लेखक: देवानंद सिंह
लोकतंत्र में सत्ता को मजबूत बनाने का आधार
लोकतंत्र में सत्ता को मजबूत बनाने का काम केवल बहुमत नहीं करता, बल्कि एक मजबूत विपक्ष, स्वतंत्र संस्थाएं और सवाल पूछने वाली जनता करती है। विपक्ष को उपहास या अपमानजनक शब्दों में संबोधित करना राजनीतिक शैली का हिस्सा भले माना जाए, लेकिन इससे लोकतांत्रिक संवाद की गरिमा जरूर घटती है।
आज देश के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है क्या सरकार से सवाल पूछना विरोध है, या लोकतंत्र की अनिवार्य प्रक्रिया?
इतिहास से सीख
आजादी के बाद के शुरुआती दशकों में राजनीतिक मतभेद बेहद तीखे थे, लेकिन संसद में बहस और असहमति के लिए जगह थी। नेहरू के दौर में बड़े बांधों, IIT और AIIMS जैसी संस्थाओं से लेकर औद्योगिक विकास की आधारभूत संरचना तैयार हुई। चीन युद्ध के बाद सरकार को संसद में तीखे सवालों का सामना करना पड़ा। सत्ता के पास बहुमत था, लेकिन विपक्ष की आवाज संसद से बाहर नहीं की गई।
बाद के दौर में बैंक राष्ट्रीयकरण, हरित क्रांति, पंचायती राज, दूरसंचार विस्तार, मनरेगा और सूचना का अधिकार जैसे बड़े फैसलों ने देश की दिशा बदली। इन नीतियों पर मतभेद भी हुए, राजनीतिक संघर्ष भी हुआ, लेकिन संस्थागत बहस लोकतंत्र का हिस्सा बनी रही।
राजनीतिक संवाद का गिरता स्तर
आज राजनीतिक संवाद का स्तर बदलता दिखाई देता है। चुनावी भाषणों से लेकर सोशल मीडिया तक व्यक्तिगत कटाक्ष बढ़े हैं। सत्ता विपक्ष पर हमला करती है और विपक्ष सत्ता के हर कदम को कठघरे में खड़ा करता है। समस्या किसी एक दल की नहीं, बल्कि उस राजनीतिक संस्कृति की है जिसमें नीति से ज्यादा व्यक्ति और तथ्य से ज्यादा नारा महत्वपूर्ण हो गया है।
युवाओं का सवाल
युवाओं का सवाल सबसे गंभीर है।
रोजगार, प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित पेपर लीक, भर्ती प्रक्रिया में देरी और शिक्षा का बढ़ता खर्च इन सवालों का उत्तर किसी जुमले से नहीं दिया जा सकता। आंदोलन कर रहा युवा स्वतः राष्ट्रविरोधी नहीं हो जाता और सरकार से सवाल पूछ रहा पत्रकार स्वतः किसी राजनीतिक षड्यंत्र का हिस्सा नहीं बन जाता।
असहमति लोकतंत्र की कमजोरी नहीं, उसकी पहचान है।
विकास के प्रतीकों पर सवाल
विकास के बड़े प्रतीकों पर भी यही सिद्धांत लागू होना चाहिए। स्टैच्यू ऑफ यूनिटी जैसी परियोजनाएं पर्यटन और राष्ट्रीय स्मृति के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण हो सकती हैं, लेकिन उनकी लागत, पर्यावरणीय प्रभाव, स्थानीय लोगों के हित और आर्थिक लाभ पर सवाल उठाना भी उतना ही लोकतांत्रिक अधिकार है।
UPI की सफलता और चुनौतियां
इसी तरह UPI की सफलता को किसी एक सरकार की उपलब्धि बताना भी उचित नहीं होगा। भारत की डिजिटल भुगतान व्यवस्था वर्षों की संस्थागत तैयारी, NPCI, RBI, बैंकों, तकनीकी विशेषज्ञों और विभिन्न सरकारों के योगदान का परिणाम है। आज इसकी सफलता के साथ साइबर धोखाधड़ी की चुनौती भी सामने है। इसलिए डिजिटल क्रांति का जश्न मनाते समय नागरिकों के पैसे और डेटा की सुरक्षा को भी उतनी ही प्राथमिकता मिलनी चाहिए।
जांच एजेंसियों पर सवाल
केंद्रीय जांच एजेंसियों को लेकर उठते राजनीतिक सवाल भी गंभीर हैं। ED, CBI और आयकर विभाग यदि निष्पक्ष हैं तो उनके कामकाज पर उठने वाले आरोपों का जवाब पारदर्शी आंकड़ों और न्यायिक प्रक्रिया से दिया जाना चाहिए। विपक्ष को भी आरोप लगाने से आगे बढ़कर प्रमाण प्रस्तुत करने चाहिए।
कॉरपोरेट ताकत और पारदर्शिता
इसी तरह कॉरपोरेट घरानों की आर्थिक ताकत पर बहस को भी राजनीतिक आरोपों से ऊपर उठाना होगा। बड़े उद्योगों की वृद्धि अर्थव्यवस्था के लिए जरूरी है, लेकिन सार्वजनिक संपत्तियों, प्राकृतिक संसाधनों और सरकारी परियोजनाओं में निजी कंपनियों की बढ़ती भूमिका के साथ पारदर्शिता, प्रतिस्पर्धा और नियामकीय निगरानी भी जरूरी है।
लोकतंत्र में किसी उद्योगपति का बड़ा होना समस्या नहीं है।
समस्या तब होगी, जब व्यवस्था इतनी कमजोर हो जाए कि सवाल पूछने वाला छोटा और सत्ता के करीब होना ही सबसे बड़ी ताकत बन जाए।
लोकतंत्र की असली ताकत
इसलिए देश को न अंधभक्ति चाहिए, न अंधविरोध।
सरकार से सवाल भी पूछे जाने चाहिए और विपक्ष से भी। उद्योगपतियों से जवाब भी मांगा जाना चाहिए और जांच एजेंसियों से भी। मीडिया को भी सत्ता और विपक्ष दोनों से समान दूरी रखते हुए जनता के पक्ष में खड़ा होना चाहिए।
क्योंकि लोकतंत्र केवल पांच साल में एक बार वोट डालने का नाम नहीं है।
लोकतंत्र वह व्यवस्था है जिसमें चुनी हुई सत्ता को हर दिन जनता के सवालों का जवाब देना पड़ता है।
सत्ता बदलती रहती है, दल बदलते रहते हैं, चेहरे बदलते रहते हैं लेकिन संस्थाएं और लोकतांत्रिक मूल्य स्थायी होने चाहिए।
आज जरूरत है ऐसी राजनीति की, जिसमें भाषण कम और जवाब ज्यादा हों; प्रचार कम और नीति ज्यादा हो; व्यक्तिपूजा कम और संस्थाओं का सम्मान ज्यादा हो।
किसी सरकार की सबसे बड़ी ताकत यह नहीं कि उसके खिलाफ कोई आवाज न उठे।
सबसे बड़ी ताकत यह है कि उसके खिलाफ उठने वाली आवाज को सुनने का साहस उसमें मौजूद हो।
भारत के लोकतांत्रिक ढांचे के बारे में अधिक जानने के लिए भारत निर्वाचन आयोग की वेबसाइट देखें।

