उसी का नाम रटकर जी रही हूं।
भीड़ से दूर हटकर जी रही हूं ,
मैं थोड़ा और डटकर जी रही हूं।
कद मेरा बढ़ गया था मेरे भीतर ,
इसलिए थोड़ा घट कर जी रही हूं।
जिनको गुमान था रूतबे का अपने,
उनकी शाखों से कटकर जी रही हूं।
निभाने थे मुझे किरदार इतने ,
कई टुकड़ों में बंटकर जी रही हूं।
बनारस घाट है जिसका मुकद्दर ,
मैं उस गंगा के तट पर जी रही हूं।
है वक्त जमींदार और मैं उसके आगे,
बन के मजदूर,खटकर जी रही हूं।
है जिसके हाथ में ये सृष्टि सारी,
उसी का नाम रटकर जी रही हूं।
डॉ कल्याणी कबीर——

