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    चंपई बाबू , मुंह मियां मिट्ठू मत बनिए/कोल्हान में झारखंड आंदोलन का श्रेय अकेले मत लीजिए

    dhiraj KumarBy dhiraj KumarNovember 12, 2025No Comments5 Mins Read
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    चंपई बाबू , मुंह मियां मिट्ठू मत बनिए/कोल्हान में झारखंड आंदोलन का श्रेय अकेले मत लीजिए

    शैलेंद्र महतो पूर्व सांसद

    घाटशिला विधानसभा का चुनाव 11 नवंबर को संपन्न हो गया। सभी राजनीतिक दलों ने पूरे दमखम के साथ प्रचार- प्रसार किया, खूब आरोप- प्रत्यारोप हुए। चुनाव प्रचार के अंतिम दिनों में प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री चंपई सोरेन को प्रेस कांफ्रेंस के दौरान कई चैनल में रोते हुए देखा, अखबारों में उनका बयान भी पढ़ा। चंपई बाबू के प्रेस बयान पर मुझे कुछ कहना नहीं था लेकिन फिर भी कहना पड़ रहा है–
    चंपई बाबू आपको हेमंत सोरेन ने इस प्रदेश का मंत्री- मुख्यमंत्री बनाया था। आप अपने बदौलत ना मंत्री बन सकते थे ना मुख्यमंत्री, यह उन्हीं के बदौलत हुआ। अब तो उनकी खरी- खोटी बातें सुननी ही पड़ेगी, इसमें रोने-धोने से कुछ काम होने वाला नहीं है।अब चुनाव में हार- जीत किसकी होगी, यह तो 14 नवंबर को इसकी सुनवाई होगी।
    आपने प्रेस बयान में यह कहा कि कोल्हान में झामुमो का संगठन बढ़ाया, टाटा कंपनी में मजदूरों को परमानेंट कराया…। इसका श्रेय आपने खुद लिया जो आपका यह बयानबाजी गलत है। आपने यह स्वीकार किया है कि गुवा गोलीकांड के बाद झारखंड मुक्ति मोर्चा में शामिल हुआ। आपकी यह बात सही है।
    चंपई बाबू , गुवा गोली कांड के पूर्व झारखंड मुक्ति मोर्चा का नेतृत्व कोल्हान में कौन कर रहा था, उन लोगों का नाम लेते तो शायद अच्छा होता। लेकिन आपने उसे छुपाया। आज के मीडिया कर्मियों को वास्तविकता मालूम नहीं है ,जो आप कहेंगे उसे सच मान लेंगे। आपके बयान से लगता है कि आप ही झारखंड मुक्ति मोर्चा का शुरू से इकलौता कर्ता-धर्ता रहे हैं । जबकि झामुमो का स्थापना अविभाजित सिंहभूम जिले में सर्वप्रथम 1978 में चक्रधरपुर में हो चुका था। उस सभा में विनोद बिहारी महतो, शिबू सोरेन, ए के राय आए थे और वहीं से हम लोगों ने क्रांति का बिगुल फूंका था। उस समय मैं(शैलेंद्र महतो), देवेंद्र मांझी, बहादुर उरांव और मछुआ गागराई मूल रूप से हम चार लोग थे।अविभाजित सिंहभूम जिले का नाम अब कोल्हान प्रमंडल है। झारखंड आंदोलन के साथ-साथ सिंहभूम जिले में जल- जंगल- जमीन का आंदोलन शुरू हुआ। सर्वप्रथम गोइलकेरा प्रखंड अंतर्गत 6 नवंबर 1978 में ‘ईचाहातु गोलीकांड’ और 25 नवंबर 1978 को ‘सेरेंगदा गोलीकांड’ हुआ। 8 सितंबर 1980 में गुवा गोलीकांड हुआ। इसके पश्चात बाईपी फायरिंग, कुईड़ा फायरिंग, कुंबिया फायरिंग, जोजोहातु फायरिंग, सारजोम हातु फायरिंग,टोंटो फायरिंग हुई। कुल मिलाकर 18 लोग शहीद हुए थे।शायद इसका नाम आपको पता भी नहीं होगा। जब झामुमो के आंदोलन पर गोली चल रही थी, सरकारी दमन चल रहा था उस समय आप झारखंड मुक्ति मोर्चा में नहीं आए थे। कोल्हान प्रमंडल ने झारखंड आंदोलन को जीवित रखा। आंदोलनकारियों को गिरफ्तार कर चाईबासा और हजारीबाग जेल को भरा गया। मेरे ऊपर बिहार सरकार ने जीवित या मुर्दा पकड़ने के लिए ₹10000 रुपए का इनाम रखा। मुझे 26 जून 1979 को चाईबासा बस स्टैंड में पुलिस ने पकड़ा और सदर थाना में ले गए। उस समय के एसपी रामेश्वर उरांव तुरंत थाना पहुंचे और मुझसे पूछताछ की और चाईबासा जेल भेज दिया। 3 महीने बाद मेरी जमानत हुई। मैं यहां सिर्फ कोल्हान की बात कर रहा हूं। 1980 के विधानसभा चुनाव में झामुमो पार्टी से देवेंद्र मांझी चक्रधरपुर से चुनाव जीते। गुवा गोलीकांड के पूर्व सूर्य सिंह बेसरा झारखंड मुक्ति मोर्चा में शामिल हो चुके थे और गोलीकांड के बाद निर्मल महतो और कृष्णा मारडी पार्टी में आए। उन दिनों 1983 में जमशेदपुर में झारखंड मुक्ति मोर्चा का संगठन विस्तार के लिए मुझे चक्रधरपुर से ट्रेन द्वारा हजारों झारखंड समर्थक और आंदोलनकारियों को लाना पड़ा था और जमशेदपुर बारी मैदान में मीटिंग हुई थी। उस मीटिंग की अध्यक्षता निर्मल महतो ने की थी। मैं (शैलेंद्र महतो),कृष्णा मारडी, सूर्य सिंह बेसरा और कई लोगों ने संबोधित किया था ।
    1985 के विधानसभा चुनाव में कृष्णा मारडी सरायकेला से विधायक चुने गए। 1985 के चुनाव में निर्मल दा को ईचागढ़ और सूर्य सिंह बेसरा घाटशिला से बहुत ही कम वोट से दोनों हार गए। निर्मल दा की हत्या 1987 में हो गई जहां झारखंड आंदोलन में तूफान आ गया। उसी समय सूर्य सिंह बेसरा झामुमो के छात्र संगठन ऑल झारखंड स्टूडेंट यूनियन को लेकर आंदोलन का अलग रास्ता अपनाया।1989 के लोकसभा चुनाव में आजसू ने “झारखंड नहीं तो वोट नहीं” No Jharkhand – No vote नारे के साथ वोट बायकाट किया। इसके बावजूद मैं झामुमो जैसे क्षेत्रीय दल से प्रथम बार जमशेदपुर का सांसद बना और 1990 के बिहार विधानसभा चुनाव में अविभाजित सिंहभूम जिले से झामुमो के सात विधायक चुने गए। उस समय तक चंपई बाबू आपका परिचय मजदूर आंदोलन के जरिए बढ़ रहा था, झारखंड मुक्ति मोर्चा के उतने बड़े नेता नहीं थे, जो आप अभी दावा कर रहे हैं? 1991 में सिंहभूम लोकसभा से कृष्णा मारडी सांसद चुने गए। सरायकेला विधानसभा सीट खाली हो गया। चंपई बाबू उपचुनाव में झामुमो का बना बनाया हुआ सीट सरायकेला से विधायक बनने का अवसर प्राप्त हुआ , भले ही श्रीमती मोती मार्डी (कृष्णा मारडी की पत्नी) के साथ आपसी संघर्ष करना पड़ा था। आपलोग दोनों ही निर्दलीय थे लेकिन झारखंड मुक्ति मोर्चा के नेता, कार्यकर्ता आप दोनों के बीच में बंटे हुए थे और चुनाव प्रचार कर रहे थे। जीत आपकी हुई।हम सबों ने आपको धन्यवाद भी दिया था। इसी सीट से आप कई बार विधायक बने और हेमंत सोरेन के रजामंदी से राज्य का मंत्री,मुख्यमंत्री पद तक पहुंचे।
    चंपई बाबू,जहां तक टाटा कंपनी के मजदूरों को परमानेंट करने की बात आप कह रहे हैं इसमें आपने अकेले नेतृत्व नहीं किया था बल्कि मैं भी उस लड़ाई में शामिल था और मजदूरों को नेतृत्व किया था। आप इसका अकेले में श्रेय मत लीजिए । मेरे सांसद चुने जाने के बाद ही टाटा कंपनी 1700 मजदूरों को परमानेंट करने के लिए राजी हुआ जो 1990 में जमशेदपुर के लेबर कमिश्नर ऑफिस में समझौता हुआ था, जिसमें मेरा भी हस्ताक्षर हुआ । उस लड़ाई का एक ऐतिहासिक फोटो मैं यहां जारी कर रहा हूं। जुलूस के आगे- आगे हम दोनों हैं। लोग देखकर समझ जाएंगे । आप कुशल-मंगल रहिए।हमलोग झारखंड आंदोलन के साथी रहे हैं।

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