लेखक: महेन्द्र तिवारी
भारत ने अपनी पहली हाइड्रोजन ट्रेन के संचालन के साथ रेल परिवहन के इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ दिया है। यह सेवा केवल एक नई ट्रेन का परिचालन नहीं है, बल्कि भारतीय रेलवे के ऊर्जा परिवर्तन की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयोग भी है।
हाइड्रोजन ट्रेन की तकनीकी खासियत
नमो ग्रीन रेल नामक इस ट्रेन का निर्माण भारतीय रेलवे की चेन्नई स्थित इंटीग्रल कोच फैक्ट्री ने स्वदेशी तकनीकी क्षमताओं के आधार पर किया है। इस ट्रेन में दो हाइड्रोजन ड्राइविंग पावर कार और आठ यात्री कोच लगाए गए हैं, जो एक साथ लगभग 2600 यात्रियों को सुरक्षित ले जाने की क्षमता रखते हैं। इसकी डिजाइन की गई अधिकतम गति 110 किलोमीटर प्रति घंटा है, जबकि वर्तमान में इसे 75 किलोमीटर प्रति घंटा की परिचालन गति पर चलाया जा रहा है।
हाइड्रोजन ट्रेन की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह अपनी बिजली स्वयं उत्पन्न करती है। सामान्य विद्युत ट्रेनों की तरह इसे ओवरहेड तारों से बिजली लेने की आवश्यकता नहीं होती और न ही डीजल इंजन की तरह कोई जीवाश्म ईंधन जलाना पड़ता है। ट्रेन में लगे उच्च दाब वाले टैंकों में हाइड्रोजन गैस सुरक्षित रूप से संग्रहित रहती है। यह गैस फ्यूल सेल में वायुमंडल से प्राप्त ऑक्सीजन के साथ इलेक्ट्रो रासायनिक अभिक्रिया करती है, जिससे बिजली उत्पन्न होती है और यही बिजली ट्रैक्शन मोटरों को सुचारू रूप से चलाती है। इस पूरी प्रक्रिया में केवल जलवाष्प और ऊष्मा उत्पन्न होती है तथा किसी भी प्रकार की कार्बन डाइऑक्साइड या अन्य प्रदूषक गैसें बिल्कुल नहीं निकलतीं।
ऊर्जा दक्षता और भविष्य की संभावनाएं
इस ट्रेन की ऊर्जा प्रणाली को और अधिक प्रभावी बनाने के लिए इसमें विशेष लिथियम आयरन फॉस्फेट बैटरियां भी लगाई गई हैं। जब ट्रेन को तेज गति पकड़नी होती है या अचानक अधिक शक्ति की आवश्यकता होती है, तब यही बैटरियां अतिरिक्त ऊर्जा उपलब्ध कराती हैं। ब्रेक लगाने के दौरान उत्पन्न ऊर्जा को भी पुनः बैटरियों में संग्रहित किया जाता है, जिससे ईंधन की खपत कम होती है और ऊर्जा दक्षता बढ़ती है।
भारत जैसे विशाल रेल नेटवर्क वाले देश में इस तकनीक का महत्व बहुत अधिक है। यद्यपि भारतीय रेलवे ने अधिकांश प्रमुख मार्गों का विद्युतीकरण कर दिया है, फिर भी पर्वतीय क्षेत्रों, विरासत रेलमार्गों और कम यातायात वाले मार्गों पर ओवरहेड विद्युत लाइन बिछाना भौगोलिक और आर्थिक रूप से अत्यंत कठिन होता है। इन स्थानों पर हाइड्रोजन ट्रेन डीजल इंजन का सबसे बेहतरीन और स्वच्छ विकल्प बन सकती है जिससे प्रदूषण पूरी तरह खत्म हो जाएगा। भारतीय रेलवे के लिए यह एक रणनीतिक सफलता है।
पर्यावरणीय प्रभाव और आर्थिक पहलू
यात्रियों की सुविधा के लिए इस ट्रेन का किराया सामान्य डीजल ट्रेनों के समान ही रखा गया है, लेकिन इसके पीछे की तकनीक और आधारभूत संरचना काफी महंगी है। जींद में इस परियोजना के लिए समर्पित हाइड्रोजन भंडारण और रिफ्यूलिंग अवसंरचना विशेष रूप से विकसित की गई है। पर्यावरण की दृष्टि से यह कदम ऐतिहासिक है, क्योंकि यह भारत के राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन और वर्ष 2070 तक नेट जीरो उत्सर्जन के लक्ष्य को सीधा समर्थन देता है।
यद्यपि हरित हाइड्रोजन का उत्पादन अभी महंगा है और इसके रखरखाव तथा सुरक्षा के लिए विशेष प्रशिक्षण की आवश्यकता है, फिर भी यह भारतीय रेलवे की एक दूरदर्शी रणनीति का अहम हिस्सा है। यदि यह पायलट परियोजना सफल रहती है, तो आने वाले वर्षों में देश के अनेक गैर विद्युतीकृत मार्गों पर ऐसी ट्रेनों का विस्तार संभव होगा। यह भारत को न केवल हरित परिवहन की दिशा में आगे ले जाएगा, बल्कि इंजीनियरिंग और ऊर्जा नवाचार में भी विश्व स्तर पर नई पहचान दिलाएगा।

