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    क्या भूमिहार समाज केवल चुनावी समय में ही याद आता है?

    News DeskBy News DeskJune 1, 2026Updated:June 1, 2026No Comments3 Mins Read
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    क्या भूमिहार समाज केवल चुनावी समय में ही याद आता है?

    देवानंद सिंह
    मुखिया जी की 14वीं पुण्यतिथि पर बिहार और झारखंड के विभिन्न क्षेत्रों में श्रद्धांजलि सभाएं, नमन यात्राएं, संगोष्ठियां और सेवा शिविर आयोजित किए गए। जमशेदपुर में भी कई सामाजिक संगठनों ने स्व. ब्रहमेश्वर सिंह मुखिया को श्रद्धांजलि अर्पित कर उनके जीवन और योगदान को याद किया। लेकिन इन कार्यक्रमों के बीच समाज के एक वर्ग में यह चर्चा भी रही कि जिन जनप्रतिनिधियों और नेताओं को समाज चुनावों में भरपूर समर्थन देता है, उनमें से अधिकांश ने इस अवसर पर न तो किसी कार्यक्रम में भाग लिया और न ही सोशल मीडिया के माध्यम से श्रद्धांजलि या नमन करने की औपचारिकता निभाई।

    समाज के लोगों का कहना है कि कोल्हान और विशेष रूप से जमशेदपुर की राजनीति में भूमिहार समाज की भूमिका लंबे समय से प्रभावशाली रही है। विधानसभा, लोकसभा और स्थानीय निकाय चुनावों में समाज की भागीदारी और समर्थन को सभी राजनीतिक दल महत्व देते हैं। इसके बावजूद जब समाज के प्रमुख व्यक्तित्वों की जयंती, पुण्यतिथि या स्मृति दिवस आते हैं, तब राजनीतिक नेतृत्व की सक्रियता दिखाई नहीं देती।
    चर्चा का विषय यह भी रहा कि झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा, पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास, सांसद विद्युत वरण महतो, जमशेदपुर पश्चिम के विधायक सरयू राय,  तथा मेयर सुधा गुप्ता जैसे प्रमुख जनप्रतिनिधियों और नेताओं की ओर से भी इस अवसर पर सार्वजनिक श्रद्धांजलि, नमन संदेश अथवा सोशल मीडिया पर कोई उल्लेख सामने नहीं आया। समाज के कुछ लोगों का मानना है कि यदि चुनाव के समय समाज की भागीदारी महत्वपूर्ण है तो उसके महापुरुषों के प्रति सम्मान व्यक्त करना भी राजनीतिक और सामाजिक दायित्व का हिस्सा होना चाहिए। सिर्फ पर्व स्वास्थ्य मंत्री बन्ना गुप्ता ने सोशल मीडिया पर श्रद्धांजलि दी है 

     

    हालांकि लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी नेता या जनप्रतिनिधि के लिए किसी विशेष कार्यक्रम में शामिल होना अनिवार्य नहीं है, लेकिन समाज की भावनाओं और उसके ऐतिहासिक व्यक्तित्वों के प्रति सम्मान व्यक्त करना सामाजिक संवाद को मजबूत करता है। यही कारण है कि इस विषय को लेकर समाज के भीतर आत्ममंथन और चर्चा का माहौल बना हुआ है।

    यह प्रश्न केवल एक समाज तक सीमित नहीं है। लोकतंत्र में सभी सामाजिक वर्ग अपेक्षा करते हैं कि उनके महापुरुषों, विचारकों और समाज सुधारकों को उचित सम्मान मिले। राजनीतिक दलों और जनप्रतिनिधियों को भी चुनावी राजनीति से आगे बढ़कर समाजों के सांस्कृतिक और सामाजिक सरोकारों से जुड़ने की आवश्यकता है।

    साथ ही समाज को भी अपने महापुरुषों की विरासत को केवल राजनीतिक मान्यता के आधार पर नहीं, बल्कि संगठन, शिक्षा, सामाजिक जागरूकता और वैचारिक कार्यक्रमों के माध्यम से आगे बढ़ाना होगा। किसी भी समाज का सम्मान उसके आत्मबल, संगठन और सतत सामाजिक योगदान से तय होता है, न कि केवल राजनीतिक उपस्थिति से।

    मुखिया जी की पुण्यतिथि पर उठे ये सवाल केवल एक आयोजन तक सीमित नहीं हैं, बल्कि समाज और राजनीति के रिश्तों पर गंभीर चिंतन का अवसर भी प्रदान करते हैं।

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