जमशेदपुर में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने जाहेर थान में की पूजा-अर्चना, ओलचिकी लिपि शताब्दी समारोह में संथाली गीत गाकर बांधा समां
राष्ट्र संवाद संवाददाता
जमशेदपुर।
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु तीन दिवसीय झारखंड दौरे के दूसरे दिन लौह नगरी जमशेदपुर पहुंचीं। करनडीह स्थित पवित्र जाहेर थान में उन्होंने विधिवत पूजा-अर्चना की और संताल समाज के आराध्य गुरु गोमके पंडित रघुनाथ मुर्मु की प्रतिमा पर माल्यार्पण कर श्रद्धांजलि अर्पित की।
इसके उपरांत राष्ट्रपति जाहेर थान समिति एवं ऑल इंडिया रायटर्स एसोसिएशन द्वारा आयोजित ओलचिकी लिपि के शताब्दी वर्ष समारोह में शामिल हुईं। समारोह के दौरान उन्होंने ओलचिकी लिपि के विकास, संरक्षण एवं संवर्धन में उल्लेखनीय योगदान देने वाले 12 लेखकों एवं अन्य विशिष्ट व्यक्तियों को सम्मानित किया।
समारोह के दौरान राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने संथाली भाषा में इष्ट देवों की आराधना की और संथाली गीत-संगीत के बीच जनजातीय संस्कृति की समृद्ध परंपरा का जीवंत अनुभव साझा किया। अपने संबोधन में राष्ट्रपति ने कहा कि ओलचिकी लिपि संथाली भाषा की आत्मा है, जिसने संताल समाज को विशिष्ट पहचान दिलाई है। उन्होंने बताया कि उड़ीसा, पश्चिम बंगाल, झारखंड, असम समेत देश के कई राज्यों में ओलचिकी लिपि का व्यापक प्रचलन है।
राष्ट्रपति ने यह भी घोषणा की कि ओलचिकी लिपि के प्रचार-प्रसार के लिए बस स्टेशनों और रेलवे स्टेशनों के नाम ओलचिकी लिपि में भी अंकित किए जाएंगे, ताकि जनजातीय भाषाओं को सम्मान और संरक्षण मिल सके।
द्रौपदी मुर्मु, राष्ट्रपति:
“ओलचिकी लिपि संथाली भाषा की आत्मा है। इसने संताल समाज की संस्कृति, शिक्षा और पहचान को सशक्त किया है।”
संथाली गीत गाकर राष्ट्रपति ने घोली सुरों की मिठास
ओलचिकी लिपि के शताब्दी समारोह में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने संथाली भाषा में गीत गाकर माहौल को भावनात्मक और सुरमयी बना दिया। राष्ट्रपति के गीत को सुनकर उपस्थित लोग मंत्रमुग्ध हो गए। मंच पर मौजूद मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन भी आंखें मूंदकर गीत का आनंद लेते नजर आए। राष्ट्रपति ने अपने संबोधन की शुरुआत “जोहार” शब्द से की और युवाओं से अपनी मातृभाषा, संस्कृति और परंपरा को अक्षुण्ण रखने की अपील की।
उन्होंने कहा कि आज के दौर में अन्य भाषाएं सीखना जरूरी है, लेकिन अपनी भाषा को बचाए रखना उससे भी अधिक आवश्यक है। संताली लेखकों के योगदान की सराहना करते हुए राष्ट्रपति ने कहा कि आदिवासी स्वाभिमान और अस्तित्व की रक्षा में संताली राइटर्स का योगदान अभूतपूर्व है।
राष्ट्रपति ने ओलचिकी में संविधान के प्रकाशन का उल्लेख करते हुए कहा कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के जन्म शताब्दी वर्ष पर संविधान का ओलचिकी अनुवाद प्रकाशित होना संताली समाज के लिए ऐतिहासिक कदम है। उन्होंने कहा कि संताली भाषा आठवीं अनुसूची में शामिल है, इसलिए इसमें भी देश के नियम-कानून की जानकारी आम लोगों तक पहुंचनी चाहिए, ताकि अज्ञानता के कारण कोई निर्दोष पीड़ित न हो।
उन्होंने कहा कि भारत और विश्व के विभिन्न हिस्सों में संताल समाज के लोग निवास करते हैं और ओलचिकी लिपि उनकी मजबूत पहचान और एकता का आधार है। यह आयोजन उसी सामाजिक एकता का प्रतीक है।

जनजातीय संस्कृति का उत्सव : राज्यपाल और मुख्यमंत्री
राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार ने कहा कि यह समारोह जनजातीय समाज की भाषा, संस्कृति और कला का उत्सव है। उन्होंने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु को महिला सशक्तिकरण की जीवंत प्रतीक और देश की बेटियों के लिए प्रेरणास्रोत बताया। साथ ही कहा कि लोक भवन और प्रशासन जनसंस्कृति के संरक्षण में निरंतर सहयोग करता रहेगा।संतोष कुमार गंगवार, राज्यपाल
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने कहा कि ओलचिकी लिपि संताल समाज की संस्कृति, अस्मिता और आत्मसम्मान का परिचायक है और राज्य सरकार इसके संरक्षण एवं विकास के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है।
हेमंत सोरेन, मुख्यमंत्री
समारोह में ऑल इंडिया रायटर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष लक्ष्मण किस्कू, जाहेर थान समिति के अध्यक्ष सी.आर. मांझी, स्थानीय जनप्रतिनिधि तथा बड़ी संख्या में संताल समाज के लोग उपस्थित रहे। पूरे कार्यक्रम में जनजातीय परंपरा, लोक संस्कृति और सामाजिक एकता का सशक्त और जीवंत संदेश देखने को मिला।
