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    Home » भारत की नई रणनीतिक पहचान का परिचायक था ऑपरेशन सिंदूर
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    भारत की नई रणनीतिक पहचान का परिचायक था ऑपरेशन सिंदूर

    News DeskBy News DeskAugust 11, 2025Updated:August 11, 2025No Comments5 Mins Read
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    देवानंद सिंह
    22 अप्रैल की सुबह, पहलगाम की वादियां अचानक खामोश हो गईं थी। गोलियों और धमाकों की आवाज़ ने न सिर्फ घाटी, बल्कि पूरे देश को झकझोर दिया। यह आतंकी हमला सिर्फ सुरक्षा बलों पर हमला नहीं था, बल्कि भारत की धैर्य सीमा को परखने की कोशिश थी। 23 अप्रैल को, दिल्ली में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह तीनों सेनाओं के प्रमुख और शीर्ष सुरक्षा नेतृत्व की बैठक में माहौल असाधारण रूप से गंभीर था। यहीं वह निर्णायक क्षण आया, जब रक्षा मंत्री ने साफ कहा कि बस, अब बहुत हो चुका।

    उस वक्त जो हुआ, वह हालिया भारतीय सुरक्षा नीति का एक अहम मोड़ था। तीनों सेनाओं को पूरी छूट दी गई, यानी ऑपरेशन की रूपरेखा और दायरा तय करने का पूरा अधिकार। दरअसल, यही से जन्म हुआ ऑपरेशन सिंदूर का, एक ऐसी कार्रवाई, जिसने सिर्फ चार दिनों में पाकिस्तान को सैन्य, मनोवैज्ञानिक और कूटनीतिक स्तर पर झकझोर दिया। भारतीय सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने IIT मद्रास में अपने संबोधन में साफ कहा कि यह संघर्ष महज़ एक मोर्चे पर नहीं, बल्कि कई स्तरों पर लड़ा गया। कुछ दिखा, और कुछ पर्दे के पीछे था। उन्होंने इसे शतरंज का खेल बताया, जहां हर चाल सोची-समझी थी।

     

     

    ऑपरेशन सिंदूर में भारतीय सेना, वायुसेना और नौसेना ने समन्वित कार्रवाई की। एयर चीफ मार्शल ए.पी. सिंह के मुताबिक, भारतीय वायुसेना ने पांच पाकिस्तानी फाइटर जेट और एक बड़ा एयरक्राफ्ट गिराया। तकनीकी विश्लेषण से यह भी स्पष्ट हुआ कि वायुसेना के पास और भी लक्ष्य थे, जिन्हें मार गिराने की क्षमता थी, लेकिन राजनीतिक और सामरिक लक्ष्यों को ध्यान में रखते हुए कार्रवाई सीमित रखी गई। नौसेना ने अरब सागर और कराची पोर्ट के पास निगरानी बढ़ाकर पाकिस्तानी नौसैनिक गतिविधियों को सीमित कर दिया। थल सेना ने नियंत्रण रेखा के कई सेक्टरों में जवाबी फायरिंग के साथ-साथ ऑपरेशन-विशेष कमांडो कार्रवाई भी अंजाम दी। चार दिनों में पाकिस्तान की अग्रिम चौकियां, सप्लाई डिपो और संचार केंद्रों को गहरी क्षति पहुंचाई गई। जनरल द्विवेदी का एक बयान यहां खास मायने रखता है। उन्होंने कहा कि युद्ध में नैरेटिव मैनेजमेंट की अहम भूमिका होती है। पाकिस्तान ने अपने नुकसान को छुपाने और घरेलू राजनीति को साधने के लिए अपने आर्मी चीफ असीम मुनीर को ‘फाइव-स्टार जनरल’ और ‘फील्ड मार्शल’ बना दिया। यह एक सोची-समझी छवि-निर्माण रणनीति थी, मानो प्रमोशन ही जीत का सबूत हो।

     

    पाकिस्तानी मीडिया ने इसे इस तरह पेश किया कि भारत के साथ संघर्ष में उनकी ‘रणनीतिक जीत’ हुई, लेकिन अंतरराष्ट्रीय मीडिया, उपग्रह तस्वीरों और खुफिया रिपोर्टों ने साफ कर दिया कि वास्तविकता इसके विपरीत थी।भारत ने यहां अलग रास्ता अपनाया—कार्रवाई के तुरंत बाद ब्रीफिंग सीमित रखी गई, ताकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह संघर्ष ‘रक्षात्मक प्रतिक्रिया’ के रूप में देखा जाए, न कि ‘युद्ध भड़काने’ के तौर पर। यह रणनीति न केवल सैन्य रूप से, बल्कि कूटनीतिक मोर्चे पर भी कारगर साबित हुई।
    भारतीय सेना प्रमुख का बयान इस ऑपरेशन के सबसे अहम पहलू राजनीतिक इच्छाशक्ति पर रोशनी डालता है। जनरल द्विवेदी ने कहा कि उन्हें ‘पूरी तरह फ्री हैंड’ दिया गया, और यह भरोसा पहली बार इतने स्पष्ट रूप से महसूस हुआ। पिछले दशकों में कई बार भारत की सैन्य कार्रवाइयां ‘राजनीतिक हिचक’ के कारण सीमित रही हैं, लेकिन इस बार केंद्र सरकार ने सख्त रुख अपनाया। कोई समयसीमा नहीं, कोई तय पैमाना नहीं, सिर्फ स्पष्ट लक्ष्य: पाकिस्तान को उसकी आक्रामक नीति का जवाब देना और भविष्य के हमलों के लिए हतोत्साहित करना। एयर चीफ मार्शल ए.पी. सिंह ने भी इसे ‘निर्णायक समर्थन’ बताया और कहा कि जब शीर्ष राजनीतिक नेतृत्व और सेना एक ही पृष्ठ पर होते हैं, तो नतीजे तेज़ और प्रभावी आते हैं।
    ऑपरेशन सिंदूर का असर सिर्फ नियंत्रण रेखा तक सीमित नहीं रहा। संयुक्त राष्ट्र, अमेरिका, यूरोपीय संघ और खाड़ी देशों ने आधिकारिक बयान में ‘भारतीय प्रतिक्रिया को सीमित और लक्षित’ बताया। यह भारत की कूटनीतिक सफलता थी कि कार्रवाई के बावजूद अंतरराष्ट्रीय मंच पर आक्रामक के बजाय ‘रक्षात्मक राष्ट्र’ की छवि बनी रही।

     

    पाकिस्तान को यहां दोहरी चोट लगी, एक ओर सैन्य मोर्चे पर हार, दूसरी ओर अंतरराष्ट्रीय समर्थन की कमी। चीन ने औपचारिक रूप से पाकिस्तान के पक्ष में कोई सख्त बयान नहीं दिया, जबकि सऊदी अरब और यूएई ने भी चुप्पी साधे रखी। पाकिस्तानी सेना और सरकार ने अपनी जनता को यह यकीन दिलाने की कोशिश की कि उन्होंने भारत को रोका, बल्कि हराया। यह मनोवैज्ञानिक युद्ध का हिस्सा था कि हार मानना न सिर्फ मनोबल गिराता, बल्कि राजनीतिक अस्थिरता भी पैदा करता।

    जनरल द्विवेदी ने व्यंग्य में कहा कि अगर आप किसी पाकिस्तानी से पूछेंगे कि ऑपरेशन सिंदूर में वे जीते या हारे, तो वो यही कहेंगे कि हमारे आर्मी चीफ फील्ड मार्शल बन गए, इसका मतलब हम जीते होंगे। यह टिप्पणी पाकिस्तान की आंतरिक प्रचार रणनीति को उजागर करती है।
    कुल मिलाकर, ऑपरेशन सिंदूर महज़ एक सैन्य जीत नहीं, बल्कि यह भारत की नई रणनीतिक सोच का प्रतीक है, जहां राजनीतिक स्पष्टता, सैन्य दक्षता और कूटनीतिक चातुर्य एक साथ काम करते हैं। चार दिन की यह लड़ाई पाकिस्तान के लिए सिर्फ एक मोर्चे पर हार नहीं थी, बल्कि उसके नैरेटिव, कूटनीतिक स्थिति और सैन्य मनोबल पर चोट थी। भारत ने यह साबित कर दिया कि अब वह आतंक और उकसावे पर लंबा इंतज़ार नहीं करेगा, बल्कि तय समय, जगह और तरीके से जवाब देगा, और वह भी इस तरह कि दुश्मन को समझ ही न आए कि अगली चाल कब और कहां से आएगी।

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