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    Home » राष्ट्रपति सम्मान राजनीति: लोकतांत्रिक मर्यादा का प्रश्न
    Breaking News Headlines राजनीति संपादकीय

    राष्ट्रपति सम्मान राजनीति: लोकतांत्रिक मर्यादा का प्रश्न

    Devanand SinghBy Devanand SinghMarch 9, 2026No Comments4 Mins Read
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    कालियाचक घटना
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    राष्ट्रपति सम्मान राजनीति: लोकतांत्रिक मर्यादा का प्रश्न

    देवानंद सिंह
    भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत उसके संवैधानिक पदों की गरिमा और उनके प्रति समाज तथा सरकारों का सम्मान है। राष्ट्रपति देश का प्रथम नागरिक होता है और उस पद से जुड़ी मर्यादा केवल किसी व्यक्ति विशेष से नहीं बल्कि पूरे राष्ट्र की प्रतिष्ठा से जुड़ी होती है। ऐसे में यदि किसी राज्य सरकार का व्यवहार राष्ट्रपति के प्रति प्रोटोकॉल और शिष्टाचार के अनुरूप नहीं दिखता, तो यह केवल एक प्रशासनिक चूक नहीं बल्कि लोकतांत्रिक संस्कृति के लिए भी चिंता का विषय बन जाता है।
    हाल के दिनों में पश्चिम बंगाल में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के कार्यक्रम को लेकर जो विवाद सामने आया है, उसने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोप यह है कि राज्य सरकार ने राष्ट्रपति के सम्मान में अपेक्षित प्रोटोकॉल का पूरी तरह पालन नहीं किया और कार्यक्रम में जाने के इच्छुक संथाल समाज के लोगों को भी रोका गया। यदि इन आरोपों में सच्चाई है, तो यह स्थिति निश्चित ही गंभीर है और इसकी निष्पक्ष जांच तथा स्पष्टीकरण आवश्यक है।
    राष्ट्रपति का पद दलगत राजनीति से ऊपर होता है। संविधान निर्माताओं ने इस पद को इसलिए सर्वोच्च गरिमा प्रदान की ताकि वह पूरे देश की एकता और लोकतांत्रिक मूल्यों का प्रतीक बने। इस पद पर आसीन व्यक्ति चाहे किसी भी पृष्ठभूमि से आया हो, उसके साथ किया गया व्यवहार दरअसल उस पद की गरिमा का प्रतिबिंब होता है। इसलिए जब भी राष्ट्रपति किसी राज्य के दौरे पर जाते हैं, तो यह अपेक्षा की जाती है कि राज्य सरकार पूरी संवैधानिक मर्यादा और सम्मान के साथ उनका स्वागत करेगी।
    द्रौपदी मुर्मू केवल भारत की राष्ट्रपति ही नहीं हैं, बल्कि वे देश के आदिवासी समाज से आने वाली पहली महिला राष्ट्रपति भी हैं। उनका इस पद तक पहुंचना भारतीय लोकतंत्र की समावेशी शक्ति का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। आदिवासी समाज के लिए यह गौरव और प्रेरणा का विषय है कि उनके समुदाय से जुड़ी एक महिला देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर आसीन है। ऐसे में यदि किसी कार्यक्रम में संथाल समाज के लोगों को शामिल होने से रोका गया हो, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर ऐसा क्यों हुआ।
    लोकतांत्रिक राजनीति में मतभेद होना स्वाभाविक है। केंद्र और राज्यों की सरकारों के बीच राजनीतिक और वैचारिक टकराव भी कई बार देखने को मिलते हैं। लेकिन इन मतभेदों के बावजूद कुछ संस्थाएं और पद ऐसे होते हैं जिन्हें राजनीतिक विवादों से ऊपर रखा जाना चाहिए। राष्ट्रपति का पद भी उन्हीं में से एक है। यदि किसी कार्यक्रम को लेकर प्रशासनिक या सुरक्षा कारण रहे हों, तो सरकार को पारदर्शिता के साथ उसकी जानकारी देनी चाहिए ताकि किसी प्रकार की गलतफहमी न फैले।
    यह भी सच है कि आज के दौर में राजनीति का स्तर कई बार अनावश्यक रूप से तीखा हो जाता है। सोशल मीडिया और राजनीतिक बयानबाजी के कारण छोटे-छोटे विवाद भी बड़े राजनीतिक मुद्दों का रूप ले लेते हैं। लेकिन इस माहौल में सरकारों की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है कि वे अपने आचरण से लोकतांत्रिक मर्यादाओं का उदाहरण प्रस्तुत करें।
    पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी एक अनुभवी राजनेता हैं और लंबे समय से राज्य की राजनीति में प्रभावशाली भूमिका निभा रही हैं। उनसे यह अपेक्षा की जाती है कि वे राजनीतिक मतभेदों के बावजूद संवैधानिक पदों की गरिमा को सर्वोपरि रखेंगी। यदि किसी कारणवश प्रोटोकॉल के पालन में कमी रह गई है या कार्यक्रम को लेकर कोई विवाद उत्पन्न हुआ है, तो उसे स्पष्ट करना और आवश्यक सुधार करना भी सरकार की जिम्मेदारी है।
    दूसरी ओर, यह भी जरूरी है कि ऐसे मुद्दों को केवल राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल करने से बचा जाए। राष्ट्रपति के सम्मान का प्रश्न किसी एक दल या सरकार का नहीं, बल्कि पूरे देश की लोकतांत्रिक परंपरा का प्रश्न है। इसलिए इस विषय पर चर्चा भी संतुलित और जिम्मेदार तरीके से होनी चाहिए।
    भारत जैसे विविधता भरे लोकतंत्र में संवैधानिक संस्थाओं का सम्मान ही वह आधार है जो व्यवस्था को स्थिर और मजबूत बनाता है। यदि इन संस्थाओं को लेकर विवाद खड़े होते हैं, तो उससे केवल राजनीतिक दलों की छवि ही प्रभावित नहीं होती बल्कि आम जनता का भरोसा भी कमजोर होता है।
    आज आवश्यकता इस बात की है कि सभी राजनीतिक दल और सरकारें मिलकर लोकतांत्रिक शिष्टाचार और संवैधानिक मर्यादाओं को मजबूत करें। राष्ट्रपति जैसे सर्वोच्च पद के प्रति सम्मान केवल औपचारिकता नहीं बल्कि लोकतंत्र के प्रति हमारी सामूहिक प्रतिबद्धता का प्रतीक है।
    इस पूरे विवाद से सबसे बड़ा संदेश यही निकलता है कि राजनीति चाहे कितनी भी प्रतिस्पर्धी क्यों न हो, लेकिन संवैधानिक पदों और राष्ट्रीय संस्थाओं के सम्मान पर कभी समझौता नहीं होना चाहिए। लोकतंत्र की मजबूती इसी में है कि सत्ता और विपक्ष दोनों मिलकर उन मूल्यों की रक्षा करें जिन पर हमारा गणराज्य टिका हुआ

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