Close Menu
Rashtra SamvadRashtra Samvad
    Facebook X (Twitter) Instagram
    Rashtra SamvadRashtra Samvad
    • होम
    • राष्ट्रीय
    • अन्तर्राष्ट्रीय
    • राज्यों से
      • झारखंड
      • बिहार
      • उत्तर प्रदेश
      • ओड़िशा
    • संपादकीय
      • मेहमान का पन्ना
      • साहित्य
      • खबरीलाल
    • खेल
    • वीडियो
    • ईपेपर
    Topics:
    • रांची
    • जमशेदपुर
    • चाईबासा
    • सरायकेला-खरसावां
    • धनबाद
    • हजारीबाग
    • जामताड़ा
    Rashtra SamvadRashtra Samvad
    • रांची
    • जमशेदपुर
    • चाईबासा
    • सरायकेला-खरसावां
    • धनबाद
    • हजारीबाग
    • जामताड़ा
    Home » क्या एक व्यापक सामाजिक गठजोड़ का संकेत है ठाकरे बंधुओं की ‘विजय रैली’ ?
    Breaking News Headlines उत्तर प्रदेश ओड़िशा खबरें राज्य से चाईबासा जमशेदपुर जामताड़ा झारखंड दुमका धनबाद धर्म पटना पश्चिम बंगाल बिहार बेगूसराय मुंगेर मुजफ्फरपुर रांची राजनीति राष्ट्रीय संथाल परगना संथाल परगना संपादकीय समस्तीपुर सरायकेला-खरसावां हजारीबाग

    क्या एक व्यापक सामाजिक गठजोड़ का संकेत है ठाकरे बंधुओं की ‘विजय रैली’ ?

    News DeskBy News DeskJuly 7, 2025No Comments4 Mins Read
    Share Facebook Twitter Telegram WhatsApp Copy Link
    Share
    Facebook Twitter Telegram WhatsApp Copy Link

    क्या एक व्यापक सामाजिक गठजोड़ का संकेत है ठाकरे बंधुओं की ‘विजय रैली’ ?
    देवानंद सिंह
    राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे साथ आएंगे या नहीं, महाराष्ट्र की राजनीति में यह सवाल वर्षों से अहम रहा है, लेकिन अब 2025 की ‘विजय रैली’ के बाद पूरी तरह से नए रूप में सामने आया है। यह सिर्फ एक रैली नहीं थी, बल्कि मराठी अस्मिता, क्षेत्रीय राजनीति और भाजपा के खिलाफ एक संभावित ध्रुवीकरण की दिशा में एक ‘टेस्ट रन’ भी थी। इस रैली के बहाने दोनों ठाकरे नेताओं ने न केवल भाषा आधारित पहचान की बात की, बल्कि एक व्यापक सामाजिक गठजोड़ का संकेत भी दिया।

     

    महाराष्ट्र सरकार ने स्कूलों में हिंदी को अनिवार्य बनाने की घोषणा की थी, जिसे व्यापक विरोध के बाद रद्द कर दिया गया। यह निर्णय केवल भाषा नीति नहीं बल्कि सत्ता और पहचान की राजनीति का ट्रिगर बिंदु बन गया। यह पहली बार है, जब राज और उद्धव ठाकरे दो दशकों बाद सार्वजनिक रूप से एक मंच पर एकजुट दिखे। और यह एकता किसी निजी पहल या पारिवारिक मेल-मिलाप की वजह से नहीं, बल्कि भाजपा की नीतियों के खिलाफ सामूहिक राजनीतिक प्रतिक्रिया के रूप में हुई।

    राज ठाकरे का ‘मराठी ही हमारा एकमात्र एजेंडा है’ और उद्धव ठाकरे का ‘हमें मराठी पहचान को बांटना नहीं है’ जैसे बयान इस बात का संकेत हैं कि आने वाले समय में ‘मराठी बनाम गैर-मराठी’ विमर्श और अधिक परिष्कृत तरीके से एक बार फिर लौट सकता है। रैली में भाजपा को ‘उपयोग करो और फेंको’ वाली पार्टी बताया गया और एकनाथ शिंदे पर ‘जय गुजरात’ का नारा लगाने की वजह से मराठी अस्मिता के साथ गद्दारी का आरोप लगाया गया, इससे स्पष्ट है कि आगामी चुनावों में ठाकरे-राज गठबंधन सीधे भाजपा और शिंदे खेमे को निशाना बनाएगा।

     

    राज ठाकरे की छवि एक समय तक भाजपा समर्थक नेता की रही है, जबकि उद्धव ठाकरे अब राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी गठबंधन I.N.D.I.A का चेहरा बनते जा रहे हैं। ऐसे में, सवाल यह है कि क्या व्यक्तिगत और वैचारिक भिन्नताओं के बावजूद दोनों एक स्थायी गठबंधन बना सकते हैं? नीचे स्तर पर, शिवसेना (यूबीटी) और एमएनएस कार्यकर्ता अब भी स्थानीय राजनीति में एक-दूसरे के विरोधी हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, अगर जनता का दबाव बना तो ये मतभेद भी कमज़ोर पड़ सकते हैं। उनके अनुसार, केवल भाषा के मुद्दे से कोई ठोस राजनीतिक बदलाव नहीं आ सकता। अगर, ठाकरे-राज गठबंधन वाकई विकल्प बनना चाहता है, तो उन्हें मुंबई महानगर क्षेत्र की रोज़मर्रा की समस्याओं जैसे आवास, यातायात, महंगाई, नगर निकायों में भ्रष्टाचार आदि पर भी ठोस एजेंडा देना होगा।

     

     

    मुंबई अब एक वैश्विक शहर है, जहां मराठी भाषी घटते जा रहे हैं और बहुभाषी मतदाता समूह उभर रहा है। भाजपा इस सांस्कृतिक बहुलता का लाभ उठाकर मराठी ध्रुवीकरण को कमज़ोर कर सकती है। एकनाथ शिंदे पर तीखे हमले के बावजूद भाजपा की चुप्पी कई सवाल खड़े करती है। यह चुप्पी संभवतः रणनीतिक है ताकि शिंदे का भार कम करके पार्टी को नए मोर्चे मिल सकें।
    अगर, भाजपा ने समय रहते राज ठाकरे को साथ बनाए रखा होता, तो शायद ये गठबंधन टल जाता। अब जब ठाकरे बंधु एक हो चुके हैं, भाजपा की मुंबई और एमएमआर क्षेत्र की रणनीति को बड़ा झटका लग सकता है।

     

    विशेषज्ञों के अनुसार, उद्धव ठाकरे के प्रति मुस्लिम समुदाय का झुकाव कोविड के समय से ही रहा है। यह गठबंधन उस वोट बैंक को भी एकजुट कर सकता है।
    भाजपा की गवर्नेंस वाली छवि को तोड़ना आसान नहीं, लेकिन यह रैली पहली बड़ी कोशिश मानी जा सकती है। ‘फेविकोल जैसा जोड़’ जैसे संवादों ने जनता के बीच धारणा बनाने की शुरुआत कर दी है।
    ऐसे में, दोनों दलों को अब यह दिखाना होगा कि सिर्फ भाजपा विरोध के लिए नहीं, बल्कि विकास, पारदर्शिता और सांस्कृतिक सम्मान के लिए वे साथ आए हैं। राज्य की अस्मिता को केंद्र में रखकर सरकार चलाने का दक्षिण भारत में सफल प्रयोग हो चुका है। महाराष्ट्र में भी यह प्रयोग सफल हो सकता है, बशर्ते मुद्दे सिर्फ सांस्कृतिक न होकर प्रशासनिक भी हों।

     

    कुल मिलाकर, राज और उद्धव ठाकरे का मिलन सिर्फ राजनीतिक समीकरण नहीं, बल्कि एक गहरी सांस्कृतिक अस्मिता की वापसी है। यह एकजुटता मराठी मतदाता के अंदर एक नया भरोसा जगा सकती है, परन्तु यह भरोसा तब तक ठहरेगा, जब तक ये गठबंधन अपने एजेंडे को भाषाई सीमाओं से ऊपर उठाकर, शासन और विकास के क्षेत्र में भी लोगों को विकल्प दे सके। यदि, ठाकरे बंधु यह कर सके, तो महाराष्ट्र में विपक्ष की राजनीति को नई दिशा मिलेगी। अगर नहीं, तो यह विजय रैली आने वाले चुनावों से पहले एक खोखली नौटंकी बनकर रह जाएगी।

     

     

    क्या एक व्यापक सामाजिक गठजोड़ का संकेत है ठाकरे बंधुओं की 'विजय रैली' ?
    Share. Facebook Twitter Telegram WhatsApp Copy Link
    Previous Articleराष्ट्र संवाद हेडलाइंस
    Next Article क्या एक व्यापक सामाजिक गठजोड़ का संकेत है ठाकरे बंधुओं की ‘विजय रैली’ ?

    Related Posts

    जेपीएससी-जेएसएससी अनियमितताओं के विरोध में एबीवीपी का हस्ताक्षर अभियान, सीबीआई जांच की मांग

    August 2, 2026

    श्रावणी मेला में आस्था के साथ तकनीक का संगम।

    August 2, 2026

    पहली सोमवारी पर बासुकीनाथ में सुरक्षा के कड़े इंतजाम, अधिकारियों को सतर्क रहने के निर्देश

    August 2, 2026

    Comments are closed.

    अभी-अभी

    जेपीएससी-जेएसएससी अनियमितताओं के विरोध में एबीवीपी का हस्ताक्षर अभियान, सीबीआई जांच की मांग

    श्रावणी मेला में आस्था के साथ तकनीक का संगम।

    पहली सोमवारी पर बासुकीनाथ में सुरक्षा के कड़े इंतजाम, अधिकारियों को सतर्क रहने के निर्देश

    श्रावणी मेला: हंसडीहा में प्रशासनिक शिविर व मयूराक्षी कला मंच का उद्घाटन

    प्रवीण सिंह स्मृति सेवा संस्था के मेगा रक्तदान शिविर में जुटीं कई प्रमुख हस्तियां

    युवा आजसू सम्मेलन की तैयारियां तेज, जंबो समिति का गठन

    आसंगी चेक डैम में एनआईटी छात्र लापता, सुरक्षा व्यवस्था पर फूटा छात्रों का गुस्सा

    जमशेदपुर में युवक को मारी गई गोली, गंभीर हालत में TMH में भर्ती, पुलिस जांच में जुटी

    जमशेदपुर में पारिवारिक विवाद बना खूनी संघर्ष, टाटा स्टील कर्मचारी पर चापड़ से हमला, हालत गंभीर

    केस पार्टनर ही निकला गुलशन हत्याकांड का मास्टरमाइंड, गला घोंटकर हत्या के बाद शव रेल लाइन किनारे फेंका

    Facebook X (Twitter) Telegram WhatsApp
    © 2026 News Samvad. Designed by Cryptonix Labs .

    Type above and press Enter to search. Press Esc to cancel.