कुरुक्षेत्र का रक्त-रंजित इतिहास: विजयगाथा के नेपथ्य में नारी का त्याग और सहनशीलता
ब्रह्मसरोवर के तट पर खड़े होने पर एक मायावी निस्तब्धता चारों ओर से घेर लेती है। रात की उस खामोशी में हवा का हर झोंका मानो इतिहास की धूल उड़ा लाता है। यदि ध्यान से सुनें, तो ऐसा अनुभव होता है जैसे ब्रह्मसरोवर की प्रत्येक लहर आज भी महाभारत की वह अमर गाथा सुना रही हो। धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र की इस पवित्र भूमि पर स्वयं को खोजने के इस अपूर्व क्षण में एक गहरी अनुभूति मन में जागती है— कुरुक्षेत्र का इतिहास केवल शौर्य और वीरता की कहानी नहीं है, बल्कि यह नारी के मूक त्याग और सहनशीलता का एक करुण दस्तावेज है।
आज के इस आधुनिक युग में जब हम अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाते हैं, तब हमारे मन में नारी के अधिकारों और सशक्तिकरण के विचार आते हैं। लेकिन हजारों वर्ष पूर्व कुरुक्षेत्र के रणक्षेत्र में रक्त बहाने वाले पुरुषों के पीछे जो त्याग था, उसकी कोई सीमा नहीं थी। कुरुक्षेत्र के युद्ध में जय-पराजय का हिसाब तो इतिहास की किताबों में दर्ज हुआ, लेकिन नारी के आंसुओं का हिसाब किसी ने नहीं रखा।
धर्मयुद्ध के नेपथ्य में नारी का मानसिक संघर्ष
महाभारत के विशाल कैनवास पर द्रौपदी, गांधारी और कुंती जैसे चरित्र विद्यमान थे। इन तीनों नारी पात्रों ने मानवीय संवेदनाओं और धैर्य की चरम परीक्षा दी थी। द्रौपदी वह स्त्री थी, जिसके आत्मसम्मान की रक्षा के लिए एक महायुद्ध का सूत्रपात हुआ था। किंतु युद्ध के अंत में उन्हें क्या मिला? पांडवों की विजय तो हुई, पर द्रौपदी की गोद सूनी हो गई। उनके पांचों पुत्रों का बलिदान एक माँ के लिए सबसे बड़ी त्रासदी थी। द्रौपदी का वह क्षोभ और बाद के समय का मौन हमें याद दिलाता है कि नारी के त्याग के बिना कोई भी धर्मयुद्ध पूर्ण नहीं होता।
दूसरी ओर, गांधारी के विषय में सोचकर विस्मय होता है। सौ पुत्रों की माता होकर भी उन्होंने एक-एक कर सबको खो दिया। आँखों की रोशनी का स्वेच्छा से त्याग करने वाली गांधारी का वह अंधत्व केवल पतिभक्ति नहीं थी, बल्कि वह एक विरल सहनशीलता थी। युद्ध के अंत में ब्रह्मसरोवर के तट पर गांधारी का जो विलाप था, वह आज भी कुरुक्षेत्र के आकाश में प्रतिध्वनित होता है।
त्याग का दूसरा नाम नारी
कुरुक्षेत्र के युद्ध ने हमें दिखाया कि नारी केवल प्रेम और स्नेह का आधार ही नहीं है, बल्कि वह धैर्य का हिमालय है। कुंती का संपूर्ण जीवन एक निरंतर संघर्ष था। समाज से मिले लांछन और अपने ज्येष्ठ पुत्र कर्ण को लेकर हृदय में छिपाया हुआ वह गुप्त संताप— इन सबको सहते हुए भी उन्होंने पांडवों को एकजुट रखा। ठीक उसी प्रकार अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा का स्मरण होते ही हृदय कांप उठता है। अल्पायु में ही वैधव्य झेलने वाली उत्तरा ने जिस धैर्य के साथ भविष्य के वंशधर को अपनी कोख में धारण किया, वह नारी के चरम त्याग का अनुपम उदाहरण है।
महिला दिवस और कुरुक्षेत्र की शिक्षा
आज के परिप्रेक्ष्य में कुरुक्षेत्र के इस इतिहास की प्रासंगिकता निर्विवाद है। महिला दिवस का अर्थ केवल एक दिन का उत्सव नहीं है, बल्कि यह नारी की उस अदम्य शक्ति और त्याग को मान्यता देने का अवसर है। कुरुक्षेत्र हमें सिखाता है कि:
• नारी की शक्ति केवल रणक्षेत्र के शस्त्रों में नहीं होती, उनका संघर्ष घर से लेकर समाज तक विस्तृत होता है।
• विजय के आनंद से कहीं अधिक खोने की पीड़ा को सहने की क्षमता नारी में होती है।
आज के समय में कुरुक्षेत्र की इस पावन भूमि पर खड़े होकर मैं अनुभव कर रही हूँ कि इतिहास के उन रक्त-रंजित पन्नों में स्त्रियों के नाम शायद गौण रह गए हों, लेकिन उनके त्याग से बढ़कर किसी भी वीर की तलवार शक्तिशाली नहीं थी। महिला दिवस के इस पवित्र अवसर पर हम उन सभी मूक त्यागी नारियों को नमन करते हैं, जिन्होंने युगों-युगों से समाज और परिवार के लिए स्वयं का बलिदान दिया है। कुरुक्षेत्र की वह निस्तब्धता मानो सदैव हमसे कहती रहेगी— “नारी त्याग और सहनशीलता की एक अपराजेय सत्ता है।”
मूल लेखिका
मनीषा शर्मा
अनुवादक:– रितेश शर्मा
पता- जलुकबाड़ी, गुवाहाटी

