संघ और सरकार देखें सफेदपोश का लबादा
दूसरे की जमीन पर कब्जे के आरोप से लेकर ऑटो क्लस्टर में कथित अनियमित नियुक्ति तक उठे गंभीर सवाल
राष्ट्र संवाद संवाददाता
जमशेदपुर। किसी भी संगठन की पहचान उसके पदाधिकारियों के आचरण, अनुशासन और सार्वजनिक जीवन में पारदर्शिता से बनती है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे संगठन से जुड़े व्यक्ति से समाज स्वाभाविक रूप से चरित्र, अनुशासन, कानून के पालन और मर्यादित आचरण की अपेक्षा करता है। ऐसे में यदि किसी प्रमुख पदाधिकारी पर दूसरे की जमीन में हस्तक्षेप, वृक्षारोपण या नाला निर्माण तथा सक्षम प्राधिकरण के निर्देशों की अनदेखी जैसे आरोप लगते हैं, तो इनकी निष्पक्ष जांच जरूरी हो जाती है।
मामला केवल निजी जमीन के विवाद तक सीमित नहीं दिखता। आदित्यपुर स्थित ऑटो क्लस्टर के संचालन और निदेशक मंडल को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए जा रहे हैं। आरोप है कि एक ऐसे व्यक्ति को स्वतंत्र निदेशक बनाया गया, जो संबंधित औद्योगिक संगठन एसिया में पदधारी होने के साथ ऑटो क्लस्टर का शेयरधारक भी है। यदि ऐसा है, तो कंपनी अधिनियम, मेमोरेंडम एवं आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन के प्रावधानों के आलोक में उसकी नियुक्ति की वैधानिकता स्पष्ट की जानी चाहिए। हालांकि इन आरोपों की पुष्टि संबंधित दस्तावेजों और सक्षम प्राधिकरण की जांच से ही हो सकती है।
ऑटो क्लस्टर की स्थापना का उद्देश्य आदित्यपुर और झारखंड के उद्योगों को तकनीकी एवं औद्योगिक सुविधाएं उपलब्ध कराना था। केंद्र और राज्य सरकारों के बड़े वित्तीय योगदान तथा औद्योगिक भूमि के इस्तेमाल से बनी इस संस्था के व्यावसायिक उपयोग, विशेषकर मैरिज हॉल के रूप में संचालन और कथित कमीशन व्यवस्था के आरोप भी गंभीर हैं। यदि ऐसे आयोजन हो रहे हैं, तो यह भी सार्वजनिक होना चाहिए कि इसके लिए बोर्ड की अनुमति, निर्धारित नियम और वित्तीय प्रक्रिया क्या है।
सरकार के नामित निदेशक और संबंधित विभाग इस पूरे मामले की दस्तावेज आधारित स्वतंत्र जांच कराएं। जमीन विवाद हो या निदेशक की नियुक्ति, ऑटो क्लस्टर के उपयोग का सवाल हो या वित्तीय लेन-देन—हर आरोप का जवाब रिकॉर्ड से मिलना चाहिए।
किसी व्यक्ति को केवल आरोपों के आधार पर दोषी ठहराना उचित नहीं है, लेकिन किसी संगठन या सरकारी सहयोग से बनी संस्था से जुड़े पदाधिकारी पर लगातार गंभीर सवाल उठें और उनकी जांच भी न हो, तो इससे संस्थाओं की विश्वसनीयता प्रभावित होती है। संगठन और सरकार, दोनों के लिए यही उचित होगा कि वे व्यक्ति नहीं, तथ्यों और नियमों के आधार पर निर्णय लें।

