी सिर्फ कलाकृतियों का प्रदर्शन नहीं है, बल्कि यह पूर्वोत्तर भारत की आत्मा का उत्सव है। यह हमें याद दिलाता है कि कैसे हमारी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत हमें जोड़ती है और हमें अपनी जड़ों से बांधे रखती है। ऐसे आयोजनों से न केवल कला और संस्कृति का संवर्धन होता है, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी बढ़ावा मिलता है और शिल्पकारों को उनकी मेहनत का उचित सम्मान मिलता है। यह एक ऐसा कदम है जो ‘वोकल फॉर लोकल’ के संदेश को भी मजबूती प्रदान करता है।

    शिल्पकारों से बातचीत के दौरान कई ऐसे क्षण आए, जब उनकी आँखों में अपनी कला के प्रति प्रेम और सम्मान साफ झलका। एक वृद्ध शिल्पकार ने बताया कि कैसे उनकी पीढ़ियाँ इस कला को आगे बढ़ा रही हैं और वे चाहते हैं कि यह सिलसिला कभी न टूटे। यह प्रदर्शनी उस अदम्य भावना और दृढ़ संकल्प का प्रतीक है जो इन शिल्पकारों को अपनी विरासत को जीवित रखने के लिए प्रेरित करती है। यह सिर्फ एक प्रदर्शनी नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक यात्रा है जो दर्शकों को पूर्वोत्तर की गहराई में ले जाती है, जहाँ हर शिल्पकृति अपनी एक कहानी बयाँ करती है।

    इन आयोजनों से कला और संस्कृति प्रेमियों को भी एक अनूठा अवसर मिलता है कि वे एक ही छत के नीचे देश के विभिन्न कोनों की कलाकृतियों को देख सकें और उनके पीछे की कहानियों को समझ सकें। यह एक ऐसा मंच है जहाँ कला सिर्फ देखने की वस्तु नहीं रह जाती, बल्कि यह संवाद और अनुभवों का माध्यम बन जाती है। ऐसे आयोजनों के माध्यम से हम विविधता में एकता के अपने सिद्धांत को मजबूत करते हैं और राष्ट्रीय एकीकरण की भावना को बल देते हैं।

    अगर आप भारत की सांस्कृतिक विरासत को करीब से समझना चाहते हैं, तो ऐसी प्रदर्शनियां आपके लिए बेहतरीन अवसर हैं। यह आपको न केवल कला का ज्ञान देती हैं, बल्कि एक गहरा मानवीय अनुभव भी प्रदान करती हैं। भविष्य में भी ऐसे आयोजनों की उम्मीद की जा सकती है जो देश की सांस्कृतिक समृद्धि को इसी तरह सामने लाते रहें। इन शिल्पों के बारे में और अधिक जानने के लिए, आप संस्कृति मंत्रालय की वेबसाइट यहां क्लिक कर सकते हैं।

    आईजीएनसीए चंचल कुमार पूर्वोत्तर शिल्प राष्ट्रीय सांस्कृतिक मानचित्रण सांस्कृतिक विरासत
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