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    Home » सावधान! बीवी को पढ़ाया, नर्स बनते ही छोड़ा? गोंडा राजेश रेनू विवाद | राष्ट्र संवाद
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    सावधान! बीवी को पढ़ाया, नर्स बनते ही छोड़ा? गोंडा राजेश रेनू विवाद | राष्ट्र संवाद

    Devanand SinghBy Devanand SinghMay 10, 2026No Comments3 Mins Read
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    सावधान! अगर आप भी बीवी को पढ़ा रहे हैं, तो गोंडा के ‘राजेश’ की कहानी जरूर सुन लें!

    राष्ट्र संवाद संवाददाता
    गोंडा (इंद्र यादव) कहते हैं कि प्यार अंधा होता है, लेकिन उत्तर प्रदेश के गोंडा में प्यार अब ‘कानूनी’ और ‘हिसाबी’ हो गया है। एक तरफ राजेश हैं, जिनका दावा है कि उन्होंने गन्ना बेचकर और पंजाब में पल्लेदारी करके पत्नी को नर्स बनाया। दूसरी तरफ रेनू हैं, जिनका कहना है कि उन्होंने अपनी पायल बेचकर खुद को काबिल बनाया। अब आलम यह है कि नर्स साहिबा को पति का साथ ‘कड़वी दवा’ जैसा लग रहा है।

    राजेश का पक्ष: “मैंने खून-पसीना एक किया”

    राजेश की कहानी किसी इमोशनल बॉलीवुड फिल्म जैसी है। उनका कहना है:
    बाल विवाह का बोझ: शादी 8 साल की उम्र में हुई, गौना 17 साल बाद 2018 में आया।
    पल्लेदारी और पढ़ाई: पत्नी को नर्स बनाने के लिए राजेश पंजाब चले गए। वहां गन्ना बेचा, बोरे ढोए और पाई-पाई जोड़कर रेनू की ANM की पढ़ाई पूरी करवाई।
    वादा खिलाफी: राजेश का आरोप है कि नौकरी लगते ही रेनू के सुर बदल गए। वह अब साथ रहने को तैयार नहीं है।
    “मैंने सोचा था कि गरीबी कटेगी, पर यहाँ तो गृहस्थी ही कटती दिख रही है।” — राजेश (पीड़ित पति)

    रेनू का पलटवार: “पायल मेरी थी, और स्वाभिमान भी”

    अब सिक्के का दूसरा पहलू भी सुन लीजिए, क्योंकि रेनू के पास भी अपनी ‘दलील’ की सिरिंज तैयार है:
    पायल का बलिदान: रेनू का कहना है कि एडमिशन के लिए पैसे राजेश ने नहीं, बल्कि उन्होंने अपनी 12 हजार की पायल बेचकर जुटाए थे।
    मारपीट का आरोप: रेनू का दावा है कि ससुराल में उनके साथ ‘नर्स’ जैसा नहीं, बल्कि ‘मुजरिम’ जैसा बर्ताव होता था। पति और ससुर मारपीट करते थे।
    शहर की डिमांड: रेनू साफ कहती हैं— “मुझे पति से दिक्कत नहीं, उसके गांव और घर के माहौल से है। मैं शहर में रहना चाहती हूँ, पर ये महाशय बुजुर्ग माता-पिता को छोड़ने को तैयार नहीं।”

    मुद्दे की बात: ‘पल्लेदारी’ बनाम ‘पायल’

    इस पूरे ड्रामे में जनता कन्फ्यूज है कि आखिर सच क्या है?
    अगर राजेश ने गन्ना बेचा, तो क्या उसका हिसाब सिर्फ ‘पायल’ से बराबर हो सकता है?
    और अगर रेनू के साथ वाकई मारपीट हुई, तो क्या नौकरी मिलने का इंतजार ‘कानूनी कार्रवाई’ के लिए सही मुहूर्त था?
    परिणाम: फिलहाल मामला पुलिस के पास है। राजेश को ‘न्याय’ चाहिए और रेनू को ‘आजादी’ (और शायद शहर का फ्लैट)। गोंडा के इस मामले ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि जब करियर और क्लैश आमने-सामने आते हैं, तो सबसे पहले ‘भरोसे’ की बलि चढ़ती है।
    अब देखना यह है कि पुलिस इस मामले में ‘मरहम’ लगाती है या फिर यह मामला कोर्ट की तारीखों में ‘एडमिट’ हो जाता है!

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