“खून के रिश्तों से बड़ा नहीं जमीन का टुकड़ा – गढ़वा SDM संजय पांडे की मानवीय पहल”
*संपादक के आदेश से बिना एसडीएम संजय पांडे से मिले निजाम खान की एक रिपोर्ट*
झारखंड के गढ़वा सबडिविजन के अनुमंडल पदाधिकारी (एसडीएम) संजय पांडे ने एक बार फिर साबित कर दिया कि प्रशासनिक कुर्सी केवल आदेश देने के लिए नहीं होती, बल्कि समाज को जोड़ने, सहेजने और दिशा देने का माध्यम भी बन सकती है।
जब उनके न्यायालय में खून के रिश्तों – भाई-भाई, चाचा-भतीजा, बाप-बेटे के बीच भूमि विवाद को लेकर मामले आते हैं, तो वह पहले कानून की सख्ती के बजाय संबंधों की नर्मी और संवाद की शक्ति का सहारा लेते हैं। यही उनके कार्यशैली को भीड़ से अलग करता है।
अदालत नहीं, समझौते से समाधान की राह
इस आधुनिक दौर में संयुक्त परिवारों का बिखरना एक सामाजिक विडंबना बन चुका है, और भूमि विवाद इस विघटन की सबसे बड़ी वजह बन रहे हैं।
एसडीएम संजय पांडे ने जब कहा कि “मुझे पीड़ा होती है जब खून के रिश्ते अदालत में एक-दूसरे से लड़ते हैं”, तो उसमें केवल एक अधिकारी नहीं, बल्कि एक भावुक समाजसेवी की चेतना झलकती है।
वह हर ऐसे मामले में पहले समझौते की पहल करते हैं। बहुत से मामलों में वह सफल भी हुए हैं। आज जब न्यायिक संस्थाएं बोझ से दबी हुई हैं, और लोग वर्षो तक न्याय की प्रतीक्षा करते हैं, ऐसे में आपसी सहमति से समाधान केवल मुकदमे से मुक्ति ही नहीं, बल्कि रिश्तों को बचाने की संजीवनी बन सकता है।
भाईचारे की भावना को पुनर्जीवित करने की कोशिश
संजय पांडे ने अपने क्षेत्रवासियों से जो अपील की है, वह अपने आप में एक सामाजिक अभियान का स्वरूप ले सकती है। उन्होंने कहा कि अगर ज़मीन विवाद है, तो पहले परिवार में, फिर समाज में समाधान तलाशें। नापी, पैमाइश और लोक अदालत जैसे सरल उपायों को अपनाएं – ताकि न्यायालय की देहरी रिश्तों का श्मशान न बने।
उनकी ये बात सुनहरी सीख जैसी है –
> “यदि विवाद को हल करने के लिए बड़े भाई को थोड़ा त्याग करना पड़े तो वह छोटा नहीं होगा,
और अगर छोटा भाई झुक जाये तो उसका कद और ऊंचा हो जाएगा।”
यह एक नई न्याय संस्कृति की शुरुआत है – जहाँ सिद्धांत के साथ संवेदनाएं, और कानून के साथ करुणा भी स्थान पाती है।
आज की जरूरत: न्यायपालिका में मानवीयता की पुनर्स्थापना
झारखंड जैसे राज्य में, जहाँ सामाजिक ढांचा संवेदनशील और जमीनी विवाद आम हैं, वहां यदि हर SDM, CO, थाना प्रभारी, BDO या DM संजय पांडे जैसी सोच अपनाएं, तो सैकड़ों मुकदमे पैदा ही नहीं होंगे।
यह केवल जमीन का विवाद नहीं होता, यह अक्सर मान, सम्मान और संबंध की लड़ाई होती है – जिसे अदालत की ठंडी प्रक्रिया नहीं, बल्कि आत्मीय संवाद ही सुलझा सकता है।
गढ़वा SDM संजय पांडे केवल एक अधिकारी नहीं, एक सामाजिक दिशा निर्माता बनकर उभरे हैं।
जहां बाकी अफसर पद और प्रतिष्ठा की दौड़ में लगे हैं, वहीं उन्होंने संवेदना और समाधान की लकीर खींच दी है।
यदि झारखंड के हर जिले में एक संजय पांडे हो, तो शायद झारखंड केवल खनिज संपदा का नहीं, सामाजिक सौहार्द का भी सबसे समृद्ध राज्य बन सके।

