नेपाल ने लोकतंत्र की एक नई राह पर रखा कदम
देवानंद सिंह
यह घटनाक्रम नेपाल के इतिहास में एक अनोखा मोड़ लेकर आया है। ज़रा सोचिए, जिस देश में दशकों तक राजनीतिक दलों की खींचतान और सत्ता संघर्ष ही भविष्य तय करते रहे, वहां अचानक एक पूरी पीढ़ी सड़कों पर उतरी और उसने राजनीतिक समीकरण ही बदल दिए। प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को ‘जेन ज़ी’ आंदोलन की आंधी ने सत्ता से बाहर कर दिया और अब सवाल यह है कि देश का अगला रास्ता कौन तय करेगा।
काठमांडू और देश के अन्य शहरों में हालात असामान्य हैं। संसद की सुरक्षा सेना के हाथ में है, राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल अपने पद पर क़ायम हैं और पूरे देश में गश्त तेज़ कर दी गई है। इन दृश्यों से साफ़ है कि राजनीतिक संक्रमण का दौर शुरू हो चुका है। लेकिन इस बार यह संक्रमण पुरानी राजनीतिक परंपराओं या दलों की जोड़-तोड़ से तय नहीं हो रहा, बल्कि सड़कों और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर गूंजती आवाज़ों से दिशा मिल रही है।

सबसे दिलचस्प बात यह है कि अंतरिम सरकार के गठन की प्रक्रिया में अचानक एक ऐसा नाम उभरकर सामने आया, जिसकी उम्मीद शायद पारंपरिक राजनीति में किसी को नहीं थी—सुशीला कार्की। नेपाल की पहली महिला मुख्य न्यायाधीश रही कार्की का नाम युवाओं के बीच हो रही चर्चा और वोटिंग में सबसे आगे निकला। यह नाम अचानक नहीं आया, बल्कि कई कारणों से उनके पक्ष में समर्थन बढ़ता गया।
विशेषज्ञों के अनुसार, सुशीला कार्की की छवि निष्पक्ष, सख़्त और तटस्थ रही है। वे किसी राजनीतिक दल से नहीं जुड़ीं और उनका न्यायपालिका में किया गया काम पारदर्शिता और ईमानदारी का प्रतीक माना जाता है। युवाओं के लिए यह गुण सबसे अहम था। इस आंदोलन की आत्मा ही यही थी, एक नया नेतृत्व जो पुराने भ्रष्टाचार और दलगत हितों से परे हो। यही कारण रहा कि कार्की का नाम युवाओं की चर्चा में सबसे पहले आया और वोटिंग में उन्हें सबसे अधिक समर्थन मिला।

लेकिन यह समर्थन जिस प्रक्रिया से आया, वह अपने आप में ऐतिहासिक है। आंदोलनकारियों ने महज़ नारों या सड़कों पर बैठकर ही नेतृत्व तय नहीं किया, वे डिजिटल युग के उपकरणों का इस्तेमाल कर रहे हैं। ‘डिस्कॉर्ड’ नामक प्लेटफ़ॉर्म, जो पहले गेम खेलने वालों और ऑनलाइन कम्युनिटी के लिए मशहूर था, अचानक नेपाल की राजनीतिक दिशा तय करने वाला मंच बन गया। हजारों युवा एक साथ इस प्लेटफ़ॉर्म से जुड़े। वहां चैनल बने, चर्चा हुई, नाम सुझाए गए और वोटिंग कराई गई।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह प्रक्रिया किसी डिजिटल संसद से कम नहीं थी। मॉडरेटर लगातार बातचीत को नियंत्रित कर रहे थे ताकि चर्चा भटक न जाए। पहले यह तय हुआ कि जिन युवाओं का किसी राजनीतिक दल से सीधा संबंध है, वे इस प्रक्रिया का हिस्सा नहीं होंगे। मक़सद यही था कि किसी निष्पक्ष नाम पर पहुंचाया जाए। धीरे-धीरे कई नाम सामने आए—धरान के मेयर हरक साम्पांग, स्वतंत्र युवा नेता सागर ढकाल, यूट्यूबर ‘रैंडम नेपाली’ और मशहूर वैज्ञानिक महाबीर पुन।

हर नाम के पीछे अपनी-अपनी दलीलें थीं। हरक साम्पांग को उनकी सादगी और मेहनत के लिए जाना जाता है। उन्होंने धरान जैसे शहर में खुद फावड़ा उठाकर पानी और ज़रूरी सुविधाएं पहुंचाई और काम करने वाले मेयर की पहचान बनाई। सागर ढकाल ने हालिया चुनाव में पूर्व प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा को चुनौती दी थी और इससे वे युवाओं के बीच एक नई राजनीतिक संभावना बनकर उभरे। ‘रैंडम नेपाली’ जैसे यूट्यूबर को भी युवाओं का बड़ा ऑनलाइन समर्थन मिला। वहीं, महाबीर पुन विज्ञान और नवाचार के प्रतीक हैं, जिनकी लोकप्रियता उद्यमी और स्टार्टअप जगत के युवाओं में है।
लेकिन इन तमाम नामों के बीच सुशीला कार्की का नाम सबसे आगे रहा। इसका कारण उनकी निष्पक्षता और अनुभव दोनों रहे। युवाओं को लगा कि अंतरिम सरकार का काम चुनाव तक देश को सुरक्षित और स्थिर ले जाना है। इस काम के लिए न तो किसी उग्र राजनीतिक चेहरे की ज़रूरत है और न ही किसी नवोदित नेतृत्व की। यहां किसी ऐसे व्यक्ति की आवश्यकता है, जो भरोसेमंद हो, राजनीतिक दबाव से मुक्त हो और जिसे जनता एक तटस्थ मार्गदर्शक के रूप में देख सके। यही गुण कार्की में नज़र आते हैं।

युवाओं के बीच लोकप्रिय काठमांडू के मेयर और रैपर बालेन शाह का रुख भी इस प्रक्रिया में अहम साबित हुआ। शाह खुद एक संभावित नाम थे, लेकिन उन्होंने साफ़ कर दिया कि वे अंतरिम नेतृत्व लेने के बजाय चुनावी प्रक्रिया पर ध्यान देना चाहते हैं। उन्होंने कार्की के नाम का समर्थन कर दिया। इस समर्थन ने न केवल कार्की की स्थिति मज़बूत की, बल्कि यह संदेश भी दिया कि अंतरिम सरकार का असली उद्देश्य चुनाव की तैयारी करना है, न कि सत्ता में बने रहने की कोई महत्वाकांक्षा।
फिर भी, विशेषज्ञों का कहना है कि यह प्रक्रिया पूरी तरह निर्विवाद नहीं है। डिस्कॉर्ड पर हुई वोटिंग की पारदर्शिता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म पर हर प्रोफ़ाइल असली हो, इसकी पुष्टि आसान नहीं होती। नकली प्रोफ़ाइल या बाहरी हस्तक्षेप की संभावना हमेशा बनी रहती है। इसके बावजूद यह तथ्य नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता कि हजारों युवाओं ने एक साथ भाग लिया और बहुमत ने कार्की के पक्ष में वोट किया।
अब सवाल यह है कि आगे क्या होगा। सेना ने साफ़ कर दिया है कि अंतरिम सरकार पर अंतिम निर्णय सभी हिस्सेदारों से बातचीत करके ही लिया जाएगा। इसके लिए एक राउंड टेबल बैठक की तैयारी हो रही है, जिसमें राजनीतिक दलों, क़ानूनी विशेषज्ञों और सिविल सोसाइटी के साथ ‘जेन ज़ी’ आंदोलन के प्रतिनिधि भी शामिल होंगे। आंदोलनकारियों से कहा गया है कि वे अपनी मांगों की सूची को छोटा करें और ठोस मुद्दों पर बात रखें। यही सूची बातचीत की आधारशिला बनेगी।
इस पूरी प्रक्रिया में राष्ट्रपति की भूमिका भी अहम है। नेपाल के राष्ट्रपति न केवल सेना के सुप्रीम कमांडर हैं, बल्कि संवैधानिक रूप से राजनीतिक संक्रमण की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में उनकी ज़िम्मेदारी सबसे बड़ी है। अभी तक किसी नाम पर औपचारिक सहमति नहीं बनी है, लेकिन यह तय है कि अगर व्यापक समर्थन कार्की के नाम पर कायम रहता है और सेना, दलों व सिविल सोसाइटी सब सहमत हो जाते हैं, तो वे अंतरिम सरकार का नेतृत्व कर सकती हैं।
नेपाल का यह पूरा घटनाक्रम इस बात की मिसाल है कि डिजिटल युग में लोकतांत्रिक प्रक्रियाएं किस तरह बदल सकती हैं। एक ऐसा आंदोलन, जिसका कोई तय चेहरा नहीं, कोई केंद्रीय नेतृत्व नहीं, फिर भी ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म के ज़रिए हज़ारों लोग एक साथ आए और एक तटस्थ नाम पर सहमति जताई। यह न केवल नेपाल के लिए, बल्कि पूरी दुनिया के लिए लोकतांत्रिक प्रयोग का नया मॉडल है।
विशेषज्ञों के अनुसार, यह प्रयोग भले ही सफल हो या विफल, लेकिन इसने यह दिखा दिया है कि नई पीढ़ी राजनीति को पुराने तरीक़ों से स्वीकार करने को तैयार नहीं। वे ताज़गी, पारदर्शिता और तटस्थता चाहते हैं। वे न केवल सड़कों पर, बल्कि डिजिटल स्पेस में भी सक्रिय होकर अपनी भागीदारी सुनिश्चित करना चाहते हैं।

फिलहाल स्थिति यही है कि सुशीला कार्की का नाम सबसे आगे है। लेकिन यह प्रक्रिया अभी पूरी नहीं हुई। अगले कुछ दिनों में और भी नाम सामने आ सकते हैं, और सेना तथा राजनीतिक दलों की भूमिका अहम रहेगी। फिर भी यह साफ़ है कि नेपाल ने लोकतंत्र की एक नई राह पर कदम रख दिया है, जहां नेतृत्व तय करने का अधिकार अब सिर्फ़ राजनीतिक दलों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि जनता की नई पीढ़ी अपने तरीक़े से निर्णय ले रही है।
नेपाल का भविष्य किस हाथ में होगा, यह तो आने वाले दिनों में तय होगा। लेकिन इतना तो तय है कि ‘जेन ज़ी’ आंदोलन ने देश की राजनीति की धारा मोड़ दी है। यह आंदोलन न केवल सत्ता परिवर्तन का कारण बना, बल्कि इसने यह भी दिखा दिया कि जनता की आवाज़ चाहे सड़क से उठे या डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म से, जब वह संगठित और स्पष्ट हो, तो उसे नज़रअंदाज़ करना संभव नहीं।

