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    Home » डॉ. भूपेन हज़ारिका के गीत असमिया जाति के लिए प्रेरणा के प्रतीक हैं
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    डॉ. भूपेन हज़ारिका के गीत असमिया जाति के लिए प्रेरणा के प्रतीक हैं

    News DeskBy News DeskNovember 10, 2025No Comments6 Mins Read
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    डॉ. भूपेन हज़ारिका के गीत असमिया जाति के लिए प्रेरणा के प्रतीक हैं

    डॉ. भूपेन हज़ारिका के गीत असमिया जाति के लिए प्रेरणा के प्रतीक हैं।
    इसीलिए, डॉ. भूपेन हज़ारिका के सभी गीत हमें अपनी ओर आकर्षित करते हैं। जिन गीतों में समाहित हैं स्वजाति के प्रति सजग स्नेह, प्रेम और जातिवादी प्रभूत्व ।

    असमिया समाज और कला में डॉ. भूपेन हज़ारिका के योगदान को चंद शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। उनके गीत, उनकी वाणी से निकले शब्द आज भी असमिया लोगों के रोम-रोम में रचे-बसे हैं।

    इसमें कोई संदेह नहीं है कि असम के मौजूदा हालात में डॉ. भूपेन हजारिका के गीतों की प्रासंगिकता और बढ़ गई है। संगीत सूर्य डॉ. भूपेन हज़ारिका के सभी गीत आज सामाजिक जीवन पर प्रतिफलित हो रहीं हैं । हालाँकि उनके ज़्यादातर गीतों में भावनाएँ या निजी जीवन के अंश थे, लेकिन निस्संदेह वे समाज की असली तस्वीर दर्शाते थे। इस लिहाज़ से हम उनके ‘मानूहे मानूहर बाबे’, ‘जुइये पूरा त्रिराखि ‘, ‘लुइत कावेरी सिंधू गंगा’, मानुह देखिसो आजि बहुत मानुह’, जैसे ज्यादातर गीतों में सामाजिक प्रेम, मानव प्रेम प्रकृति प्रेम दर्शाते हैं। “मुक एजोन बोगा मानुह दिया जार रक्त बोगा ।” हमारे समाज का एक प्रसिद्ध गीत है। यह गीत लिखा है लोकमान फ़कीर ने , जिसका अनुवाद सदानंद गोगोई ने किया है और डॉ भूपेन हज़ारिका ने इसे गाया है।

     

     

    कौन सा गाना लेना है और कौन सा छोड़ना है, यह भी शायद हर किसी के लिए एक बड़ी चुनौती है। हालाँकि, अगर हम विशेष रूप से देखे तो “मोक एजोन बोगा मानुह दिया “ इस गीत हैं मुझे एक ऐसा सफ़ेद आदमी दो , जिसका खून सफ़ेद हो, मुझे एक काला आदमी दो जिसका खून काला हो । इसमें जाति, धर्म, वर्ण ऊँच-नीच सबको एक करके एक ही बात बोली गई है और वह बात है हम सभी मानव हैं ।मानवसेवा ही हमारा मूल कर्म हैं । अपने गीत संगीत, सिनेमा आदि से वे सकारात्मक संदेश प्रेरण किए । उन्होंने लोगों से जागृत होने का आह्वान किया। डॉ. भूपेन हज़ारिका के गीतों में केवल मानव प्रेम या राष्ट्रवाद ही नहीं झलकता था। उन्होंने असम की धरती, पानी , वायु और आकाश को एकाकार करके संगीत को विश्व पटल पर लाने का प्रयास किया और व्यावहारिक रूप से सफल भी रहे। थोड़े व्यापक अर्थ में, यह कहा जा सकता है कि उनके गीतों ने असमिया राष्ट्र और समाज को दुनिया के सामने एक स्वच्छ रूप में प्रस्तुत किया। भूपेन हजारिका ने उस समय, जब असमिया गीतिसाहित्य की दुनिया में आधुनिकता की बयार बह रही थी,तब भूपेन हजारिका ने असमिया लोकगीत, भारतीय शास्त्रीय संगीत आदि के साथ कुछ पश्चिमी धुनों का संयोजन करके मानवता के गुणगान की एक विशिष्ट शैली का निर्माण किया। कृषक असमिया समाज से शुरू होकर, विभिन्न जाति, धर्म,भाषा के लोग, पुरुष-महिला सभी ने आध्यात्मिकता के प्रति अपनी रुचि न दिखाते हुए अपने राष्ट्र, अपने अधिकारों या मानवता की मुक्ति के प्रति अपना दृष्टिकोण दृष्टिकोण रखा । ऐसे कई कारण हैं जिनकी वजह से आपको ये उत्पाद नहीं खरीदने चाहिए। हाजरिकादेव के कुछ गानें आज भी असम के साथ साथ संपूर्ण विश्व के लोगों दिल में जिन्दा हैं ।

     

     

    सुधाकंठ भूपेन हज़ारिका का हर गीत हमारे असमिया समाज के हर व्यक्ति को एक विशेष प्रेरणा देता है। इसके बारे में बात करने का कोई अंत नहीं है। मानवता की विजय गाथा को समेटे उनके गीत ‘मानूहे मानूहर बाबे’ की विश्वव्यापी प्रशंसा का तो कहना ही क्या। गंगा से मिसिसिपी होते हुए भल्गा तक, ओटावा से ऑस्ट्रिया होते हुए पेरिस तक; दूसरे शब्दों में, उनके खानाबदोश जीवन की कलात्मक यात्रा पूरी दुनिया में फैली हुई थी। इसलिए मेरी हर रचना में, उनका गीत “मानुहे मानुहर बाबे जदिहे अकनो नाभाबे अकनि सहानुभूतिरे , भाबिब कोने नू कोवा खमोनीया …” उत्साहवर्धक, प्रेरक रहा है। शायद ही कोई असमिया व्यक्ति होगा जिसने यह गीत न सुना हो। यह गीत उस समय भूपेन हज़ारिका द्वारा रचित था और उस समाज के लिए एक संदेश देता है जो अब आत्मकेंद्रिकता की ओर बढ़ रहा है।

    सामाजिक प्राणी होने के नाते, मनुष्य के लिए एक-दूसरे की मदद करना महत्वपूर्ण है। लेकिन आजकल ऐसा लगता है कि किसी के पास भी एक दूसरे के बारें में सोचने का समय नहीं है। लोग आजकल बहुत ही सामान्य मामलों में हिंसा को हाथ में ले लेते हैं और लोगों को मारने से भी हिचकिचाते नही । इसी गीत के माध्यम से हज़ारिका देव ने लोगो को अलग-अलग समय पर कमजोर वर्गों का शोषण हुआ है।इसी गीत के माध्यम से हज़ारिका देव ने लोगो को असमीया जाति को मानवमुखी होने के लिए आह्वान कर रहे थे । सांस्कृतिक क्षेत्र में, डॉ हज़ारिका ने असम और विदेशों में व्यापक रूप से कामकाजी लोगों की बात करते हुए कामकाजी लोगों की आत्माओं की धुनों को ही चूना और और इन लोकधुनों और लोक कथाओं को अपनी अपार रचनात्मकता से जन संगीत में बदल दिया। भूपेन हजारिका इस क्षेत्र में पूर्ण अपवाद थे। उन्होंने शब्दों की जंजीरों को तोड़कर उसे अपने वश कर लिया और अपने गीतों में प्रयोग किया । संक्षेप में, एक गीतकार-संगीतकार के रूप में, भूपेन हजारिका शब्दों द्वारा शासित नहीं थे, बल्कि वे शब्दों के शासक या नियंत्रक थे। वे अपनी भावनाओं के अनुसार शब्दों के प्रयोग में माहिर थे। उनका गीत ‘मानुहे मानुहर बाबे’ दुनिया भर में सम्मानित हुआ।

     

    यह मानवता के बारे में है, जहां एक-दूसरे के साथ मानव के रूप में सहानुभूति रखने और एक-दूसरे के साथ खड़े होने की बात है।
    दूसरा, यह करुणा की बात करता है जिसमें एक-दूसरे के दुख में साथ रहना और एक-दूसरे के प्रति सहानुभूति रखना शामिल है।
    तीसरा, यह गीत सामाजिक जिम्मेदारी के बारे में है। लोगों को एक-दूसरे के अच्छे-बुरे के बारे में सोचते हुए समाज को और बेहतर बनाने का प्रयास करना चाहिए।
    चौथा हैं एकता, जहां लोग एक-दूसरे के प्रति बिना किसी भेदभाव के प्रेम और सम्मान दिखाते हैं।

    यह गीत एक सशक्त संदेश देता है कि एक व्यक्ति तभी सच्चा इंसान बनता है जब वह दूसरों के लिए कुछ करता है। इसमें ही मानवता की विजय है। उनकी खानाबदोश कलात्मक यात्रा पूरी दुनिया में फैली हुई हैं।

     

    मूल लेखिका
    मनीषा शर्मा
    अनुवादक:– रितेश शर्मा
    पता- जलुकबाड़ी, गुवाहाटी

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