ऑपरेशन सिंदूर पर संसद की बहस लोकतांत्रिक विमर्श की परिपक्वता का परिचायक
देवानंद सिंह
भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में कुछ बहसें ऐसी होती हैं, जो संसद की गरिमा, जिम्मेदारी और राजनीतिक परिपक्वता को नए स्तर पर ले जाती हैं। इस बार संसद में ऑपरेशन सिंदूर पर हुई बहस को भी इसी श्रेणी में रखा जा सकता है। यह बहस न केवल लंबे समय बाद संसद में सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच स्वस्थ, सार्थक और तर्कसंगत संवाद का उदाहरण बनी, बल्कि इसने भारत की आतंकवाद-रोधी रणनीति, विदेश नीति और लोकतंत्र में पारदर्शिता की आवश्यकता को लेकर कई भ्रमों को भी स्पष्ट किया। ऑपरेशन सिंदूर भारतीय सेना की एक सीमित, लेकिन अत्यंत प्रभावशाली सैन्य कार्रवाई थी, जो पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में स्थित आतंकवादी ठिकानों को निशाना बनाकर की गई थी। यह ऑपरेशन उस समय अंजाम दिया गया जब सीमा पार से बढ़ते आतंकवादी घुसपैठ और हमलों ने भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा उत्पन्न कर दिया था।

इस कार्रवाई का उद्देश्य स्पष्ट था, बिना पूर्ण युद्ध की स्थिति उत्पन्न किए आतंकवाद के अड्डों को ध्वस्त करना और पाकिस्तान को स्पष्ट संदेश देना था कि भारत अब पहले की तरह ‘रणनीतिक धैर्य’ की नीति पर नहीं चलेगा, लेकिन इस ऑपरेशन की सफलता के तुरंत बाद कुछ अंतरराष्ट्रीय बयान और राजनीतिक अटकलें सामने आने लगीं। खासकर अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के उस बयान ने राजनीतिक बहस को गर्म कर दिया, जिसमें उन्होंने दावा किया कि उनके हस्तक्षेप के बाद भारत ने सैन्य कार्रवाई रोकी। इसी विवाद के संदर्भ में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी संसद में खड़े हुए, तो उनके संबोधन ने न केवल विपक्ष के सवालों का उत्तर दिया, बल्कि उन असमंजसों को भी दूर कर दिया जो इस ऑपरेशन को लेकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठ रहे थे। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा, दुनिया के किसी भी नेता ने भारत से ऑपरेशन सिंदूर रोकने के लिए नहीं कहा। यह वाक्य जितना सरल था, उतना ही शक्तिशाली और निर्णायक भी।

प्रधानमंत्री की इस बात ने यह संकेत भी दिया कि भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा नीति अब किसी भी प्रकार की बाहरी सलाह या दबाव से संचालित नहीं होती। यह बात भी महत्वपूर्ण है कि पहले ही विदेश मंत्री एस. जयशंकर अमेरिका के दावे को खारिज कर चुके थे, लेकिन जब खुद प्रधानमंत्री ने यह स्पष्टता प्रदान की, तो वह पूरी दुनिया के लिए एक सशक्त संदेश बन गया, भारत अब अपनी रणनीतियां अपने राष्ट्रीय हितों के अनुसार ही तय करेगा। प्रधानमंत्री मोदी ने यह भी रेखांकित किया कि भारत का उद्देश्य टकराव बढ़ाना नहीं था। उन्होंने कहा कि सेना को पूरी छूट दी गई थी, लेकिन भारतीय कार्रवाई पूरी तरह सटीक, संतुलित और गैर-उकसावे वाली रही। यह बात भारत की एक परिपक्व सैन्य नीति को दर्शाती है, जो न तो उन्माद में चलती है और न ही कायरता में।

सैन्य रणनीति का यह संयम भारत को न केवल एक जिम्मेदार शक्ति के रूप में प्रस्तुत करता है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय में उसकी नैतिक बढ़त को भी स्थापित करता है। यह रणनीति उस परिपक्व कूटनीतिक दृष्टिकोण को दर्शाती है जिसमें सैन्य कार्रवाई अंतिम विकल्प होती है, लेकिन यदि राष्ट्र की सुरक्षा की बात हो तो भारत किसी भी हद तक जा सकता है। इस बहस की एक और उल्लेखनीय विशेषता विपक्ष की सक्रिय और जिम्मेदार भूमिका रही। जहां एक ओर कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने ऑपरेशन सिंदूर की पारदर्शिता, अंतरराष्ट्रीय दबाव और सरकार की मंशा को लेकर तीखे सवाल किए, वहीं दूसरी ओर सत्तापक्ष ने तर्क और तथ्यों के साथ उनका जवाब भी दिया।

यह एक दुर्लभ दृश्य था जब संसद का सदन शोर और नारेबाजी की जगह गंभीर सवाल-जवाब और सूचनाओं के आदान-प्रदान का मंच बना। यह स्थिति न केवल लोकतंत्र की मजबूती का संकेत थी, बल्कि यह दिखाती है कि जब मुद्दा राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा हो, तो राजनीतिक दल निजी एजेंडा छोड़कर राष्ट्रहित में संवाद के लिए आगे आ सकते हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने इस अवसर पर भारत की रक्षा नीति में आए बदलावों की ओर भी ध्यान दिलाया। उन्होंने उल्लेख किया कि कैसे भारत अब एक शस्त्र आयातक से शस्त्र निर्यातक बनने की दिशा में अग्रसर है। मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत जैसी पहलें अब रक्षा क्षेत्र में प्रत्यक्ष परिणाम देने लगी हैं।
भारत द्वारा अन्य देशों को रक्षा सामग्री निर्यात करना, न केवल आर्थिक दृष्टि से लाभप्रद है, बल्कि यह रणनीतिक सहयोगों को भी मजबूती देता है। यह बदलाव भारत की रक्षा नीति में एक ऐतिहासिक मोड़ है, जो लंबे समय तक आयात पर निर्भर रहने की प्रवृत्ति को समाप्त करने की दिशा में बढ़ रहा है। मॉनसून सत्र का एक बड़ा हिस्सा अब तक हंगामे, बहिर्गमन और आरोप-प्रत्यारोप की भेंट चढ़ चुका है। लेकिन ऑपरेशन सिंदूर पर हुई चर्चा इस सत्र की गरिमा को एक स्तर तक पुनर्स्थापित करने में सफल रही।

अब जब इस अहम मुद्दे पर खुली बहस हो चुकी है, और सरकार व विपक्ष दोनों पक्षों ने अपनी बात कह दी है, तो यह अपेक्षा की जा सकती है कि सत्र के बचे हुए दिनों में संसद अपने मूल कर्तव्यों पर लौटेगी। कानून निर्माण, जनहित के मुद्दों पर संवाद, आर्थिक और सामाजिक नीतियों की समीक्षा जैसे विषयों पर अगर इसी तरह की परिपक्व चर्चा हो, तो लोकतंत्र न केवल मजबूत होगा बल्कि जनविश्वास भी बढ़ेगा। कुल मिलाकर, ऑपरेशन सिंदूर पर संसद में हुई बहस केवल एक सैन्य अभियान पर राजनीतिक प्रतिक्रिया नहीं थी, बल्कि यह भारतीय लोकतंत्र में जवाबदेही, पारदर्शिता और राष्ट्रीय संप्रभुता के प्रश्नों की परीक्षा भी थी। प्रधानमंत्री मोदी ने जिस स्पष्टता और आत्मविश्वास के साथ जवाब दिए, उससे यह संदेश गया कि भारत अब दबावों से नहीं, अपनी प्राथमिकताओं और सिद्धांतों के आधार पर निर्णय लेता है।

यह बहस हमें यह भी याद दिलाती है कि जब संसद गंभीर विषयों पर गंभीरता से चर्चा करती है, तो वह जनता के लिए एक उदाहरण बनती है। यह केवल राजनीतिक दलों के लिए नहीं, बल्कि नागरिक समाज, मीडिया और नीति निर्माताओं के लिए भी एक मार्गदर्शन है कि संवाद, विमर्श और सत्य की खोज ही लोकतंत्र की आत्मा है। संसद में ऑपरेशन सिंदूर पर हुई बहस को इस दृष्टि से याद किया जाएगा कि इसने राजनीति को आरोप-प्रत्यारोप से बाहर निकालकर एक राष्ट्रहित की बहस में बदला। अब यही अपेक्षा है कि ऐसी बहसें अपवाद नहीं, बल्कि परंपरा बनें।


