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    Home » कितना कारगर होगा कांग्रेस का तीन एम का फार्मूला 
    झारखंड

    कितना कारगर होगा कांग्रेस का तीन एम का फार्मूला 

    nizamBy nizamOctober 3, 2026No Comments4 Mins Read
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    जेपी गुप्ता

    लखनऊ। उत्तर प्रदेश की सियासत में कांग्रेस एक बार फिर अपने खोए हुए जनाधार की तलाश में नए सामाजिक समीकरणों की बिसात बिछायी है। कभी प्रदेश की राजनीति में अग्रिम पंक्ति में खड़ी रहने वाली कांग्रेस आज अपने सबसे कठिन दौर से गुजर रही है। उसकी सिकुड़ती राजनीतिक जमीन को विस्तार देने के तमाम प्रयास अपेक्षित परिणाम नहीं दे सके । वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी ने तीन एम—महिला, महीदेव यानी ब्राह्मण और मुस्लिम—के सहारे अपनी सियासी किस्मत संवारने का नया दांव चला है।

    प्रदेश कांग्रेस की कमान रामपुर खास से लगातार तीन बार विधायक निर्वाचित हो चुकीं आराधना मिश्रा को सौंपकर पार्टी नेतृत्व ने महिला और ब्राह्मण नेतृत्व के साथ ही मुस्लिम समुदाय से आने वाले इमरान मसूद को कार्यकारी अध्यक्ष की जिम्मेदारी देकर सामाजिक संतुलन साधने की कोशिश की है। यह महज संगठनात्मक फेरबदल नहीं, बल्कि कांग्रेस की उस राजनीतिक रणनीति का हिस्सा है, जिसके जरिए वह उत्तर प्रदेश में अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा और राजनीतिक जमीन वापस पाना चाहती है।

    आराधना मिश्रा का राजनीतिक सफर अनुभव और पारिवारिक विरासत से जुडा हुआ है l वह वर्ष 2014 के विधानसभा उपचुनाव में पहली बार विधानसभा पहुंचीं। इसके बाद लगातार तीन बार रामपुर खास से जीत दर्ज कर उन्होंने अपनी राजनीतिक परिपकवता का परिचय दिया l वर्तमान में वह कांग्रेस विधानमंडल दल की नेता हैं। उनके पिता प्रमोद तिवारी प्रदेश की राजनीति के अनुभवी और प्रतिष्ठित नेताओं में गिने जाते हैं। ऐसे में संगठन को मजबूत करने और प्रदेश की सियासत की जटिलताओं को समझने में उन्हें अपने पिता के राजनीतिक अनुभव का लाभ मिल सकता है।

    अध्यक्ष और कार्यकारी अध्यक्ष के बीच बेहतर तालमेल, संगठन के भीतर समन्वय और जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं को सक्रिय करना नए नेतृत्व की सबसे बड़ी कसौटी होगी। सामाजिक समीकरणों का गणित तभी कारगर होगा, जब उसके साथ संगठनात्मक एकजुटता और जनविश्वास की पूंजी भी जुड़ सके। नेतृत्व के दोनों प्रमुख चेहरों के बीच सामंजस्य बिगड़ने की स्थिति में पार्टी की रणनीति को झटका लग सकता है।

    दूसरी ओर, विपक्षी इंडिया गठबंधन के भीतर वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर सीटों के संभावित बंटवारे की चुनौती भी सामने है। कांग्रेस एक तरफ गठबंधन में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने की कोशिश में है, तो दूसरी ओर प्रदेश में अपनी स्वतंत्र राजनीतिक ताकत का प्रदर्शन भी करना चाहती है। ऐसे में नेतृत्व परिवर्तन को संगठनात्मक पुनर्गठन के साथ-साथ गठबंधन की राजनीति में अपनी स्थिति मजबूत करने की भी है।

    कभी ब्राह्मण, दलित और अल्पसंख्यक समुदाय पार्टी की राजनीतिक ताकत के प्रमुख स्तंभ हुआ करते थे। लेकिन 1989 के बाद उत्तर प्रदेश की राजनीति में आए व्यापक बदलावों ने इस सामाजिक ताने-बाने को बिखेर दिया। मंडल और कमंडल की राजनीति ने सत्ता के समीकरण बदल दिए। दलित मतदाताओं का बड़ा हिस्सा बहुजन समाज पार्टी की ओर आकर्षित हुआ, ब्राह्मण मतदाताओं के बीच भारतीय जनता पार्टी का प्रभाव बढ़ा और अल्पसंख्यक मतदाताओं का एक बड़ा वर्ग समाजवादी पार्टी के साथ जुड़ता चला गया। अयोध्या में राम मंदिर-बाबरी मस्जिद विवाद ने भी प्रदेश की राजनीति को नई दिशा देने में अहम भूमिका निभाई।

    अब बदलते राजनीतिक परिदृश्य में भाजपा के भीतर ब्राह्मण समुदाय की कथित नाराजगी और विपक्षी दलों के बीच सामाजिक समीकरणों की नई हलचल को देखते हुए कांग्रेस ने ब्राह्मण और मुस्लिम नेतृत्व को एक साथ आगे किया है। पार्टी की रणनीति पुराने सामाजिक आधार को फिर से जोड़ने और नए राजनीतिक अवसरों का लाभ उठाने की है। क्या आराधना मिश्रा अपने राजनीतिक अनुभव और महिला नेतृत्व की पहचान के सहारे कांग्रेस को नई ऊर्जा दे पाएंगी? क्या इमरान मसूद के साथ उनका समन्वय पार्टी के सामाजिक विस्तार का आधार बनेगा? और क्या यह नया प्रयोग कांग्रेस को 2027 की चुनावी जंग में प्रभावी भूमिका निभाने का अवसर देगा?

    क्या कांग्रेस अतीत की विरासत को वर्तमान की राजनीतिक जरूरतों से जोड़ने की बड़ी चुनौती है l तीन एम का यह नया प्रयोग पार्टी के लिए संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, लेकिन इसकी सफलता का फैसला केवल नेतृत्व की नियुक्तियों से नहीं, बल्कि बूथ स्तर तक संगठन की मजबूती, कार्यकर्ताओं की सक्रियता और जनता के बीच पार्टी की स्वीकार्यता से होगा।

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