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    Home » स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव और संसद की साख
    संपादकीय

    स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव और संसद की साख

    Devanand SinghBy Devanand SinghFebruary 11, 2026Updated:February 11, 2026No Comments4 Mins Read
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    स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव भारतीय संसद में केवल एक राजनीतिक कदम नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों और संसदीय निष्पक्षता की गंभीर परीक्षा है।

    देवानंद सिंह –
    भारतीय लोकतंत्र की आत्मा संसद में बसती है। बहस, असहमति और सहमति इन तीन स्तंभों पर ही संसदीय व्यवस्था टिकी है। ऐसे में जब संसद के ही संरक्षक माने जाने वाले लोकसभा स्पीकर के खिलाफ विपक्ष अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस दे, तो यह केवल एक राजनीतिक घटना नहीं रह जाती, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों की गहन समीक्षा का अवसर भी बन जाती है। विपक्ष द्वारा लोकसभा स्पीकर ओम बिरला के खिलाफ दिए गए अविश्वास प्रस्ताव के नोटिस को इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए।

    मंगलवार को विपक्ष के 118 सांसदों के हस्ताक्षर के साथ लोकसभा सचिवालय को दिया गया यह नोटिस संविधान के अनुच्छेद 94(सी) के तहत प्रस्तुत किया गया है। विपक्ष का आरोप है कि स्पीकर सदन का संचालन निष्पक्षता से नहीं कर रहे और सत्ता पक्ष के प्रति झुकाव स्पष्ट रूप से दिख रहा है। विपक्ष का यह भी कहना है कि जनहित से जुड़े मुद्दों को उठाने से उन्हें बार-बार रोका गया, विपक्षी सांसदों को निलंबित किया गया और कई प्रमुख नेताओं को बोलने का अवसर तक नहीं दिया गया। राहुल गांधी को बोलने न देने के मुद्दे ने इस असंतोष को और तीखा बना दिया है।

    लोकसभा स्पीकर का पद संवैधानिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण है। स्पीकर न तो सरकार का प्रतिनिधि होता है और न ही विपक्ष का वह पूरे सदन का संरक्षक होता है। परंपरागत रूप से यह माना जाता रहा है कि स्पीकर दलगत राजनीति से ऊपर उठकर सदन का संचालन करता है। इसी कारण स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव अपने आप में असाधारण घटना है। यह विपक्ष की हताशा और व्यवस्था के प्रति बढ़ते अविश्वास को भी दर्शाता है।

    विपक्ष के आरोपों पर गौर करें तो चिंता के कुछ बिंदु सामने आते हैं। आठ सांसदों का निलंबन, विपक्षी नेताओं को बार-बार बोलने से रोका जाना और सदन में चर्चा के बजाय कार्यवाही का बार-बार स्थगन ये सभी बातें लोकतांत्रिक संवाद को कमजोर करती हैं। संसद केवल विधेयक पारित करने की मशीन नहीं है यह जनता की आवाज़ को सामने लाने का सबसे बड़ा मंच है। अगर वहां असहमति को दबाया जाएगा, तो लोकतंत्र की बुनियाद हिलना स्वाभाविक है।

    लेकिन दूसरी ओर, यह भी सच है कि संसद का बार-बार बाधित होना, तख्तियां दिखाना, नारेबाजी और वेल में आना—ये भी संसदीय मर्यादाओं के विरुद्ध हैं। सत्ता पक्ष का यह तर्क पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता कि विपक्ष भी कई बार जानबूझकर सदन की कार्यवाही नहीं चलने देता। दोनों पक्षों की जिद का खामियाजा अंततः जनता को भुगतना पड़ता है, क्योंकि संसद का हर मिनट जनता के पैसे से चलता है।
    राहुल गांधी को बोलने न देने के मुद्दे पर हुआ हंगामा इस पूरे विवाद का प्रतीक बन गया है। विपक्ष इसे लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन बता रहा है, जबकि सत्ता पक्ष का कहना है कि नियमों के तहत ही निर्णय लिए गए। यहां प्रश्न यह नहीं है कि कौन सही है और कौन गलत, बल्कि यह है कि क्या संवाद की गुंजाइश पूरी तरह खत्म हो गई है?

    इस पूरे घटनाक्रम में एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि टीएमसी जैसे कुछ विपक्षी दल इस नोटिस का हिस्सा नहीं बने। यह दर्शाता है कि विपक्ष भी पूरी तरह एकजुट नहीं है। अविश्वास प्रस्ताव भले ही राजनीतिक संदेश देने का माध्यम बने, लेकिन इसकी सफलता या विफलता से ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि संसद की कार्यशीलता कैसे बहाल होगी।

    लोकतंत्र में सत्ता और विपक्ष दोनों की बराबर जिम्मेदारी है। सत्ता पक्ष को यह समझना होगा कि मजबूत विपक्ष लोकतंत्र की कमजोरी नहीं, बल्कि ताकत है। वहीं विपक्ष को भी यह आत्ममंथन करना चाहिए कि विरोध के नाम पर सदन को ठप करना क्या वास्तव में जनता के हित में है।

    आज संसद एक तरह की अग्निपरीक्षा से गुजर रही है। यह परीक्षा केवल स्पीकर की निष्पक्षता की नहीं, बल्कि पूरे राजनीतिक वर्ग की परिपक्वता की है। अगर संवाद, सहिष्णुता और संवैधानिक मर्यादाओं की ओर वापसी नहीं हुई, तो नुकसान किसी एक दल का नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र का होगा।

    अंततः यह याद रखना जरूरी है कि संसद न तो सत्ता पक्ष की निजी जागीर है और न ही विपक्ष का अखाड़ा। यह 140 करोड़ भारतीयों की आकांक्षाओं का मंच है। सत्ता और विपक्ष—दोनों को एक कदम पीछे हटकर सोचना होगा कि क्या वे इतिहास में लोकतंत्र को मजबूत करने वालों के रूप में याद किए जाना चाहते हैं या उसे कमजोर करने वालों के रूप में।

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