एक गहरी कूटनीतिक सोच का हिस्सा रही जयशंकर की चीन यात्रा
देवानंद सिंह
भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर की गत दिनों चीन यात्रा ने न केवल एशिया की दो प्रमुख शक्तियों के बीच संबंधों को पुनः परिभाषित करने की कोशिश की है, बल्कि वैश्विक भू-राजनीतिक परिदृश्य में भारत की संतुलनकारी नीति की भी झलक दी है। यह यात्रा उस समय हुई है, जब भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव चरम पर रहा, और चीन खुलकर पाकिस्तान के पक्ष में खड़ा दिखाई दिया। ऐसे में, यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या जयशंकर की यह यात्रा भारत की रणनीतिक आत्मनिर्भरता का प्रतीक है, या यह अमेरिका और चीन के बीच की खींचतान में भारत की विवशता का एक रूप है?
2020 के गलवान संघर्ष के बाद भारत-चीन संबंधों में भारी दरार आई थी। बीते वर्षों में सीमा पर सैन्य तनाव और राजनयिक खटास दोनों ही उच्चतम स्तर पर थे। चीन के साथ भारत की सीमा लगभग 3,488 किलोमीटर लंबी है, जो नदियों, झीलों और दुर्गम पहाड़ी इलाकों से गुजरती है। इस क्षेत्र में सीमांकन की अस्पष्टता अकसर सैन्य टकराव का कारण बनती है। जयशंकर की यह चीन यात्रा ऐसे दौर में हुई जब दोनों देश इस तनाव को संभालने और संवाद की राह पर लौटने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन क्या यह यात्रा महज़ प्रतीकात्मक थी या एक ठोस रणनीतिक पहल?
आज की अंतरराष्ट्रीय राजनीति बहुध्रुवीय हो चुकी है, जहां केवल दो ध्रुव अमेरिका और रूस निर्णायक नहीं हैं। चीन, भारत, यूरोप, खाड़ी देश, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका भी वैश्विक विमर्श को प्रभावित कर रहे हैं। विदेश मंत्री जयशंकर की यात्रा इसी बहुध्रुवीयता को ध्यान में रखकर समझी जानी चाहिए। कूटनीतिक मामलों की विशेषज्ञ श्रुति पांडले के अनुसार, भारत अब समझ गया है कि स्थिर और पारंपरिक गठजोड़ों का युग बीत गया है। ट्रंप, पुतिन और शी जिनपिंग जैसे नेताओं के निर्णय वैश्विक राजनीति को अस्थिर बना सकते हैं। भारत अब ट्रांसनेशनल दृष्टिकोण अपना रहा है, जहां गठबंधन स्थायी नहीं बल्कि उद्देश्य आधारित होते हैं। अमेरिका की अनिश्चित नीतियों के चलते भारत को अपनी कूटनीतिक रणनीतियों में लचीलापन लाना पड़ा है। यही कारण है कि भारत न केवल क्वाड के साथ खड़ा है, बल्कि एससीओ, ब्रिक्स और RIC (रूस-भारत-चीन) जैसे मंचों पर भी सक्रिय है।
जयशंकर की यात्रा के संदर्भ में सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब हाल ही में चीन ने भारत-पाक संघर्ष में खुलकर पाकिस्तान का समर्थन किया, तब चीन जाना क्या सही था? विपक्षी दलों ने सवाल भी उठाए कि चीन, जो पाकिस्तान को हथियार मुहैया करवा रहा था, उसके साथ संवाद का क्या औचित्य है? इस पर दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रो. राजीव रंजन स्पष्ट रूप से कहते हैं कि अगर भारत चीन से संवाद नहीं करता, तो यह स्थान पाकिस्तान भर सकता है।
2026 में भारत में होने वाले ब्रिक्स सम्मेलन और शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) जैसे बहुपक्षीय मंचों पर भारत की भागीदारी आवश्यक है। चीन की अनुपस्थिति इन मंचों को अप्रासंगिक बना सकती है या उन्हें पाकिस्तान और चीन के हितों का साधन बनने दे सकती है। भारत और चीन के बीच व्यापारिक संबंधों में बड़ा असंतुलन है। भारत चीन से सालाना लगभग 100 अरब डॉलर का आयात करता है, जबकि निर्यात बेहद कम है। जयशंकर ने इस मुद्दे को गंभीरता से उठाया है। सुरक्षा के मोर्चे पर चीन की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI), पाकिस्तान के साथ उसकी रणनीतिक निकटता और ब्रह्मपुत्र नदी पर गतिविधियां भारत की चिंताओं को और बढ़ाती हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि भारत ने अपनी चिंताओं को स्पष्ट शब्दों में सामने रखा है। वह मानती हैं कि चीन से बात करना आसान नहीं है, लेकिन वैश्विक भू-राजनीति का झुकाव इस समय भारत के पक्ष में है। जयशंकर ने भी यही संकेत दिया कि भारत अब रिएक्टिव नहीं बल्कि असर्टिव डिप्लोमेसी की ओर बढ़ रहा है। अमेरिका ने हाल ही में भारत और चीन दोनों पर टैरिफ लगाया। जहां चीन ने आक्रोशित प्रतिक्रिया दी, वहीं भारत ने संवाद का रास्ता चुना। ट्रंप की नीतियों ने एशिया में नए कूटनीतिक समीकरण जन्म दिए हैं। विशेषज्ञ कहते हैं कि अब अमेरिका के दबाव के कारण भारत और चीन एक बार फिर एक मंच पर आने को मजबूर हुए हैं। अमेरिका भारत से अपेक्षा करेगा कि वह चीन और रूस से दूरी बनाए, लेकिन भारत की रणनीति अब की है, जहां वह अमेरिका और चीन दोनों के साथ अपने हित के अनुसार संतुलन बनाना चाहता है।
भारत और चीन के संबंध सुधारने के लिए केवल संवाद पर्याप्त नहीं है। दोनों देशों के बीच विश्वास की भारी कमी है, जिसे दूर करना आसान नहीं। सीमा विवाद, तिब्बत, ब्रह्मपुत्र और दक्षिण चीन सागर पर मतभेद बने हुए हैं। ऐसे में भारत को सतर्क रहना होगा।
विशेषज्ञ मानते हैं कि तीन चीज़ें ज़रूरी हैं। संबंधों में स्थिरता, सीमा विवाद का समाधान और अमेरिका-पाकिस्तान को ध्यान में रखते हुए संतुलनकारी नीति की। विशेषज्ञों के अनुसार क्षेत्रीय सहयोग और संवाद को प्रभावी बनाना ज़रूरी है ताकि गलतफहमी की गुंजाइश ही न बचे। कुल मिलाकर, जयशंकर की यात्रा एक तरफ़ जहां भारत की परिपक्व कूटनीति को दिखाती है, वहीं यह भी स्पष्ट करती है कि भारत अब केवल भावनाओं या दबाव में निर्णय नहीं लेता। यह यात्रा बताती है कि भारत न तो चीन से कटना चाहता है और न ही अमेरिका के अधीन जाना चाहता है। वह संवाद, प्रतिस्पर्धा और सामरिक सहयोग, तीनों को संतुलित करने वाली रणनीति पर चल रहा है।
भारत-चीन संबंधों को ‘रीसेट’ करना कोई त्वरित प्रक्रिया नहीं है। यह एक धीमा, सतर्क और रणनीतिक संवाद है, जिसमें छोटी-छोटी सफलताएं भी बड़ी उपलब्धि मानी जाएंगी, लेकिन यह भी तय है कि जयशंकर की यह यात्रा केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि एक गहरी कूटनीतिक सोच का हिस्सा है, वह सोच जो भारत को एक बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में मजबूती से स्थापित करना चाहती है।


