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    Home » विधानसभा चुनाव: राजनीतिक जंग में दांव पर लोकतांत्रिक मूल्य
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    विधानसभा चुनाव: राजनीतिक जंग में दांव पर लोकतांत्रिक मूल्य

    Devanand SinghBy Devanand SinghMarch 17, 2026No Comments6 Mins Read
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    विश्व इच्छा दिवस
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    राज्यों (असम, बंगाल, केरल, तमिलनाडु, पुडुचेरी) के आगामी विधानसभा चुनाव और लोकतांत्रिक मूल्यों की कसौटी पर ललित गर्ग का विचारोत्तेजक संपादकीय पढ़ें।

    -ः ललित गर्ग:-

    भारत जैसे विशाल लोकतांत्रिक देश में चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन की प्रक्रिया नहीं होते, बल्कि वे लोकतंत्र की परिपक्वता, जनविश्वास और राजनीतिक संस्कृति की परीक्षा भी होते हैं। जब किसी राज्य या क्षेत्र में चुनाव की घोषणा होती है तो स्वाभाविक रूप से राजनीतिक गतिविधियां तेज हो जाती हैं, आरोप-प्रत्यारोप का दौर चलता है और दल अपने-अपने एजेंडे को लेकर जनता के बीच पहुंचते हैं। किंतु इस पूरी प्रक्रिया के केंद्र में एक संस्था की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है-भारत का चुनाव आयोग। यही संस्था सुनिश्चित करती है कि चुनाव स्वतंत्र, निष्पक्ष और हिंसा-मुक्त वातावरण में संपन्न हों। इस बार असम, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और केरल जैसे चार बड़े राज्यों तथा केंद्रशासित प्रदेश पुडुचेरी में विधानसभा चुनावों की घोषणा के साथ ही देश की राजनीतिक सरगर्मियां तेज हो गई हैं। इन पांचों स्थानों की कुल 824 विधानसभा सीटों पर मतदान होना है और देश के 17.4 करोड मतदाताओं के मन एवं मानसिकता की जानकारी भी मिलेगी। पिछली बार की तुलना में इस बार मतदान कम चरणों में संपन्न कराया जा रहा है, जो प्रशासनिक दृष्टि से एक महत्वपूर्ण परिवर्तन माना जा सकता है। असम, केरल और पुडुचेरी में जहां 9 अप्रैल को मतदान प्रस्तावित है, वहीं तमिलनाडु की सभी 234 सीटों पर 23 अप्रैल को मतदान होना है। दूसरी ओर पश्चिम बंगाल में चुनाव दो चरणों में आयोजित किए जा रहे हैं-पहले चरण में 23 अप्रैल को 152 सीटों पर और दूसरे चरण में 29 अप्रैल को 142 सीटों पर मतदान होगा। इन चुनावों की ओर पूरे देश की निगाहें लगी हुई हैं, क्योंकि इनके परिणाम केवल इन राज्यों की राजनीति ही नहीं बल्कि राष्ट्रीय राजनीतिक परिदृश्य को भी प्रभावित कर सकते हैं।

    विधानसभा चुनाव
    इन चुनावों का महत्व केवल राजनीतिक सत्ता परिवर्तन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश के लोकतांत्रिक स्वास्थ्य की भी परीक्षा है। विशेष रूप से पश्चिम बंगाल में लंबे समय से राजनीतिक संघर्ष और टकराव की स्थिति देखने को मिलती रही है। वहां सत्तारूढ़ दल तृणमूल कांग्रेस और मुख्य विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी के बीच तीखी राजनीतिक प्रतिस्पर्धा है। इस प्रतिस्पर्धा के कारण कई बार चुनावी हिंसा और राजनीतिक तनाव की घटनाएं भी सामने आती रही हैं। इसलिए यह चुनाव केवल सत्ता की लड़ाई नहीं बल्कि यह भी एक कसौटी है कि क्या लोकतांत्रिक प्रक्रिया हिंसा और भय से मुक्त रहकर संपन्न हो सकती है। लोकतंत्र का मूल आधार यह है कि प्रत्येक मतदाता बिना किसी दबाव, भय या प्रलोभन के अपने मताधिकार का प्रयोग कर सके। भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में इस आदर्श को बनाए रखना आसान नहीं है। चुनाव आयोग के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही होती है कि चुनाव प्रक्रिया पूरी तरह निष्पक्ष और पारदर्शी बनी रहे। इसके लिए आयोग को सुरक्षा बलों की तैनाती, मतदान केंद्रों की व्यवस्था, इलेक्ट्रॉनिक मतदान मशीनों की सुरक्षा और मतदाता सूची की शुद्धता जैसे अनेक पहलुओं पर लगातार निगरानी रखनी पड़ती है। इसके अतिरिक्त राजनीतिक दलों और उनके कार्यकर्ताओं के आचरण पर भी नजर रखना जरूरी होता है ताकि चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन न हो।
    इन चुनावों के संदर्भ में पश्चिम बंगाल विशेष चर्चा का विषय बना हुआ है। लंबे समय से वहां राजनीतिक हिंसा और टकराव की घटनाएं सामने आती रही हैं। कई विश्लेषकों का मानना है कि इस बार वहां सत्ता परिवर्तन की संभावना के कारण राजनीतिक संघर्ष और तीखा हो सकता है। सत्तारूढ़ नेतृत्व का प्रतिनिधित्व करने वाली ममता बनर्जी की सरकार के सामने सत्ता बनाए रखने की चुनौती है, वहीं विपक्ष अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रहा है। इस परिस्थिति में चुनाव आयोग की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है कि वह मतदान प्रक्रिया को निष्पक्ष और शांतिपूर्ण बनाए रखे। दूसरी ओर केरल और तमिलनाडु की राजनीति भी अपने विशिष्ट स्वरूप के कारण चर्चा में रहती है। केरल में आमतौर पर सत्ता दो प्रमुख राजनीतिक मोर्चों के बीच बदलती रही है, जबकि तमिलनाडु की राजनीति क्षेत्रीय दलों के प्रभाव के लिए जानी जाती है। इन राज्यों में चुनावी प्रतिस्पर्धा तीव्र होती है, किंतु अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण वातावरण में मतदान की परंपरा भी देखने को मिलती है। असम की स्थिति भी अलग है, जहां पूर्वाेत्तर भारत की राजनीति के संदर्भ में चुनाव के परिणाम महत्वपूर्ण माने जाते हैं। यदि वहां सत्तारूढ़ दल फिर से सत्ता में लौटता है तो यह क्षेत्रीय राजनीति के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत माना जाएगा।
    हालांकि इन सभी चुनावों के संदर्भ में एक प्रश्न लगातार उठता है कि क्या राजनीतिक दल लोकतंत्र की मर्यादाओं का पालन करने के लिए पर्याप्त गंभीर हैं। चुनावी राजनीति में प्रतिस्पर्धा स्वाभाविक है, किंतु जब यह प्रतिस्पर्धा हिंसा, घृणा और असहिष्णुता में बदल जाती है तो लोकतंत्र की मूल भावना को चोट पहुंचती है। दुर्भाग्य से कई बार राजनीतिक दल चुनाव जीतने की होड़ में लोकतांत्रिक शालीनता को नजरअंदाज कर देते हैं। आरोप-प्रत्यारोप, व्यक्तिगत हमले और हिंसक घटनाएं इस प्रवृत्ति के उदाहरण हैं। इस स्थिति में यह केवल चुनाव आयोग की जिम्मेदारी नहीं रह जाती कि वह चुनाव को निष्पक्ष बनाए। राजनीतिक दलों और उनके नेताओं की भी उतनी ही जिम्मेदारी है कि वे लोकतंत्र की गरिमा को बनाए रखें। यदि दल स्वयं ही आचार संहिता का सम्मान करें और अपने कार्यकर्ताओं को संयमित आचरण के लिए प्रेरित करें तो चुनावी प्रक्रिया कहीं अधिक स्वस्थ और सकारात्मक बन सकती है। लोकतंत्र की सफलता केवल संस्थाओं पर निर्भर नहीं करती, बल्कि राजनीतिक संस्कृति और सामाजिक चेतना पर भी निर्भर करती है।
    इसके साथ ही मतदाताओं की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। लोकतंत्र में अंतिम निर्णय जनता के हाथ में होता है। यदि मतदाता जागरूक और सजग हों तो वे ऐसे नेताओं और दलों को प्रोत्साहित करेंगे जो लोकतांत्रिक मूल्यों का सम्मान करते हैं। मतदाताओं को यह समझना होगा कि उनका वोट केवल एक राजनीतिक विकल्प नहीं बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था की दिशा तय करने वाला निर्णय भी है। इन पांच क्षेत्रों में होने वाले चुनाव इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं क्योंकि वे यह संदेश देंगे कि भारत का लोकतंत्र किस दिशा में आगे बढ़ रहा है। यदि ये चुनाव शांतिपूर्ण, निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से संपन्न होते हैं तो यह न केवल देश के लिए बल्कि दुनिया के लिए भी एक सकारात्मक उदाहरण होगा। भारत को अक्सर दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में देखा जाता है, इसलिए यहां होने वाली चुनावी प्रक्रिया पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी नजर रहती है।
    निश्चित तसौर पर यह कहा जा सकता है कि चुनाव केवल राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का मंच नहीं हैं, बल्कि वे लोकतंत्र के मूल्यों की परीक्षा भी हैं। असम, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी में होने वाले चुनाव इस दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। यदि इन चुनावों में राजनीतिक दल संयम और जिम्मेदारी का परिचय दें, चुनाव आयोग अपनी निष्पक्षता और दृढ़ता बनाए रखे तथा मतदाता जागरूकता के साथ मतदान करें, तो यह लोकतंत्र की शक्ति को और अधिक सुदृढ़ करेगा। प्रश्न यह है कि क्या हम इन चुनावों के माध्यम से एक ऐसा आदर्श प्रस्तुत कर पाएंगे, जिसमें लोकतंत्र केवल मतपेटियों तक सीमित न रहकर शालीनता, सहिष्णुता और जनविश्वास की भावना को भी मजबूत करे। यही वह कसौटी है जिस पर इन चुनावों की सफलता या असफलता का वास्तविक मूल्यांकन किया जाएगा।

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