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    “झारखंड की नल-जल योजना: पानी पर टिकी राजनीति और नीतियों की सूखती धार”

    Nizam KhanBy Nizam KhanJuly 8, 2025No Comments3 Mins Read
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    “झारखंड की नल-जल योजना: पानी पर टिकी राजनीति और नीतियों की सूखती धार”

    *संपादक देवानंद सिंह से बातचीत के आधार पर निजाम खान की रिपोर्ट*

    जल—यह शब्द जितना सरल लगता है, उतना ही यह जीवन का गूढ़ तत्त्व है। लेकिन झारखंड में यह अब एक विकास के सवाल से ज्यादा राजनीति और प्रशासनिक जड़ता का प्रतीक बन गया है। देश भर में हर घर नल-जल योजना के तहत जिस लक्ष्य को लेकर एक ‘जल क्रांति’ की परिकल्पना की गई थी, वह झारखंड में अधूरी पाइपलाइन और सूखते वादों के बीच दम तोड़ती दिख रही है।

    —

    1. योजना की गंगा, झारखंड में क्यों सूखी?

    जब 2019 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जल जीवन मिशन की शुरुआत की थी, तब एक आशा जगी थी कि गांव-गांव, घर-घर नल से पानी पहुंचेगा। लेकिन आज 2025 में झारखंड जैसे राज्य में इस योजना की तस्वीर अधूरी और असंतुलित है।
    राज्य सरकार के आंकड़ों के अनुसार अब तक सिर्फ 55% घरों तक ही पानी पहुंच सका है, जबकि लक्ष्य 100% का था।

    सवाल उठता है – योजना अधूरी क्यों रह गई?

    —

    2. केंद्र-राज्य की फंडिंग तकरार: असल में यह राजनीतिक टकराव है

    केंद्र सरकार ने अब झारखंड को यह साफ कर दिया है कि वह योजना के शेष हिस्से का पूरा फंड नहीं देगा। अब राज्य को स्वयं आगे बढ़कर योजना पूरी करनी होगी।
    क्या यह निर्णय तकनीकी है या राजनीतिक?
    वास्तव में, जब दो अलग-अलग राजनीतिक दलों की सरकारें केंद्र और राज्य में होती हैं, तो योजनाएं अक्सर विकास के बजाय वैमनस्य का शिकार हो जाती हैं। जल जीवन मिशन का झारखंड में ठहर जाना भी इसी राजनीति की देन लगती है।

    —

    3. ज़मीनी सच्चाई: जिले-दर-जिले बिखरी असमानता

    कुछ जिलों में प्रदर्शन शानदार है –

    सिमडेगा 92.93%

    पलामू 75.25%

    लातेहार 72.75%

    लेकिन कुछ ज़िलों में यह स्थिति चिंताजनक है –

    जमशेदपुर केवल 36.96%

    यह दर्शाता है कि राज्य के भीतर भी संसाधनों और प्रयासों का वितरण असमान है। कहीं प्रशासनिक इच्छाशक्ति, कहीं बजट की कमी, और कहीं नीति निर्धारण की विफलता योजना को आगे बढ़ने नहीं दे रही।

    —

    4. पानी केवल योजना नहीं, यह जीवन का सवाल है

    पेयजल से जुड़े सवालों को योजनाओं की “फाइलों” और बजट की “तालिकाओं” तक सीमित नहीं किया जा सकता।
    बच्चों की सेहत, महिलाओं का श्रम, ग्रामीण विकास, और कृषि की रीढ़ — ये सभी सीधे स्वच्छ और नियमित जल आपूर्ति पर निर्भर हैं।

    5. झारखंड को चाहिए नीति, नहीं तो नीयत पर सवाल उठेगा

    अब सवाल यह नहीं कि फंड क्यों नहीं मिला।
    सवाल यह है कि क्या झारखंड सरकार के पास एक वैकल्पिक रोडमैप है या नहीं?
    क्या वह CSR, विश्व बैंक, ADB जैसे बाहरी स्रोतों से सहायता लेने को तैयार है?
    क्या उसने पिछले 5 वर्षों में जल निगम और PHED को मजबूत करने की दिशा में कोई ठोस कदम उठाया?

    —

    6. जनता की प्यास को राजनीति का हथियार न बनाएं

    यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि जब झारखंड के गांवों में बच्चे बाल्टी लेकर एक बूंद पानी के लिए सड़क पार करते हैं, तब राजधानी में बैठी सरकारें बजट, फंड और पत्राचार में उलझी रहती हैं।
    विकास का असली मतलब है – जरूरतमंद तक संसाधन पहुंचाना।

    जल जीवन मिशन की यह स्थिति केवल एक अधूरी योजना नहीं है — यह राज्य की प्रशासनिक मानसिकता का आइना है।
    झारखंड सरकार को अब राजनीतिक मतभेद छोड़कर एक जन-केंद्रित रणनीति अपनानी होगी।
    केंद्र को भी इस बात को समझना होगा कि एक राज्य की विफलता, पूरे देश की जिम्मेदारी होती है।

    राज्य और केंद्र — दोनों को मिलकर जल नीति को सहयोग, संवेदना और समर्पण से लागू करना होगा।
    क्योंकि अंततः पानी पर राजनीति नहीं, नीति की आवश्यकता होती है।

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