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    Home » तख्ता पलट की वकालत नहीं करता हमारा संविधान:: निशिकांत ठाकुर
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    तख्ता पलट की वकालत नहीं करता हमारा संविधान:: निशिकांत ठाकुर

    News DeskBy News DeskSeptember 22, 2025No Comments6 Mins Read
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    तख्ता पलट की वकालत नहीं करता हमारा संविधान::
    निशिकांत ठाकुर

    लगभग एक सप्ताह से चल रहे नेपाल के संवैधानिक संकट पर फिलहाल विराम लग गया और पहली कार्यकारी महिला प्रधानमंत्री के रूप में सुशीला कार्की का शपथग्रहण हो गया। नेपाली संसद को भंग कर दिया गया।  जेन–जी (सुदन गुरुंग) नामक इस आंदोलन ने विश्व को एक ऐसा संदेश दिया कि यदि भ्रष्टाचारी सत्तारूढ़ हो जाए तो आखिरकार उसका हश्र ऐसा ही होता है। अब हर उस युवा आंदोलनकारियों को इतिहास के रूप में जाना जाएगा, जिनके आंदोलन ने सत्ता की चूलें हिला दीं और कई देश के भ्रष्टाचारी नेता अपने को सदाचारी होने की दुहाई देने लगे। सच तो यह है कि विश्व में इस तरह के आंदोलन सत्तारूढ़ को उखाड़ फेंकने के लिए ही किया जाता रहा है और तभी किया जाता है जब पानी नाक के ऊपर से गुजरने लगता है। नेपाल में वैसे भी राजतंत्र खत्म होने के बाद जिन अनुभवहीन नेताओं ने विश्व के एकमात्र शांतिप्रिय हिन्दूराष्ट्र  को चलाने के निर्णय लिया, वे नौसिखिए ही साबित साबित हुए। नेपाल जैसे शांत सुसभ्य और विशेषकर भारतवर्ष के सबसे निकटतम देशों में एक, जिससे भारत का बेटी-रोटी का संबंध था, वह भी खराब हो गया। यदि आप नेपाल गए होंगे, तो गांव के बीच से ही भारत-नेपाल की सीमा गुजरती है आधा गांव भारत में है तो आधा गांव नेपाल में है। आदिकाल से यह संबंध कैसा रहा होगा, इसका केवल अनुमान लगाना ही पर्याप्त है।

     

     

     

    सच तो यह है कि ज्वालामुखी और बादल फटने का कोई पूर्वानुमान नहीं होता है, न ही वह किसी को अपने आने की कोई सूचना ही देता है। वह नि:शब्द होता है। अंदर-अंदर ही सुलगता है और पानी का जमाव बढ़ता जाता है। जब ज्वालामुखी और बादल फटता है, तो सर्वनाश सुनिश्चित है। वह यह नहीं देखता कि किस समय उन्हें फटना चाहिए। यही तो श्रीलंका, बांग्लादेश और अभी हाल में नेपाल में घटित आंदोलन का हुआ। पूरी दुनिया स्तब्ध थी और हमारे पड़ोसी देशों में इसी तरह से सत्ता परिवर्तित हो गया। अब इस आंदोलन पर कोई कितना ही तर्क-कुतर्क दे, लेकिन घटना तो घट गई। आंदोलन तो हो गया और सत्ता पलट भी कर दी गई। पिछले  कुछ वर्षों में घटित इन घटनाओं ने विश्व को चौंका दिया है, सतर्क कर दिया है। ये तीनों देश तो विश्व के लिए एक चेतावनी है कि यदि आप जनता के मुंह पर ताला लगा देंगे, उनका दमन करने लगेंगे तो तात्कालिक रूप से मामला सुलझ सकता है, दब सकता है, लेकिन वास्तव में हमेशा के लिए ऐसा होता नहीं। हमारे सूचनातंत्र हमें गुमराह करते हैं और हम जनता के प्रति लापरवाह हो जाते हैं। हम यह भूल जाते हैं कि वे हमारे कारण नहीं, हम उनके कारण आज इस पद पर हैं जहां से पूरा देश पूरा समाज छोटा लगता है, लेकिन सच यह नहीं होता। फिर जब सच सामने आता है, तो इसी तरह का आंदोलन होता है, भ्रष्ट सत्ताधीशों को उखाड़कर फेंक दिया जाता है।

     

     

     

    श्रीलंका से इसकी शुरुआत करेंं, तो श्रीलंका की दयनीय स्थिति के लिए वहां के नेता सर्वाधिक जिम्मेदार हैं। नेताओं ने वंशवाद और परिवारवाद की राजनीति की। राजपक्षे परिवार! वही राष्ट्रपति थे, वही प्रधानमंत्री, वही वित्त मंत्री आदि सभी एक ही परिवार से थे। दूसरा कारण अपनी जीत के लिए जनता को मुफ्त का लालच देना। अरे भाई ! पानी, बिजली, बेरोज़गारी, महिलाओं, बुज़ुर्गों को सब मुफ्त में बांटने के लिए धन कहां से लाओगे? मुफ्त में तो जहर भी मिले, तो लोग नहीं छोड़ते। तो इस राजपक्षे परिवार ने मुफ्त का लालच देकर सत्ता हासिल कर ली और मुफ्त में बांटने को चीन से क्रेडिट कार्ड ले लिया। चीन ने उन्हें बेतहाशा उधार दे दिया। सूदखोर को ऐसे ही लोगों की जरूरत होती है। इतना ऋण दे दिया, जिसे चुकाना उसकी क्षमता से बाहर है। अब ब्याज चुकाते रहो और मूल तो खड़ा ही रहेगा। ऋण के बदले अपनी जमीन गिरवी रखनी पड़ी। उनकी मुद्रा की साख गिर गई। विदेशी मुद्रा का भंडार गिर गया। अब दिवालिये को कौन उधार देगा? तो सामान की कमी हो गई। महंगाई बढ़ गई। गैस, पेट्रोल, कोयला, बिजली सब खत्म! खाए तो क्या, और पकाए कैसे? कोरोना तो चीन ने दुनिया को गिफ्ट दिया था। श्रीलंका को भी दे दिया। नकली खाद को असली के दाम बेच दिया। अब श्रीलंका के लोगों को राजपक्षे परिवार के मुफ्तवाद की समझ आने लगी थी।

     

     

     

    बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना को अपना देश छोड़ना पड़ गया है। वहां के सेना प्रमुख ने सत्ता पर काबिज होने का ऐलान भी कर दिया था। बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना के इस्तीफे के बाद प्रदर्शनकारियों ने ढाका के पॉश इलाके धानमंडी में देश के गृहमंत्री असदुज्जमां खान कमाल के आवास में तोड़फोड़ की और उसे आग के हवाले कर दिया। बांग्लादेश में प्रदर्शनकारी इतने उग्र हो गए कि उन्होंने बांग्लादेश के राष्ट्रपिता कहे जाने वाले शेख मुजीबुर्रहमान की मूर्ति पर चढ़कर हथौड़े चलाए। हालांकि, ऐसा दुनिया में पहली बार नहीं हुआ था। शासकों के तख्तापलट का इतिहास तो लंबा है। भारत सहित दुनिया भर के राजाओं का तख्तापलट उन्हीं के सिपाहसालाहकारों, मंत्रियों और जनता ने कई बार किया है।

     

     

     

    ऐसा नहीं है कि नेपाल जैसी घटना भारत में कभी नहीं हुई है। मणिपुर तो उसका मात्र एक उदाहरण है, जहां 300 नागरिक अब तक मारे जा चुके हैं। पुलिस और सेना के जवानों के हथियार छीने जा चुके हैं, लेकिन हमारे संविधान निर्माता इतने दूरदर्शी थे कि वह सैकड़ों वर्ष आगे की सोचते थे और आज तक भारत–नेपाल की तरह के गृहयुद्ध से मुक्त रहा है। केंद्र से उपेक्षित भारत का एक राज्य मणिपुर आज भी अशांत है, लेकिन इसकी परवाह किसे है? हां, वर्ष 1974 में लोकनायक स्व. जयप्रकाश नारायण ने केंद्रीय सत्ता को उखाड़ फेंकने का निर्णय लिया था, जो सफल रहा। ठीक है, उसे सफल होने में समय लगा, लेकिन सफल तो हुआ ही था। वह आंदोलन तो ज्वालामुखी और बादल फटने जैसा ही था। बादल तो फटा ही और केंद्रीय सत्ता को उखाड़कर दूर फेंक दिया। ऐसा नहीं है कि यह आंदोलन एक दिन में सफल हुआ था, यह वर्षों बाद सफल हुआ था। नेपाल का भी यही तो हुआ। वहां भी भ्रष्टाचार एक दिन में इतना नहीं फैल गया था, वर्षों में फैला था। फिर समाज जागरूक हुआ, गंदगियों व भ्रष्टाचारियों को एक सप्ताह में ही नष्ट कर दिया। वही हाल श्रीलंका, बांग्लादेश में हुआ था। नेपाल की इस तख्तापलट आंदोलन ने भ्रष्टाचारियों को सही तरीके से जनता को चलाने का आदेश दिया है। यदि किसी तरह की गलतफहमी से कोई नेता देश से वफादारी ने नाम पर स्वयं के लिए दौलत अर्जित करेगा, वही सामान्य सी दिखने वाली जनता उसे सही रास्ते पर चलने के लिए मजबूर कर देगी।

    (लेखक वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं)

     

     

     

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