देवानंद सिंह
2019 में टेक्सस के ‘हाउडी मोदी’ कार्यक्रम में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लिए अबकी बार ट्रंप सरकार का नारा दिया था, तो उस क्षण को भारत-अमेरिका संबंधों की नई ऊंचाई के प्रतीक के रूप में देखा गया। उसके अगले ही वर्ष अहमदाबाद के ‘नमस्ते ट्रंप’ समारोह ने इस धारणा को और भी पुष्ट कर दिया कि दोनों देशों के बीच परस्पर भरोसे और गर्मजोशी का एक नया युग आरंभ हो चुका है। परंतु 2024 के सत्ता संतुलन में एक दिलचस्प मोड़ आया, मोदी और ट्रंप दोनों ही फिर से सत्ता में लौटे, लेकिन पुराने रिश्तों की गर्मी अब ठंडी पड़ती दिख रही है।
ट्रंप की आर्थिक राष्ट्रवाद पर आधारित ‘अमेरिका फ़र्स्ट’ नीति ने एक बार फिर टैरिफ़ की राजनीति को हवा दी है। जुलाई 2025 के अंत में ट्रंप प्रशासन द्वारा भारत पर 25% टैरिफ़ लगाए जाने की घोषणा ने दोनों देशों के बीच व्यापारिक संबंधों में ठहराव और तनाव का संकेत दिया है। इसके बाद अमेरिका द्वारा पाकिस्तान के साथ तेल भंडारों के विकास को लेकर समझौता और व्यापार डील ने नई भू-राजनीतिक परतें जोड़ दी हैं। विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप की यह नीति भारत की रूस और चीन से स्वतंत्र व्यापारिक नीतियों पर परोक्ष प्रहार है।
‘इंडियन काउंसिल फॉर रिसर्च ऑन इंटरनेशनल इकोनॉमिक रिलेशंस’ के विशेषज्ञ कहते हैं कि टैरिफ़ का असर दो स्तरों पर पड़ेगा, तत्काल और दीर्घकालिक। शॉर्ट टर्म में भारत के वस्त्र, दवाइयों, ऑटो पार्ट्स और समुद्री उत्पादों पर निर्यात में गिरावट आएगी, जबकि लॉन्ग टर्म में सप्लाई चेन में बदलाव की आवश्यकता होगी और भारत को बाजारों का विविधीकरण करना पड़ेगा।विशेषज्ञों के मुताबिक यह घटनाक्रम भारत सरकार के लिए शर्मिंदगी का कारण बना है। ट्रंप द्वारा भारत-पाकिस्तान संघर्ष के दौरान सीज़फायर का श्रेय लेने और फिर भारत पर आर्थिक दबाव बढ़ाने से यह स्पष्ट हुआ है कि व्यक्तिगत स्तर की कूटनीति संस्थागत विश्वास की जगह नहीं ले सकती। मोदी और ट्रंप की करीबी को एक रणनीतिक लाभ की तरह प्रस्तुत किया गया था, लेकिन अमेरिका की अपेक्षाओं, जैसे भारत का कृषि और डेयरी क्षेत्र खोलना वास्तविकता से परे हैं। ये मांगें भारत के राजनीतिक और आर्थिक ढांचे में असंभव सी प्रतीत होती हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, भारत पर टैरिफ़ और रूस से तेल खरीदने पर पेनल्टी की घोषणा सीधे तौर पर भारत की विदेश नीति की स्वायत्तता पर सवाल है। अमेरिका ने यह स्पष्ट कर दिया है कि यदि, भारत रूस से ऊर्जा खरीद जारी रखता है, तो उसे आर्थिक दंड भुगतना पड़ेगा। यह न केवल आर्थिक चुनौती है बल्कि कूटनीतिक संतुलन की कसौटी भी है। पाकिस्तान ने अमेरिका के साथ हुए समझौतों को अपनी आर्थिक पुनरुत्थान की दिशा में बड़ा कदम माना है। वहां की सरकार इसे न केवल ऊर्जा क्षेत्र में निवेश के रूप में देख रही है, बल्कि भारत के मुकाबले कूटनीतिक बढ़त के तौर पर भी पेश कर रही है।
पाकिस्तान के मीडिया में इसे भारत को ‘डिप्लोमैटिक फ्रंट पर शिकस्त’ देने के रूप में प्रचारित किया जा रहा है। ट्रंप की घोषणाएं फिलहाल प्रतीकात्मक हैं, क्योंकि अमेरिका में तेल कंपनियां निजी हैं और कोई भी कंपनी तब तक निवेश नहीं करेगी, जब तक उसे व्यावसायिक सुरक्षा और भू-वैज्ञानिक डेटा नहीं मिल जाता। यदि, भारत और चीन रूस से तेल खरीदना बंद करते हैं, तो वैश्विक आपूर्ति से प्रतिदिन 50 लाख बैरल तेल गायब हो जाएगा, जिससे अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में तेल की कीमतें आसमान छूने लगेंगी और इसका असर अमेरिका तक महसूस किया जाएगा, इसलिए अमेरिका की भी सीमाएं हैं, और वह भारत को केवल दबाव से नियंत्रित नहीं कर सकता।
कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत-अमेरिका संबंधों को अक्सर व्यक्तिगत समीकरणों के चश्मे से देखा जाता है, जबकि सच्चाई यह है कि दोनों देशों के रिश्ते संस्थागत संरचना पर टिके हैं। ट्रंप और मोदी के व्यक्तिगत रिश्ते भले कभी गहरे रहे हों, लेकिन अब ट्रंप को मोदी की आवश्यकता नहीं रही, कम से कम चुनावी लाभ के लिहाज़ से। मोदी को स्टेट विजिट की पेशकश बाइडन प्रशासन ने की थी, ट्रंप ने नहीं, जो बताता है कि बाइडन युग में भारत को कूटनीतिक मान्यता अधिक मिली, जबकि ट्रंप की वर्तमान नीतियां भारत के लिए अधिक कठिनाइयां लेकर आई हैं। ट्रंप वर्तमान में रूस से खुद निराश हैं, क्योंकि उनकी अपेक्षित सीज़फायर की कोशिशें असफल रहीं। ट्रंप अब चाह रहे हैं कि भारत भी पुतिन पर दबाव बनाए, ताकि वह अमेरिकी एजेंडा पूरा कर सकें।
भारत में कई राजनीतिक विश्लेषक इस समय अमेरिका के प्रति ‘कड़े रुख़’ की मांग कर रहे हैं, लेकिन विशेषज्ञों का सुझाव है कि भारत को ‘वेट एंड वॉच’ की नीति पर बने रहना चाहिए। अमेरिका को जिन क्षेत्रों में भारत से अपेक्षा है, उनमें कृषि और डेयरी प्रमुख है, जो भारत की संरचनात्मक मजबूरियों के कारण अभी संभव नहीं है। साथ ही, अमेरिका भारत का 18% निर्यात आयात करता है, जो एक महत्वपूर्ण आंकड़ा है। अतः किसी भी प्रकार की हड़बड़ी भारत के आर्थिक हितों के विरुद्ध जा सकती है। कुल मिलाकर, भारत और अमेरिका के संबंध पिछले दो दशकों में सामरिक, तकनीकी, रक्षा और आर्थिक क्षेत्रों में गहराए हैं। लेकिन ट्रंप के दोबारा राष्ट्रपति बनने के बाद जिस तरह से व्यापारिक और भू-राजनीतिक दबाव सामने आ रहे हैं, वह इस संबंध की प्रकृति को नए सिरे से परिभाषित कर रहे हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत को यह समय संयम, रणनीतिक चतुराई और संस्थागत कूटनीति से काम लेने का है। यदि, यह दौर पार हो जाता है, तो दोनों देश दीर्घकालिक साझेदार के रूप में फिर से सामने आ सकते हैं। व्यक्तिगत समीकरणों के आकर्षण से ऊपर उठकर अब ज़रूरत इस बात की है कि भारत अपनी विदेश नीति को संतुलित, व्यावहारिक और दीर्घकालिक दृष्टिकोण से संचालित करे। ट्रंप की नीतियां अल्पकालिक हैं, लेकिन भारत का हित दीर्घकालिक रणनीतियों में निहित है। दुनिया आज बहुध्रुवीय हो चुकी है और भारत को इसी बहुध्रुवीयता में अपने लिए एक स्थिर और सम्मानजनक स्थान सुनिश्चित करना होगा।

