उपचुनाव घाटशिला : साबित होगा प्रतिष्ठा, वफादारी और आदिवासी राजनीति के बदलते समीकरणों का आईना
देवानंद सिंह
झारखंड की राजनीति में घाटशिला विधानसभा क्षेत्र का उपचुनाव भले ही संख्यात्मक दृष्टि से राज्य की सत्ता समीकरण को न बदले, लेकिन इसके निहितार्थ बहुत गहरे हैं। 81 सदस्यीय विधानसभा में झामुमो नीत इंडिया ब्लॉक के पास इस समय 56 सीटों का बहुमत है, इतना कि किसी एक उपचुनाव के परिणाम से सरकार की स्थिरता पर कोई प्रत्यक्ष असर नहीं पड़ने वाला। फिर भी, राजनीति में हर चुनाव का मनोवैज्ञानिक और प्रतीकात्मक प्रभाव होता है। घाटशिला भी इसका अपवाद नहीं है। यहां का परिणाम केवल एक सीट का नहीं, बल्कि प्रतिष्ठा, वफादारी और आदिवासी राजनीति के बदलते समीकरणों का आईना साबित होगा।
झारखंड की वर्तमान सत्ता संरचना पर नज़र डालें तो स्पष्ट होता है कि झामुमो और कांग्रेस मिलकर आरामदायक बहुमत की स्थिति में हैं। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की वापसी के बाद राज्य सरकार ने प्रशासनिक स्थिरता पाने की दिशा में कुछ कदम उठाए हैं। परंतु राजनीति में स्थिरता कभी स्थायी नहीं होती, विशेषकर झारखंड जैसे राज्य में, जहां गठबंधन, व्यक्तित्व और क्षेत्रीय अस्मिता तीनों ही सत्ता के सूत्र हैं।

ऐसे में, घाटशिला का यह उपचुनाव एक ‘टेस्ट केस’ की तरह देखा जा रहा है, यह परखेगा कि हेमंत सोरेन की लोकप्रियता अब भी बरकरार है या उनके पुराने सहयोगी रहे चंपाई सोरेन की राजनीतिक घरवापसी भाजपा के लिए लाभकारी साबित हो रही है। यह उपचुनाव दिवंगत शिक्षा मंत्री रामदास सोरेन के निधन के कारण हो रहा है। रामदास सोरेन झामुमो के कद्दावर आदिवासी नेता थे, जिन्होंने तीन बार विधानसभा में अपने क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया। उनके निधन के बाद झामुमो ने उनके पुत्र सोमेश सोरेन को उम्मीदवार बनाया है, एक पारंपरिक राजनीतिक समीकरण के तहत, जो भारतीय राजनीति में सहानुभूति लहर और वंशीय उत्तराधिकार का उदाहरण है।
दूसरी ओर, भाजपा ने पूर्व मुख्यमंत्री चंपाई सोरेन के पुत्र बाबूलाल सोरेन को मैदान में उतारा है। यानी मुकाबला केवल दो उम्मीदवारों के बीच नहीं, बल्कि दो ‘सोरेन परिवारों’ के बीच है, एक सत्ता के भीतर से और दूसरा सत्ता से बाहर जाकर चुनौती देने वाला। यह भी एक दिलचस्प संयोग है कि कुछ साल पहले तक चंपाई सोरेन और रामदास सोरेन न केवल झामुमो के साथी थे बल्कि निजी रूप से भी अच्छे मित्र माने जाते थे। दोनों ही कोल्हान क्षेत्र में झामुमो के मजबूत आदिवासी चेहरे थे। फर्क इतना था कि चंपाई की पहचान बड़े कद के नेता के रूप में थी, वे कई बार मंत्री रहे, और फरवरी 2024 में परिस्थितियों के कारण मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंच गए।
31 जनवरी 2024 को जब ईडी ने तत्कालीन मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को जमीन घोटाले के आरोप में गिरफ्तार किया, तो पार्टी को अंतरिम नेतृत्व की जरूरत थी। इसी इन्सिडेंटल राजनीति के चलते चंपाई सोरेन मुख्यमंत्री बने। लेकिन यह कार्यकाल बहुत लंबा नहीं चला। जून 2024 में हेमंत सोरेन को राहत मिली और वे जेल से बाहर आए, जिसके बाद स्वाभाविक रूप से उन्होंने मुख्यमंत्री पद संभाल लिया। सत्ता परिवर्तन के इस घटनाक्रम से चंपाई असंतुष्ट हुए और भाजपा का दामन थाम लिया। यही वह बिंदु था, जहां से पुराने सहयोगियों की राहें अलग हो गईं। झामुमो ने चंपाई के द्रोह की भरपाई के लिए रामदास सोरेन को मंत्री बनाया, और इसी राजनीतिक समीकरण ने घाटशिला को सत्ता संघर्ष का प्रतीक बना दिया।
घाटशिला सीट ऐतिहासिक रूप से झामुमो के प्रभाव वाले क्षेत्रों में गिनी जाती है। 2019 और 2024 के विधानसभा चुनावों में झामुमो ने यहां पर अपनी पकड़ बनाए रखी थी। यह इलाका संथाल जनजाति की सांस्कृतिक और सामाजिक चेतना से जुड़ा है, और झामुमो का मूल आधार भी यही रहा है, हालांकि नवंबर 2024 में हुए आम चुनाव में चंपाई सोरेन के बेटे बाबूलाल सोरेन ने इसी सीट से झामुमो उम्मीदवार के खिलाफ चुनाव लड़ा था और तकरीबन 22 हजार मतों से हार गए थे। यानी हार के बावजूद उन्होंने अपनी राजनीतिक उपस्थिति दर्ज कराई थी। अब वही बाबूलाल एक बार फिर लौटे हैं, यह उनके लिए रिवेंज पॉलिटिक्स का क्षण है। इस चुनाव का निहितार्थ केवल यह नहीं कि कौन विधायक बनेगा, बल्कि यह कि कोल्हान की राजनीति में किसकी प्रतिष्ठा टिकेगी। यदि झामुमो उम्मीदवार सोमेश सोरेन जीत जाते हैं, तो यह न केवल पिता रामदास की विरासत की पुनःस्थापना होगी, बल्कि चंपाई सोरेन के राजनीतिक वजन पर प्रश्नचिह्न भी लग जाएगा।
भाजपा ने चंपाई को इसलिए साथ लिया था कि वे कोल्हान के टाइगर कहे जाते हैं। अगर, उनके बेटे को दो-दो बार झामुमो के उम्मीदवार से हार का सामना करना पड़ता है, तो भाजपा के लिए यह संकेत होगा कि टाइगर की दहाड़ अब कमजोर पड़ चुकी है। यह परिणाम भाजपा की आदिवासी राजनीति की रणनीति पर भी असर डालेगा, जिसने हाल के वर्षों में झारखंड में जमीन खोई है। पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा ने राज्य की सभी पांच आदिवासी सीटें गंवा दी थीं। इसके बाद विधानसभा चुनाव में 28 आरक्षित आदिवासी सीटों में से केवल एक सीट भाजपा के खाते में आई, और वह सीट भी चंपाई सोरेन की थी। भाजपा नेतृत्व को उम्मीद थी कि चंपाई के आने से झारखंड के आदिवासी वोटरों के बीच उसकी साख सुधरेगी। परंतु, यदि घाटशिला में भाजपा को हार मिलती है, तो यह माना जाएगा कि पार्टी की सोरेन कार्ड रणनीति असफल रही।
दूसरी ओर, यदि बाबूलाल सोरेन विजयश्री हासिल करते हैं, तो यह भाजपा के लिए मनोबल बढ़ाने वाली खबर होगी। इसे वह झारखंड में अपनी वापसी की शुरुआत के रूप में प्रचारित करेगी। इससे चंपाई की हैसियत भी पार्टी के भीतर मजबूत होगी, वे न केवल भाजपा में अपनी जगह पक्की करेंगे, बल्कि आदिवासी नेतृत्व के वैकल्पिक चेहरे के रूप में उभर सकते हैं। झामुमो के लिए यह सीट हारना केवल एक चुनावी झटका नहीं होगा, बल्कि प्रतिष्ठा का नुकसान भी होगा। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन व्यक्तिगत रूप से इस चुनाव को अपनी साख से जोड़ चुके हैं। घाटशिला में हार का सीधा असर आगामी राज्यसभा चुनावों पर भी पड़ेगा।
वर्तमान विधानसभा में 81 विधायक हैं, और दो राज्यसभा सीटों के लिए 28-28 विधायकों के समर्थन की आवश्यकता होती है। झामुमो-कांग्रेस गठबंधन के पास फिलहाल 56 विधायक हैं, जो दोनों सीटें निकालने के लिए पर्याप्त संख्या है। लेकिन यदि, घाटशिला सीट भाजपा के पास चली जाती है, तो इंडिया ब्लॉक का आंकड़ा घटकर 55 हो जाएगा। ऐसे में, एक सीट जीतना तो संभव रहेगा, पर दूसरी के लिए समझौता या समर्थन जुटाने की मजबूरी खड़ी हो सकती है, यानी घाटशिला उपचुनाव का असर दिल्ली तक पहुंचेगा, राज्यसभा में झारखंड की आवाज़ कौन बुलंद करेगा, यह इस उपचुनाव पर निर्भर हो सकता है।
झारखंड की राजनीति में इन्सिडेंटल शब्द पिछले एक साल में सबसे अधिक चर्चित रहा है। 2024 में अचानक परिस्थितियों ने चंपाई सोरेन को मुख्यमंत्री बना दिया था, वे न तो संगठन की पहली पसंद थे और न ही किसी दीर्घकालिक योजना का हिस्सा। यह सत्ता उन्हें घटनाओं की आकस्मिकता ने दी थी। इसी तरह, जब चंपाई ने भाजपा का रुख किया, तो पार्टी ने भी उन्हें अपने लिए एक इन्सिडेंटल चेहरा बना लिया, ताकि हेमंत सोरेन के खिलाफ आदिवासी असंतोष को आवाज़ दी जा सके। अब यही आकस्मिक राजनीति घाटशिला में अपने अगले अध्याय में प्रवेश कर रही है।
रामदास सोरेन का पुत्र सोमेश झामुमो के नैतिक उत्तराधिकार का प्रतीक है, तो बाबूलाल सोरेन भाजपा की नया चेहरा, पुराना नाम रणनीति का प्रतिनिधि। यह चुनाव इस बात का परीक्षण है कि जनता वफादारी, पहचान और परिवारवाद में किसे प्राथमिकता देती है, पार्टी या व्यक्ति को। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के लिए यह उपचुनाव एक तरह से उनकी लोकप्रियता की लिटमस टेस्ट है। वे जानते हैं कि राज्य की जनता अभी भी उन्हें एक संघर्षशील आदिवासी नेता के रूप में देखती है, लेकिन विपक्ष लगातार उनके खिलाफ भ्रष्टाचार और वंशवाद के आरोप उछाल रहा है। यदि, घाटशिला की सीट हाथ से जाती है, तो विपक्ष यह प्रचारित करेगा कि जनता अब झामुमो से विमुख हो रही है।
वहीं, अगर झामुमो यह सीट बचा लेता है, तो हेमंत को दोहरा लाभ मिलेगा, एक ओर चंपाई की साख को ठेस पहुंचेगी, दूसरी ओर पार्टी कार्यकर्ताओं में मनोबल का संचार होगा। घाटशिला में चुनाव केवल राजनीतिक नहीं, सामाजिक और विकासात्मक मुद्दों से भी जुड़ा हुआ है। यह इलाका झारखंड के उन हिस्सों में आता है, जहां अब भी बुनियादी सुविधाओं की कमी, विस्थापन और खनन से जुड़ी समस्याएं गहराई से मौजूद हैं। झामुमो इन मुद्दों पर स्थानीय अस्मिता की बात करता है, जबकि भाजपा विकास और स्थिर शासन के वादे के साथ उतरी है।
आदिवासी समाज के भीतर अब यह विमर्श तेज़ हो रहा है कि क्या झामुमो ने अपने मूल एजेंडे जल, जंगल और ज़मीन को राजनीतिक सत्ता के कारण भुला दिया है। यही सवाल घाटशिला के मतदाता तय करेंगे, जो भी परिणाम आए, घाटशिला का उपचुनाव झारखंड की राजनीति की दिशा तय करेगा। यदि झामुमो विजयी रहता है, तो यह संकेत होगा कि जनता अब भी क्षेत्रीय अस्मिता को प्राथमिकता देती है और भाजपा की राष्ट्रीय अपील यहां प्रभावी नहीं हो पा रही। पर यदि भाजपा जीत दर्ज करती है, तो यह राज्य की राजनीति में नए पुनर्संतुलन की शुरुआत होगी, जिसमें चंपाई सोरेन एक प्रमुख भूमिका निभा सकते हैं।
अंततः, घाटशिला का यह उपचुनाव झारखंड की राजनीति के घाट पर खड़ी उस शिला जैसा है, जिस पर सत्ता की लहरें टकरा रही हैं। यह केवल एक सीट नहीं, बल्कि दो राजनीतिक धाराओं परंपरा और परिवर्तन का संघर्ष है।हेमंत सोरेन के लिए यह विश्वास की परीक्षा है, तो चंपाई सोरेन के लिए अस्तित्व की। एक तरफ झामुमो की जमी हुई राजनीतिक मिट्टी है, दूसरी तरफ भाजपा की महत्वाकांक्षी खोदाई। देखना यही है कि इस बार घाटशिला किसकी होती है, हेमंत की सत्ता की, या चंपाई की शिला की।

