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    H-1B वीज़ा पर फीस बढ़ने से नई चुनौतियों के साथ ही आत्मनिरीक्षण का मौका भी

    Sponsored By: सोना देवी यूनिवर्सिटीSeptember 22, 2025No Comments6 Mins Read
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    H-1B वीज़ा पर फीस बढ़ने से नई चुनौतियों के साथ ही आत्मनिरीक्षण का मौका भी
    देवानंद सिंह
    अमेरिका में नौकरी, एक बेहतर जीवन और करियर की बुलंदियों तक पहुंचने का सपना भारतीय छात्रों और पेशेवरों के बीच वर्षों से पलता रहा है। H-1B वीज़ा इसी सपने की सबसे अहम कड़ी है, लेकिन अब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नए फैसले ने इस सपने की राह में एक बेहद बड़ी और महंगी दीवार खड़ी कर दी है।

     

     

    ट्रंप ने हाल ही में एक कार्यकारी आदेश पर हस्ताक्षर कर दिए हैं, जिसके मुताबिक अब H-1B वीज़ा की हर नई एप्लिकेशन के लिए उस वीज़ा को स्पॉन्सर करने वाली कंपनी को $1,00,000 (करीब 88 लाख रुपये) देने होंगे। ये फीस न सिर्फ नई एप्लिकेशन्स पर लागू होगी, बल्कि अमेरिका में आने वाले हर वीज़ा वर्कर पर भी, चाहे वह पहले से वीज़ा होल्डर हो या नया उम्मीदवार।
    अब तक एक H-1B वीज़ा की कुल लागत $1,500 यानी करीब 1.3 लाख रुपये होती थी। उसमें भी अधिकतर राशि अमेरिकी कंपनी उठाती थी, लेकिन $1 लाख की फीस ने इस पूरी प्रणाली को झकझोर कर रख दिया है। इतना भारी खर्च उठाना हर कंपनी के लिए मुमकिन नहीं, खासकर उन कंपनियों के लिए जो स्टार्टअप हैं, या जिन्हें एंट्री-लेवल टैलेंट की ज़रूरत होती है।
    कई बार ऐसा होता है कि भारतीय छात्र, अमेरिका में मास्टर्स या पीएचडी पूरी कर STEM ओपीटी के जरिए तीन साल तक जॉब करते हैं। इस दौरान वे स्किल्स, एक्सपीरियंस और नेटवर्क बनाते हैं, ताकि उन्हें H-1B वीज़ा मिल सके, लेकिन अब कंपनियां इतने भारी शुल्क के कारण दो बार सोचेंगी कि क्या 88 लाख खर्च कर किसी एंट्री-लेवल कर्मचारी को हायर करना उचित होगा?
    इस बदलाव का सबसे बड़ा असर भारत पर पड़ेगा, और इसके कई कारण हैं। सबसे पहले, हर साल अमेरिका में जितने H-1B वीज़ा दिए जाते हैं, उनमें लगभग 70% भारतीयों को मिलते हैं। यानी कि ट्रंप के नए आदेश की सबसे सीधी मार भारतीयों पर ही पड़ेगी।

     

     

    दूसरा, अमेरिका भारतीय छात्रों के लिए सबसे लोकप्रिय स्टडी डेस्टिनेशन है। अभी वहां करीब 3 लाख भारतीय छात्र पढ़ाई कर रहे हैं। इनमें से 80% से ज्यादा STEM यानी साइंस, टेक्नोलॉजी, इंजीनियरिंग और मैथ्स जैसे विषयों में डिग्री ले रहे हैं। उनके लिए डिग्री का सीधा अगला कदम होता है, OPT के बाद H-1B वीज़ा, जिससे वे अमेरिका में जॉब और बाद में ग्रीन कार्ड के रास्ते बढ़ते हैं।

     

     

    लेकिन अब कंपनियों को यह सोचने पर मजबूर होना पड़ेगा कि क्या एक नए ग्रेजुएट के लिए इतना खर्च करना फायदेमंद है? जवाब है – शायद नहीं। ट्रंप का तर्क सीधा है कि हम अमेरिकी नौकरियों की रक्षा करना चाहते हैं। उनकी सरकार का मानना है कि H-1B वीज़ा सिस्टम का दुरुपयोग हो रहा था और विदेशी वर्कर्स कम वेतन पर अमेरिकी नौकरियां हथिया रहे थे।
    नई नीति के जरिए वे चाहते हैं कि केवल वही विदेशी वर्कर्स अमेरिका में एंट्री पा सकें, जो वाकई हाई स्किल्ड हों, और जिनके लिए कंपनियां मोटी रकम चुकाने को तैयार हों। इसका मतलब – न सिर्फ प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी, बल्कि इंट्री लेवल वर्कर्स का अमेरिका में भविष्य अब और भी अनिश्चित हो गया है।
    अब सवाल यह है कि जिन हजारों छात्रों ने अमेरिका में पढ़ाई के लिए लाखों रुपये खर्च किए, जिन्होंने इस उम्मीद में परीक्षा दी, जीआरई-टोफेल की तैयारी की, F1 वीज़ा लिया, वे अब क्या करें? क्या अमेरिका का रास्ता बंद हो गया है?

     

     

    पहला विकल्प – एसटीईएम ओपीटी का अधिकतम उपयोग। छात्रों को तीन साल तक अमेरिका में काम करने का मौका मिलता है। इस दौरान वे स्किल्स और अनुभव हासिल कर सकते हैं, जिससे वे वैकल्पिक देशों (जैसे कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, यूके, जर्मनी) में बेहतर मौके तलाश सकें।
    दूसरा विकल्प – अन्य देशों की तरफ रुख करना। कनाडा जैसे देश ना केवल बेहतर पीआर पॉलिसी रखते हैं, बल्कि उनकी टेक्नोलॉजी इंडस्ट्री भी लगातार बढ़ रही है। वहां कंपनियां इमिग्रेंट्स को लेकर ज्यादा लचीली हैं। यूके ने भी हाल ही में पोस्ट-स्टडी वर्क वीज़ा की अवधि बढ़ाई है, जिससे छात्रों को दो साल तक वहां नौकरी ढूंढने का वक्त मिल जाता है।

     

     

    तीसरा विकल्प – स्पेशलाइजेशन और रिसर्च फोकस। अगर आप AI, साइबर सिक्योरिटी, बायोटेक, क्वांटम कंप्यूटिंग जैसे क्षेत्रों में विशेषज्ञता रखते हैं, तो आपके पास नेशनल इंटरेस्ट वेवर जैसे रास्ते खुले रह सकते हैं। इन क्षेत्रों को अमेरिका ने राष्ट्रीय हित से जुड़ा माना है, और वहां छूट मिल सकती है।
    चौथा विकल्प – रिमोट वर्क और ऑफशोरिंग। अब जब दुनिया तेजी से डिजिटल हो रही है, तो कई कंपनियां भारत या अन्य देशों से रिमोट वर्कर्स हायर करने को तैयार हैं। हाई स्किल और अनुभव रखने वाले भारतीय ऐसे मौकों का लाभ उठा सकते हैं।
    इस पूरे घटनाक्रम का एक दीर्घकालिक पहलू यह भी हो सकता है कि भारत में ‘ब्रेन ड्रेन’ कम हो और टैलेंट देश में ही बना रहे। अगर, अमेरिका ने विदेशी वर्कर्स के लिए दरवाज़े बंद किए, तो कंपनियां वहीं आ जाएंगी जहां टैलेंट है यानी भारत।
    भारत के स्टार्टअप, एआई कंपनियां, रिसर्च फर्म्स, और टेक्नोलॉजी पार्क्स इस अवसर का लाभ उठा सकते हैं, लेकिन इसके लिए सरकार को भी पहल करनी होगी। आर एंड डी में निवेश, स्टार्टअप ईकोसिस्टम को और मजबूत करना और एक मजबूत लोकल नौकरियों का माहौल बनाना।

     

     

    कुल मिलाकर, अमेरिका का H-1B वीज़ा अब पहले जितना सरल और सुलभ नहीं रहा। ट्रंप की नई नीति एक कड़ा संदेश देती है कि अब केवल वही वर्कर अमेरिका में आ सकता है, जिसके पास हाई स्किल हो और जिसे कंपनियां $1 लाख खर्च कर बुलाना चाहें।

     

     

    इस बदलाव से भारतीय छात्रों के सामने नई चुनौतियां हैं, लेकिन साथ ही यह आत्मनिरीक्षण का मौका भी है, क्या अब वक्त आ गया है कि हम अमेरिका के बजाय नए विकल्प तलाशें? क्या अब हमें खुद को वैश्विक टैलेंट की तरह देखना चाहिए, सिर्फ एक देश के सपने के साथ नहीं, बल्कि एक अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण के साथ? शायद, अब यही सही समय है। सपने को बदलने की ज़रूरत नहीं, बस रास्ता थोड़ा नया सोचने की है।

     

     

     

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