लेखक: देवानंद सिंह
स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संबोधन केवल सरकार का वक्तव्य नहीं होता, बल्कि वह देश की राजनीतिक दिशा और प्राथमिकताओं का भी संकेत माना जाता है। ऐसे में प्रधानमंत्री के भाषण के बाद सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच प्रतिक्रिया और प्रतिउत्तर स्वाभाविक है। लोकतंत्र में सरकार के विचारों का समर्थन जितना आवश्यक है, उतना ही आवश्यक है कि विपक्ष उन पर सवाल उठाए और वैकल्पिक दृष्टिकोण सामने रखे। लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में भाषा की मर्यादा और तथ्यों की विश्वसनीयता सबसे महत्वपूर्ण हो जाती है। इसी संदर्भ में ‘दिमागी नक्सली’ जैसे शब्दों का राजनीतिक इस्तेमाल गंभीर बहस का विषय बन गया है। यह शब्द मूलतः किसी व्यक्ति या समूह की विचारधारा को नक्सली हिंसा से जोड़ने का संकेत देता है। यदि इसका इस्तेमाल केवल राजनीतिक आलोचना करने वालों को निशाना बनाने के लिए किया जा रहा है, तो यह लोकतांत्रिक संवाद को कमजोर कर सकता है। दूसरी ओर, यदि किसी संगठन, समूह या विचारधारा के स्तर पर हिंसा, संवैधानिक व्यवस्था के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष अथवा लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करने के ठोस प्रमाण हैं, तो उस पर सवाल उठाना भी लोकतंत्र विरोधी नहीं कहा जा सकता।
दिमागी नक्सली
यहीं राजनीतिक विमर्श की सबसे बड़ी कसौटी सामने आती है भारत ने नक्सली हिंसा का गंभीर दौर देखा है। सुरक्षा बलों और आम नागरिकों ने इसकी कीमत चुकाई है। बंदूक के बल पर लोकतांत्रिक व्यवस्था बदलने की कोशिश को किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं किया जा सकता। लेकिन इसके साथ यह भी उतना ही स्पष्ट होना चाहिए कि सरकार की किसी नीति का विरोध करना, किसी निर्णय पर सवाल उठाना या विपक्षी विचार रखना अपने आप में नक्सलवाद नहीं है। लोकतंत्र इसी अधिकार की रक्षा करता है।
यदि ‘दिमागी नक्सली’ शब्द को लेकर कांग्रेस या विपक्ष में असहजता है, तो उसका जवाब भावनात्मक प्रतिक्रिया से अधिक तथ्यों और तर्कों के माध्यम से आना चाहिए। सवाल यह भी पूछा जाना चाहिए कि आखिर यह शब्द किसके लिए और किस संदर्भ में इस्तेमाल किया गया? क्या इसके पीछे कोई ठोस राजनीतिक या वैचारिक आधार है, अथवा यह केवल चुनावी राजनीति की तीखी शब्दावली है? इन प्रश्नों का उत्तर सार्वजनिक बहस में स्पष्ट होना चाहिए।
उसी तरह सत्ता पक्ष से भी यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि वह राजनीतिक असहमति और हिंसक उग्रवाद के बीच स्पष्ट रेखा खींचे। हर आलोचक को राष्ट्रविरोधी या किसी हिंसक विचारधारा का समर्थक बताना लोकतांत्रिक विमर्श के लिए स्वस्थ संकेत नहीं हो सकता। सरकार की आलोचना लोकतंत्र की कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी जीवंतता का प्रमाण है।
क्या कोई ‘दिमागी नक्सली’ हिंसा तलाश रहा है? यदि ऐसा आरोप है तो उसके समर्थन में प्रमाण सामने आने चाहिए। केवल राजनीतिक बयान के आधार पर किसी व्यक्ति या समूह को हिंसा से जोड़ना उचित नहीं होगा। लोकतंत्र में आरोप की गंभीरता जितनी बड़ी होती है, प्रमाण की जिम्मेदारी भी उतनी ही बड़ी होती है।
प्रधानमंत्री के लाल किले के संबोधन का मूल्यांकन भी इसी निष्पक्ष दृष्टि से होना चाहिए। सरकार की उपलब्धियों पर चर्चा हो, कमियों पर सवाल हो और विपक्ष के विकल्पों की भी जांच हो। बेरोजगारी, महंगाई, राष्ट्रीय सुरक्षा, आंतरिक सुरक्षा, सामाजिक न्याय, विकास और संवैधानिक संस्थाओं की मजबूती जैसे वास्तविक मुद्दे राजनीतिक बहस के केंद्र में होने चाहिए।
आज देश को ‘किसे मिर्ची लगी’ जैसी भाषा से अधिक यह जानने की जरूरत है कि किसके पास बेहतर तर्क है, किसके पास बेहतर नीति है और कौन देश की समस्याओं का बेहतर समाधान दे सकता है।
सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों को यह समझना होगा कि शब्दों की राजनीति कुछ समय के लिए सुर्खियां बना सकती है, लेकिन राष्ट्र का भविष्य गंभीर विमर्श से तय होता है। नक्सली हिंसा के खिलाफ कठोरता आवश्यक है, लेकिन वैचारिक असहमति के लिए लोकतांत्रिक स्थान भी उतना ही आवश्यक है।
लोकतंत्र में बंदूक की कोई जगह नहीं, लेकिन सवाल पूछने वाली आवाज के लिए हमेशा जगह होनी चाहिए। यही भारत की लोकतांत्रिक शक्ति है और यही निष्पक्ष राजनीतिक संवाद की वास्तविक कसौटी भी।

