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    Home » टारगेटेड आतंकवाद को नेस्तनाबूद करने का सही समय
    Headlines संपादकीय

    टारगेटेड आतंकवाद को नेस्तनाबूद करने का सही समय

    News DeskBy News DeskApril 24, 2025No Comments4 Mins Read
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    देवानंद सिंह
    अपने प्राकृतिक सौंदर्य के लिए जाना जाने वाला जम्मू-कश्मीर का पहलगाम एक बार फिर खून से लथपथ है। आतंकवादियों ने वहां 27 निर्दोष नागरिकों की हत्या की, सिर्फ इसलिए क्योंकि उनका नाम या पहचान मुस्लिम नहीं थी। आतंकियों ने न जाति पूछी, न भाषा, न राजनीतिक विचारधारा। उन्होंने केवल धर्म देखा। यह घटना न सिर्फ मानवता के खिलाफ एक घृणित अपराध है, बल्कि भारत जैसे बहुलतावादी देश की आत्मा पर भी गहरी चोट है।

    पहलगाम की घटना साफ़तौर पर दर्शाती है कि इन आतंकियों के एजेंडे का केंद्र ‘धर्म’ ही है, इसीलिए ये टारगेटेड आतंकवाद को बढ़ावा देते हैं। आतंकवाद का सबसे खतरनाक और घृणित रूप वही होता है, जो किसी खास धार्मिक पहचान को निशाना बनाता है। इस हमले में जिन लोगों को मारा गया, वे किसी राजनीतिक दल के नेता नहीं थे, किसी युद्ध में शामिल नहीं थे, बल्कि वे आम नागरिक थे। नाम पूछे गए, शक होने पर पेंट उतरवाए गए और खतना न होने पर गोली मार दी गई। यह किस हद तक नफ़रत की विचारधारा का परिचायक है, इसका अंदाज़ा लगाया जा सकता है।

    यह वाक्य अकसर हमारे नेताओं, बुद्धिजीवियों और मीडिया में सुनने को मिलता है कि “आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता”। नैतिक दृष्टि से यह बात सही है, कोई भी धर्म हिंसा की इजाजत नहीं देता, लेकिन जब बार-बार आतंकी घटनाएं एक ही खास विचारधारा से प्रेरित होकर होती हैं, जब एक ही समुदाय के अतिवादी तत्व हिंसा को धार्मिक जिहाद का रूप देते हैं, तो यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या हम वास्तविकता से मुंह मोड़ रहे हैं? इस्लामिक आतंकवाद की वैश्विक संरचना और एजेंडा
    तालिबान, लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद, हूजी, अल-कायदा, ISIS जिससे संगठन इस्लामिक विचारधारा के नाम पर लोगों को बरगलाते हैं, उन्हें “शहीद” बनने का झांसा देते हैं और काफिरों को मारने को धर्म का काम बताते हैं। भारत में यह स्थिति और भी गंभीर है, क्योंकि यहां की बहुलवादी संरचना और खुली समाज-व्यवस्था को वे इस्लामिक खलीफा के रास्ते की सबसे बड़ी बाधा मानते हैं।

    भारत में हिंदू बहुसंख्या में हैं, लेकिन जब इस प्रकार की घटनाएं होती हैं, तो यह सवाल उठता है कि क्या वह बहुसंख्या वास्तव में सुरक्षित हैं? पहलगाम की घटना हो या घाटी में कश्मीरी पंडितों का विस्थापन, ये केवल संयोग नहीं हैं, बल्कि ये एक योजनाबद्ध एजेंडे के तहत की गई घटनाएं हैं, जहां धर्म विशेष के लोगों को डराकर भगाना, मारना और उन्हें उनकी ही जमीन से बेदखल करना मकसद होता है। भारत लंबे समय से जातिवाद, भाषावाद और प्रांतवाद की लड़ाइयों में उलझा रहा है। राजनीतिक दल अक्सर इन विभाजनों को भुनाते हैं, वोट बैंक की राजनीति होती है, लेकिन जब एक आतंकी आपकी पहचान केवल “हिंदू” के रूप में करता है, तब न आप यादव होते हैं, न ब्राह्मण, न मराठी और न ही तमिल। तब सिर्फ एक पहचान बचती है — धर्म। क्या यह समय नहीं है कि हम इन आंतरिक विभाजनों को भूलकर एकजुट हों?

    यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि हर मुस्लिम आतंकवादी नहीं होता, और अधिकांश मुस्लिम समुदाय आतंकवाद के खिलाफ हैं, लेकिन जब किसी भी धर्म के नाम पर लगातार हिंसा हो रही हो, तो उस धर्म के रहनुमाओं, बुद्धिजीवियों और आम लोगों की यह जिम्मेदारी बनती है कि वे सामने आकर खुलकर उस विचारधारा की निंदा करें, जो उनके धर्म के नाम पर निर्दोषों का खून बहा रही है। आज के समय में कई मुख्यधारा मीडिया संस्थान और राजनीतिक दल इस प्रकार की घटनाओं पर या तो चुप रहते हैं या उन्हें हेट क्राइम कहकर एक सामान्य अपराध बना देते हैं, लेकिन जब कोई विशेष विचारधारा से जुड़ा अपराध बार-बार सामने आता है, तो उसे इस्लामिक आतंकवाद नाम देना ज़रूरी हो जाता है।

    भारत जैसे देश में, जहां हर अल्पसंख्यक के लिए विशेष योजनाएं हैं, जहां हर दंगे पर बहुसंख्यक पर ही प्रश्नचिह्न उठता है, वहां अगर बहुसंख्यक ही असुरक्षित महसूस करने लगे, तो यह एक चिंताजनक स्थिति है। पहलगाम जैसी घटनाएं बताती हैं कि हिंदू होना अब एक सामान्य पहचान नहीं, बल्कि एक संभावित खतरा भी बन गया है, खासकर, उन इलाकों में जहां इस्लामिक कट्टरपंथ गहराई तक अपनी जड़ें जमा चुका है। ऐसे में, यह अब जागने वक्त है। खासकर, जब आतंकवाद धार्मिक कट्टरता पर आधारित हो, किसी भी समाज को भीतर से तोड़ देता है। भारत जैसे देश के लिए यह और भी घातक है। पहलगाम की घटना एक चेतावनी है। यह समय जातिवाद, भाषावाद, दलित-पिछड़ा-सवर्ण के झगड़ों को पीछे छोड़कर एकजुट होने का है। यह समय आतंक के खिलाफ, नफ़रत के खिलाफ और उन विचारधाराओं के खिलाफ खड़ा होने का है, जो धर्म के नाम पर खून बहाने को जायज़ मानती हैं।

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