हरीश राणा की कहानी: मां-बाप का संघर्ष और इज्जत से विदाई
देवानंद सिंह
बेटा जा रहा है… पर इज्जत से एक मां-बाप की सबसे कठिन विदाई कभी-कभी जिंदगी ऐसे सवाल हमारे सामने खड़े कर देती है जिनका जवाब कानून, चिकित्सा और समाज तीनों मिलकर भी पूरी तरह नहीं दे पाते। गाजियाबाद में हरीश राणा की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। यह सिर्फ एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि उस मानवीय पीड़ा का दस्तावेज है जो उम्मीद और वास्तविकता के बीच वर्षों तक झूलती रहती है।
तेरह वर्षों तक कोमा में पड़े बेटे को जीवित रखने के लिए उसके माता-पिता ने जो कुछ किया, वह आज के समय में दुर्लभ उदाहरण है। पिता अशोक राणा ने घर बेच दिया, रोज़गार बदला, सड़कों पर सैंडविच बेचे, हर महीने इलाज के लिए बड़ी रकम जुटाई। मां निर्मला देवी ने बेटे के सिरहाने बैठकर अनगिनत रातें काटीं, हर सुबह इस उम्मीद के साथ कि शायद आज उसकी आंखें खुल जाएं। यह उम्मीद ही उनके जीवन का आधार बनी रही।
लेकिन कभी-कभी उम्मीद भी एक सीमा पर आकर थक जाती है। जब चिकित्सा विज्ञान ने स्पष्ट कह दिया कि अब कोई संभावना शेष नहीं है और न्यायपालिका ने भी मानवीय गरिमा के आधार पर निर्णय दिया, तब माता-पिता को वह फैसला स्वीकार करना पड़ा जिसे कोई भी मां-बाप अपने जीवन में नहीं लेना चाहते।
यह घटना एक बड़े सवाल की ओर भी इशारा करती है — क्या जीवन केवल सांसों का नाम है, या फिर सम्मान और गरिमा भी उसका उतना ही जरूरी हिस्सा है? आधुनिक चिकित्सा विज्ञान ने जहां जीवन को लंबे समय तक बनाए रखने की क्षमता दी है, वहीं यह नैतिक दुविधा भी खड़ी कर दी है कि कब जीवन को सम्मानपूर्वक विदा देने का समय आ जाता है।
हरीश के माता-पिता का दर्द केवल व्यक्तिगत नहीं है; यह उन हजारों परिवारों की पीड़ा का प्रतीक है जो गंभीर बीमारियों और असाध्य स्थितियों से जूझते हुए उम्मीद और यथार्थ के बीच संघर्ष करते रहते हैं। इस पूरे प्रसंग में एक बात सबसे अधिक मार्मिक है—एक मां का निवेदन कि उसके बेटे की अंतिम घड़ी को तमाशा न बनाया जाए।
आज के डिजिटल और तेज़ रफ्तार मीडिया युग में यह अपील हमें आईना दिखाती है। किसी की निजी त्रासदी हमारे लिए खबर हो सकती है, लेकिन उस परिवार के लिए वह जीवन का सबसे कठिन क्षण होता है। संवेदनशीलता और मानवीय मर्यादा पत्रकारिता की सबसे बड़ी कसौटी होनी चाहिए।
अंततः, हरीश राणा की कहानी हमें यह याद दिलाती है कि माता-पिता का प्रेम समय, परिस्थिति और निराशा की सीमाओं से भी बड़ा होता है। तेरह साल तक उम्मीद को जिंदा रखने के बाद जब विदाई का समय आया, तब भी उनके शब्दों में शिकायत नहीं, बल्कि एक ही भावना थी—“बेटा जा रहा है… पर इज्जत से जा रहा है।”
शायद यही इस पूरे प्रसंग का सबसे बड़ा सच है कि जीवन की अंतिम घड़ी में भी इंसान की गरिमा ही उसका सबसे बड़ा सहारा बनती है।

