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    Home » कल्पक्कम में भारत का पहला ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन संयंत्र: ऊर्जा क्रांति का नया अध्याय
    कारोबार मेहमान का पन्ना राष्ट्रीय

    कल्पक्कम में भारत का पहला ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन संयंत्र: ऊर्जा क्रांति का नया अध्याय

    Devanand SinghBy Devanand SinghJune 30, 2026No Comments5 Mins Read
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    ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन संयंत्र
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    लेखक: प्रो. आरके जैन “अरिजीत”

    जब कोई राष्ट्र नई तकनीक नहीं, बल्कि नई दिशा गढ़ता है, तभी इतिहास करवट लेता है। 26 जून 2026 को कल्पक्कम ने भारत को ऐसा ही गौरवशाली क्षण दिया। परमाणु ऊर्जा विभाग ने इंदिरा गांधी परमाणु अनुसंधान केंद्र (आईजीसीएआर) में विश्व के पहले तांबा-क्लोरीन थर्मोकेमिकल चक्र आधारित ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन संयंत्र का शुभारंभ कर ऊर्जा विज्ञान की स्थापित धारणाओं को नई चुनौती दी। फास्ट ब्रीडर टेस्ट रिएक्टर (एफबीटीआर) की न्यूक्लियर प्रोसेस हीट से संचालित यह संयंत्र पारंपरिक इलेक्ट्रोलिसिस आधारित प्रणालियों से पूरी तरह भिन्न है। इसकी नींव भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (बीएआरसी) की स्वदेशी तकनीक और आईजीसीएआर की फास्ट रिएक्टर विशेषज्ञता पर टिकी है। यह उपलब्धि केवल एक वैज्ञानिक प्रयोग की सफलता नहीं, बल्कि इस सत्य का प्रमाण है कि भारत अब वैश्विक तकनीकी परिवर्तन का सहभागी नहीं, उसका पथप्रदर्शक बनने की क्षमता हासिल कर चुका है।

    कल्पक्कम का ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन संयंत्र: ऊर्जा के भविष्य का अनावरण

    ऊर्जा का भविष्य केवल अधिक उत्पादन में नहीं, बेहतर तकनीक में छिपा है। ग्रीन हाइड्रोजन के क्षेत्र में दुनिया अब तक महंगे और बिजली-आधारित इलेक्ट्रोलिसिस मॉडल पर निर्भर रही, लेकिन कल्पक्कम ने यह समीकरण बदल दिया। भारत ने तांबा-क्लोरीन थर्मोकेमिकल चक्र के माध्यम से लगभग 500–550 डिग्री सेल्सियस के अपेक्षाकृत कम तापमान पर अधिक ऊर्जा दक्ष और कम लागत वाली तकनीक विकसित की है। यह तापमान अन्य थर्मोकेमिकल चक्रों (जैसे सल्फर-आयोडीन) की तुलना में काफी कम है, जिससे यह न्यूक्लियर रिएक्टर्स के साथ बेहतर अनुकूल है। इस प्रक्रिया में एफबीटीआर से प्राप्त परमाणु ऊष्मा पानी को हाइड्रोजन और ऑक्सीजन में विभाजित करती है, वह भी बिना किसी कार्बन उत्सर्जन के। डॉ. अजित कुमार मोहंती के नेतृत्व में स्थापित यह पायलट संयंत्र परमाणु ऊर्जा की भूमिका को नई परिभाषा देता है। अब परमाणु रिएक्टर केवल बिजली उत्पादन तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि भविष्य के सबसे स्वच्छ ईंधन के स्रोत भी बनेंगे। यही दूरदृष्टि भारत को वैश्विक ऊर्जा अनुसंधान की अग्रिम पंक्ति में स्थापित करती है।

    स्वदेशी पहचान और परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम का विस्तार

    कल्पक्कम की सबसे बड़ी उपलब्धि उसकी तकनीक नहीं, उसकी स्वदेशी पहचान है। तांबा-क्लोरीन प्रक्रिया का विकास बार्क (बीएआरसी) ने किया और उसे व्यवहारिक रूप आईजीसीएआर ने दिया। भारत का एकमात्र सक्रिय फास्ट ब्रीडर टेस्ट रिएक्टर (एफबीटीआर) अब केवल बिजली ही नहीं, ग्रीन हाइड्रोजन का भी स्रोत बन चुका है। इससे भारत के तीन-चरणीय परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम को नई प्रासंगिकता और व्यापक आयाम मिला है। लंबे समय तक दुनिया भारत को परमाणु तकनीक का उपभोक्ता मानती रही, लेकिन कल्पक्कम ने यह धारणा बदल दी। भारत ने साबित कर दिया है कि वह तकनीक का आयातक नहीं, वैश्विक नवाचार का निर्माता भी बन सकता है। वैज्ञानिक आत्मनिर्भरता का यही वास्तविक अर्थ है—समाधान अपनी प्रयोगशालाओं में गढ़ना और दुनिया को नई राह दिखाना।

    हरित ऊर्जा की असली कसौटी केवल स्वच्छ होना नहीं, हर पल उपलब्ध रहना भी है। सौर और पवन ऊर्जा पर्यावरण के लिए वरदान हैं, लेकिन उनकी सबसे बड़ी सीमा मौसम पर निर्भरता है। परमाणु ऊर्जा इस बाधा से मुक्त है। इसलिए कल्पक्कम की यह तकनीक चौबीसों घंटे, वर्षभर कार्बन-मुक्त ग्रीन हाइड्रोजन उपलब्ध कराने की क्षमता रखती है। इसका सबसे बड़ा लाभ इस्पात, उर्वरक, रसायन उद्योग और भारी परिवहन जैसे उन क्षेत्रों को मिलेगा, जहाँ कार्बन उत्सर्जन घटाना अब तक कठिन चुनौती रहा है। इन क्षेत्रों के डीकार्बोनाइजेशन में यह तकनीक निर्णायक साबित हो सकती है। साथ ही, यह राष्ट्रीय ग्रीन हाइड्रोजन मिशन को मजबूत वैज्ञानिक आधार देगी। स्वच्छ, सस्ती और निरंतर ऊर्जा ही हरित अर्थव्यवस्था को स्थायी आधार दे सकती है। अधिक जानकारी के लिए, आप परमाणु ऊर्जा विभाग की वेबसाइट dae.gov.in पर जा सकते हैं।

    इतिहास रचना कठिन है, लेकिन उसे स्थायी परिवर्तन में बदलना उससे भी बड़ी चुनौती है। कल्पक्कम का यह संयंत्र अभी पायलट स्तर पर है, किंतु इससे प्राप्त अनुभव और आँकड़े भविष्य के वाणिज्यिक संयंत्रों की आधारशिला बनेंगे। यह प्रति घंटे सीमित मात्रा (लगभग 150 नॉर्मल लीटर पर आवर हाइड्रोजन) वाला टेक्नोलॉजी डेमॉन्स्ट्रेटर है, जिससे प्राप्त अनुभव बड़े वाणिज्यिक संयंत्रों (जैसे 3000 नॉर्मल लीटर पर आवर या अधिक) की नींव बनेगा। उत्पादन क्षमता का विस्तार, क्लोरीन का सुरक्षित प्रबंधन, अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा मानकों का पालन और पर्याप्त निवेश जैसी चुनौतियाँ अभी शेष हैं। फिर भी अंतरिक्ष से लेकर परमाणु विज्ञान तक भारत के वैज्ञानिक बार-बार सिद्ध कर चुके हैं कि सीमित संसाधन उनकी उड़ान को रोक नहीं सकते। इसलिए यह विश्वास पूरी तरह उचित है कि कल्पक्कम की यह शुरुआत आने वाले वर्षों में वैश्विक ऊर्जा उद्योग की नई क्रांति का आधार बनेगी।

    कल्पक्कम की यह उपलब्धि केवल वैज्ञानिक सफलता नहीं, भारत के रणनीतिक भविष्य की आधारशिला है। बड़े पैमाने पर ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन से देश की ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी, जीवाश्म ईंधनों के आयात पर निर्भरता घटेगी और विदेशी मुद्रा की बड़ी बचत होगी। जलवायु परिवर्तन से मुकाबले में भारत की वैश्विक भूमिका भी अधिक प्रभावशाली बनेगी। आने वाले वर्षों में भारत ग्रीन हाइड्रोजन के प्रमुख निर्यातक देशों में स्थान बना सकता है। यह उपलब्धि एक साथ ऊर्जा सुरक्षा, जलवायु न्याय और आर्थिक आत्मनिर्भरता—तीनों राष्ट्रीय लक्ष्यों को नई शक्ति देती है। साथ ही, नेट-ज़ीरो लक्ष्य हासिल करने की गति तेज होगी और युवा वैज्ञानिकों का यह विश्वास भी मजबूत होगा कि विश्व-स्तरीय नवाचार भारत की प्रयोगशालाओं में भी जन्म ले सकते हैं।

    इतिहास बनाने का गौरव मिल चुका है, अब उसे भविष्य की ताकत में बदलना शेष है। इसके लिए दूरदर्शी नीतियाँ, निजी क्षेत्र की सक्रिय भागीदारी, निरंतर अनुसंधान और दीर्घकालिक निवेश निर्णायक होंगे। यदि ये चारों आधार मजबूत रहे, तो 2030 तक भारत ग्रीन हाइड्रोजन के क्षेत्र में विश्व नेतृत्व स्थापित कर सकता है। कल्पक्कम का यह संयंत्र केवल तकनीकी उपलब्धि नहीं, उस नए भारत का प्रतीक है जो स्वदेशी प्रतिभा पर भरोसा करता है और दुनिया को नई दिशा देने का साहस रखता है। यह उपलब्धि भारत के तीन-चरणीय परमाणु कार्यक्रम के दूसरे चरण (फास्ट ब्रीडर) को हाइड्रोजन उत्पादन जैसे हाई-वैल्यू एप्लीकेशन्स से जोड़ती है। ऊर्जा क्रांति की शुरुआत हो चुकी है; अब यह भारत पर निर्भर है कि वह इस उपलब्धि को एक प्रयोग तक सीमित रखे या इसे आने वाली शताब्दी की वैश्विक पहचान बना दे। [INTERNAL_LINK_HOLDER]

    ऊर्जा सुरक्षा कल्पक्कम ग्रीन हाइड्रोजन परमाणु ऊर्जा भारत नवाचार
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