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    Home » तरियानी छपरा: उत्तर बिहार की वह शहादत जिसने अंग्रेजी हुकूमत को हिला दिया
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    तरियानी छपरा: उत्तर बिहार की वह शहादत जिसने अंग्रेजी हुकूमत को हिला दिया

    Devanand SinghBy Devanand SinghAugust 15, 2026No Comments3 Mins Read
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    तरियानी
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    लेखक: आशीष कुमार त्रिवेदी

    तरियानी छपरा की धरती पर लिखी गई आजादी की अमर गाथा

    जब भारत की आजादी का इतिहास लिखा जाता है, तो उसमें दिल्ली, मुंबई और कोलकाता के साथ-साथ उत्तर बिहार के उन गांवों का भी स्मरण होना चाहिए, जहां किसानों, मजदूरों और युवाओं ने अंग्रेजी हुकूमत को खुली चुनौती दी थी। शिवहर का तरियानी छपरा ऐसी ही शहादत की धरती है, जहां 1942 की अगस्त क्रांति में देश की आजादी के लिए कई वीरों ने अपने प्राण न्योछावर कर दिए।

    जब गांवों से उठी बगावत की आवाज

    9 अगस्त 1942 को महात्मा गांधी के ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ आह्वान के बाद देशभर में क्रांति की लहर दौड़ पड़ी। शिवहर और आसपास के इलाके भी इससे अछूते नहीं रहे। क्रांतिकारियों ने सड़कों को काटा, पुलों को क्षतिग्रस्त किया और संचार व्यवस्था बाधित कर अंग्रेजी प्रशासन की पकड़ कमजोर करने का प्रयास किया। 30 अगस्त 1942 को तरियानी छपरा और आसपास के गांवों से बड़ी संख्या में क्रांतिकारी बेलसंड की अंग्रेजी छावनी की ओर बढ़े। यह अंग्रेजी सत्ता के लिए सीधी चुनौती थी। इसके बाद शुरू हुआ दमन का वह दौर, जिसने तरियानी छपरा को इतिहास के अमर पन्नों में दर्ज कर दिया।

    बागमती के किनारे बरसीं गोलियां

    क्रांतिकारियों ने अंग्रेजी सेना की गतिविधियों को रोकने के लिए बागमती नदी पर स्थित मारर घाट पुल को क्षतिग्रस्त कर दिया। लेकिन अंग्रेजी सेना नदी पार कर क्रांतिकारियों तक पहुंच गई। इसके बाद बागमती के तट पर अंग्रेजी सैनिकों ने निहत्थे स्वतंत्रता सेनानियों पर गोलियां बरसा दीं। देखते ही देखते धरती शहीदों के रक्त से लाल हो गई। इस गोलीकांड में भूपन सिंह, नवजत सिंह, जयमंगल सिंह, सुन्दर महरा, छठु साह, सुकदेव सिंह, परसन्न साह, बुधन महतो सहित कई वीरों ने बलिदान दिया। जयमंगल सिंह के साथ उनके पुत्र मुक्ति नाथ सिंह भी गोलियों का निशाना बने। बुधन महतो गंभीर रूप से घायल हुए, लेकिन अंग्रेजी पहरे के कारण समय पर उपचार नहीं मिल सका और कुछ दिनों बाद उन्होंने दम तोड़ दिया। अनेक अन्य ग्रामीण भी घायल हुए। यह घटना उत्तर बिहार के स्वतंत्रता आंदोलन की सबसे दर्दनाक और गौरवशाली घटनाओं में गिनी जाती है।

    जेल की कोठरी में भी नहीं झुके श्याम नंदन

    तरियानी छपरा के स्वतंत्रता सेनानी श्याम नंदन सिंह को अंग्रेजों ने गिरफ्तार कर बक्सर जेल भेज दिया। जेल में भी उन्होंने अंग्रेजी अत्याचारों के खिलाफ आवाज उठाई और आमरण अनशन किया। अंततः जेल की कोठरी में ही उन्होंने मातृभूमि के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए। उनकी शहादत बताती है कि आजादी की लड़ाई केवल मैदान में नहीं, बल्कि जेल की अंधेरी कोठरियों में भी लड़ी गई थी।

    स्मारक है, लेकिन सम्मान अभी अधूरा

    आजादी के बाद शहीदों के परिजनों और ग्रामीणों ने अपनी जमीन देकर उनकी स्मृति को जीवित रखने का प्रयास किया। ग्रामीणों और स्मारक निर्माण एवं विकास समिति के सहयोग से तरियानी छपरा में शहीद स्मारक का निर्माण हुआ। मुजफ्फरपुर के सरैयागंज टावर पर भी इन अमर शहीदों के नाम अंकित हैं। तरियानी छपरा हमें याद दिलाता है कि आजादी किसी उपहार का नाम नहीं, बल्कि अनगिनत बलिदानों की कीमत है। 30 अगस्त 1942 की वह घटना सिर्फ एक गांव की कहानी नहीं, बल्कि उत्तर बिहार की उस ज्वलंत क्रांतिकारी चेतना का प्रतीक है, जिसने अंग्रेजी साम्राज्य को यह संदेश दिया था कि भारत की जनता अब गुलामी स्वीकार करने वाली नहीं है।

    तरियानी छपरा की मिट्टी आज भी पूछती है—क्या हम उन शहीदों के बलिदान को उतनी ही श्रद्धा से याद करते हैं, जितनी श्रद्धा से उन्होंने भारत माता के लिए अपने प्राण न्योछावर किए थे?

    अगस्त क्रांति इतिहास उत्तर बिहार तरियानी छपरा शहीद
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