लेखक: देवानंद सिंह
पाकिस्तान क्रिकेट की मौजूदा बदहाली पर चर्चा करते हुए पूर्व क्रिकेटर मोहम्मद यूसुफ ने भारत पर आरोप लगाए, लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि असली समस्या आंतरिक है।
“भारत हमारी बर्बादी का कारण बना…” पाकिस्तान के पूर्व क्रिकेटर मोहम्मद यूसुफ का यह बयान भावनात्मक जरूर है, लेकिन पाकिस्तान क्रिकेट की मौजूदा बदहाली का जवाब नहीं देता। 2021 के टी-20 विश्व कप में भारत के खिलाफ 10 विकेट की ऐतिहासिक जीत को पाकिस्तान क्रिकेट के पतन की शुरुआत बताना दरअसल उस बीमारी का संकेत है, जिसकी सबसे बड़ी वजह आत्ममंथन से बचना है।
भारत के खिलाफ जीत पाकिस्तान के लिए गौरव का क्षण थी। बाबर आजम और मोहम्मद रिजवान ने शानदार बल्लेबाजी की और पाकिस्तान ने पहली बार विश्व कप में भारत को हराया। उस जीत का जश्न स्वाभाविक था। लेकिन क्या उस जीत के बाद पाकिस्तान क्रिकेट को लगा कि उसने विश्व क्रिकेट पर स्थायी विजय हासिल कर ली? अगर आज वही जीत बर्बादी की वजह बताई जा रही है, तो सवाल जीत पर नहीं, जीत के बाद की सोच पर उठता है।
पाकिस्तान क्रिकेट की असली चुनौतियां
क्रिकेट में एक मैच इतिहास बदल सकता है, लेकिन किसी क्रिकेट व्यवस्था का भविष्य नहीं। मजबूत टीम बनने के लिए मजबूत घरेलू क्रिकेट चाहिए, पारदर्शी चयन व्यवस्था चाहिए, खिलाड़ियों को लगातार अंतरराष्ट्रीय स्तर के लिए तैयार करना चाहिए और प्रशासन में स्थिरता चाहिए। आईसीसी के मानकों के अनुसार पाकिस्तान इन मोर्चों पर लंबे समय से सवालों से घिरा रहा है।
कप्तानी बदलती रही, चयन को लेकर विवाद होते रहे, क्रिकेट प्रशासन में खींचतान चलती रही और टीम के प्रदर्शन में निरंतरता नहीं बन सकी। ऐसे में भारत को जिम्मेदार ठहराना आसान जरूर है, लेकिन इससे पाकिस्तान क्रिकेट की वास्तविक कमजोरियां दूर नहीं होंगी।
विडंबना देखिए जिस भारत को हराने को पाकिस्तान ने कभी अपनी सबसे बड़ी उपलब्धियों में गिना, उसी भारत को आज पाकिस्तान अपनी बदहाली के लिए जिम्मेदार बता रहा है। क्या भारत ने पाकिस्तान की घरेलू क्रिकेट व्यवस्था कमजोर की? क्या भारत ने उसके चयनकर्ताओं को गलत फैसले लेने के लिए मजबूर किया? क्या भारत ने उसके क्रिकेट प्रशासन में अस्थिरता पैदा की? जाहिर है, इन सवालों का जवाब पाकिस्तान को अपने भीतर खोजना होगा।
दरअसल, समस्या भारत नहीं बल्कि वह मानसिकता है जो अपनी सफलता का श्रेय खुद लेती है और अपनी असफलता का ठीकरा किसी दूसरे के सिर फोड़ देती है।
पाकिस्तान क्रिकेट के पास प्रतिभा की कमी कभी नहीं रही। वसीम अकरम, वकार यूनिस, इमरान खान, इंजमाम उल हक, मोहम्मद यूसुफ जैसे महान खिलाड़ियों की परंपरा इसका प्रमाण है। आज भी वहां प्रतिभाशाली खिलाड़ी मौजूद हैं। कमी है तो उस प्रतिभा को सही दिशा, स्थिर व्यवस्था और पेशेवर वातावरण देने की।
मोहम्मद यूसुफ का दर्द अपनी जगह जायज है। अपने देश की क्रिकेट टीम को लगातार गिरते देखना किसी भी पूर्व खिलाड़ी के लिए पीड़ादायक होगा। लेकिन दर्द को दोषारोपण में बदलने के बजाय उसे सुधार की आवाज बनना चाहिए।
2021 में भारत के खिलाफ मिली जीत पाकिस्तान क्रिकेट की बर्बादी नहीं थी। वह इस बात का प्रमाण थी कि पाकिस्तान में क्षमता आज भी मौजूद है। बर्बादी अगर कहीं है तो उस क्षमता को लगातार और सही तरीके से इस्तेमाल न कर पाने में है।
पाकिस्तान को भारत से मुकाबला मैदान पर करना चाहिए, अपनी नीतियों और व्यवस्थाओं की कमजोरियों से नहीं भागना चाहिए। क्योंकि क्रिकेट में विरोधी टीम को हराने से एक मैच जीता जाता है, लेकिन अपनी कमियों को हराने से पूरी व्यवस्था मजबूत होती है।
भारत को दोष देने से पाकिस्तान क्रिकेट वापस पटरी पर नहीं आएगा। इसके लिए पाकिस्तान को अपने क्रिकेट का आईना खुद देखना होगा।
पाकिस्तान क्रिकेट को आत्ममंथन की जरूरत है, न कि दोषारोपण की, तभी वह फिर से विश्व विजेता बनने की राह पर लौट सकेगा।

