लेखक: राष्ट्र संवाद संवाददाता
सफेदपोश गठजोड़ के कथित प्रभाव ने जमशेदपुर की राजनीति में नए सवाल खड़े कर दिए हैं। सूत्रों के अनुसार, एक प्रभावशाली व्यक्ति पर सांसद का चुनाव प्रबंधन करने और उद्योग जगत में दखल रखने के आरोप लग रहे हैं। यह मामला तब और गंभीर हो जाता है जब सांसद की मंत्री पद की दावेदारी बार-बार नाकाम होने के पीछे इसी गठजोड़ को वजह बताया जा रहा है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि इस कथित गठजोड़ की जड़ें बहुत गहरी हैं और इसका असर प्रशासनिक फैसलों पर भी पड़ रहा है।
सफेदपोश गठजोड़ का आरोप और राजनीतिक असर
सियासत में आरोप लगाना आसान है, लेकिन आरोपों की निष्पक्ष जांच और सच सामने लाना लोकतंत्र की पहली जिम्मेदारी है। जमशेदपुर की राजनीति और उद्योग जगत में एक कथित सफेदपोश चेहरे को लेकर जिस तरह के दावे सामने आ रहे हैं, वे गंभीर सवाल खड़े करते हैं।
सूत्रों के हवाले से दावा किया जा रहा है कि उक्त व्यक्ति सांसद का चुनाव मैनेज करने, चुनावी खर्च उठाने और दूसरे दल से भाजपा में लोगों को शामिल कराने तक में अपनी भूमिका बताता रहा है। सवाल यह है कि यदि ये दावे निराधार हैं तो इनका खंडन क्यों नहीं होता और यदि इनमें सच्चाई का अंश है तो इसकी निष्पक्ष जांच क्यों नहीं होनी चाहिए?
एक बेहतर सांसद होने के बावजूद मंत्री पद की दौड़ में बार-बार पीछे रह जाने को भी अब कथित सफेदपोश गठजोड़ से जोड़कर देखा जा रहा है। चर्चा यह भी है कि राशन दुकान से शुरुआत कर स्क्रैप और उद्योग जगत तक प्रभाव बनाने वाले इस कथित माफिया के कारण सांसद की राजनीतिक छवि और संभावनाओं को नुकसान पहुंचा।
20 वर्षों से अपने जियाडा (तत्कालीन आयडा) आवंटित प्लॉट पर दखल के लिए संघर्ष कर रही महिला उद्यमी का मामला भी इसी संदर्भ में सवाल खड़े करता है। क्या इसके पीछे भी किसी प्रभावशाली व्यक्ति का हाथ है?
सूत्रों का दावा है कि संघ इस कथित गठजोड़ को खत्म करने की दिशा में गंभीर कदम की तैयारी में है। अब जरूरत आरोपों की नहीं, बल्कि निष्पक्ष जांच की है ताकि सच सामने आए और राजनीति तथा उद्योग के बीच छिपे गठजोड़ का पर्दाफाश हो।
राजनीति और उद्योग के गठजोड़ की गहरी जड़ें
जमशेदपुर जैसे औद्योगिक नगर में राजनीति और कारोबार का आपसी संबंध नया नहीं है। लेकिन जब यह संबंध सफेदपोश गठजोड़ की शक्ल अख्तियार कर लेता है, तो लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर सवालिया निशान लग जाते हैं। जानकारों का मानना है कि चुनावी फंडिंग और टिकट वितरण में बाहरी प्रभाव का बढ़ना स्वस्थ लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी है। झारखंड की राजनीति में ऐसे कई मामले पहले भी सामने आ चुके हैं, जहां धनबल और बाहुबल के जरिए सियासी समीकरण बदले गए हैं। इस तरह के गठजोड़ न केवल जनप्रतिनिधियों की स्वायत्तता छीनते हैं, बल्कि आम जनता के हितों की भी अनदेखी करते हैं।
निष्पक्ष जांच की दरकार
महिला उद्यमी का 20 वर्ष पुराना संघर्ष प्रशासनिक तंत्र की लाचारी या मिलीभगत को उजागर करता है। जियाडा जैसे संस्थानों की विश्वसनीयता तब दांव पर लग जाती है जब प्रभावशाली लोग कानून को ताक पर रखकर संपत्तियों पर कब्जा जमाए रखते हैं। संघ द्वारा इस दिशा में पहल की खबर राहत देने वाली है, लेकिन ठोस कार्रवाई ही जनता का विश्वास बहाल कर पाएगी। सरकारी सूत्रों के मुताबिक, इस मामले की उच्चस्तरीय समीक्षा शुरू हो चुकी है।
अंततः, सच सामने लाना ही एकमात्र रास्ता है। निष्पक्ष जांच न केवल आरोपों का सच उजागर करेगी, बल्कि भविष्य के लिए एक नजीर भी पेश करेगी कि कानून से ऊपर कोई नहीं है। जमशेदपुर की जनता अब पारदर्शिता और जवाबदेही की उम्मीद कर रही है।

