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    Home » 35 साल से गठबंधन की मिसाल बनी हुई है बिहार राजनीति
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    35 साल से गठबंधन की मिसाल बनी हुई है बिहार राजनीति

    Sponsored By: सोना देवी यूनिवर्सिटीOctober 22, 2025No Comments5 Mins Read
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    देवानंद सिंह
    बिहार में अंतिम चरण की नामांकन प्रक्रिया समाप्त होने के साथ ही चुनावी सरगर्मियां तेज हो चुकी हैं। जीत की अभिलाषा लिए नेताओं व उनके राजनीतिक दलों ने बढ़-चढ़कर दावे-प्रतिदावे करने शुरू कर दिए हैं। लेकिन कोई भी दल अपने दम पर बिहार में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने का दावा नहीं कर रहा है। वह अपने दल वाली गठबंधन की जीत का दावा कर रहा है। ऐसा करना उनकी मजबूरी है क्योंकि तीन दशक से अधिक समय से यहां गठबंधन की ही सरकार रही है।

     

     

    हकीकत है कि बिहार की सियासत में बिना गठबंधन कोई पार्टी नहीं चल पाती है । लगभग 35 साल से यहां हर सरकार जोड़-घटाव के फार्मूले पर बनी है। नीतीश-लालू से लेकर से दिवंगत रामविलास पासवान और अब उनके बेटे चिराग पासवान तक, सबका सफर बताता है कि बिहार को गठबंधन की आदत सी लग गई है।

     

     

    भारत की दो सबसे बड़ी पार्टियां भाजपा और कांग्रेस का भी यहां यही हाल है। मौजूदा सत्तासीन बिहार सरकार में भाजपा जहां नीतीश कुमार की अगुवाई वाली जदयू व चिराग की लोजपा (आर) व जीतन राम मांझी की हम व उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी के साथ सरकार चला रही है वहीं प्रमुख विपक्षी दल राजद सत्ता में आने के लिए कांग्रेस, वामपंथी दलों व वीआईपी के साथ चुनावी मैदान में उतरीं हुईं हैं।

     

     

    सच कहें तो ऐसा लगता है कि बिहार को गठबंधन की लत सी लग गई है।
    अगर बिहार की सत्ता की गठबंधन वाली स्क्रिप्ट देखी जाए, तो 1990 से अब तक दो ही चेहरे हर फ्रेम में मुख्य रूप से रहे हैं, लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार। लालू ने 1990 में बीजेपी के समर्थन से मुख्यमंत्री की कुर्सी पाई, फिर उसी बीजेपी के खिलाफ महागठबंधन बनाया। नीतीश कुमार भी कम पीछे नहीं रहे, वे बीजेपी से नाता जोड़कर मुख्यमंत्री बने, फिर आरजेडी से मिल गए, फिर दोबारा एनडीए में लौटे।

     

     

    इन 35 सालों में नीतीश कुमार ने 9 बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, लेकिन हर बार किसी न किसी गठबंधन के सहारे। लालू और नीतीश की राजनीति इस बात की मिसाल है कि सियासी कुर्सी का रास्ता अब विचारों से नहीं, जोड़-घटाव और गठबंधन के गलियारों से तय होता है।

     

     

    यह भी कटु सच है कि बिहार की राजनीति जातीय समीकरणों के बिना अधूरी है। यादव, कुर्मी, राजपूत, भूमिहार, मुसलमान, हर वर्ग को एक “राजनैतिक ठिकाना” चाहिए, और यही ठिकाने ही गठबंधन की जमीन बनाते हैं। उदाहरण के लिए, आरजेडी का ‘MY समीकरण’ (मुस्लिम-यादव) तभी काम करता है जब कांग्रेस या वाम दल जैसे सहयोगी दल उसके साथ आएं।

     

     

    भाजपा को भी नीतीश या जीतनराम मांझी जैसे सहयोगियों की जरूरत पड़ती है, ताकि उसे सवर्ण से लेकर अतिपिछड़ा वोट तक एक साथ मिल सके। यानी बिहार में “किसका वोट किसके पास जाएगा” यही असली विज्ञान है, और गठबंधन ही उसकी केमिस्ट्री।

    ऐसे में यह सवाल भी जब तब उठता रहता है कि बिहार में गठबंधन की मजबूरी है या कमजोरी? इतिहास में जाएं तो 1967 से अब तक बिहार ने 9 बार सरकारें बदली हैं, कई बार मुख्यमंत्री का कार्यकाल हफ्ते तक ही चल सकी हैं। इन सबसे राजनीतिक पार्टियों ने जो आउटपुट निकाला वो है, “अकेले लड़ना नुकसान का सौदा है”। यही सोच अब गहराई तक बैठ गई है।

    चुनाव लड़ने से पहले ही पार्टियां पोस्ट-इलेक्शन अरेंजमेंट सोचने लगती हैं। आज की तारीख में महागठबंधन में 7 दल और एनडीए में 5 सहयोगी दलें शामिल हैं, जिनके बीच सीट बंटवारे को लेकर अंदरखाने जंग भी देखने को मिला था। पर यह सच भी है कि जैसे ही नतीजे बदलते हैं, गठबंधन भी बदल जाता है।

     

     

    सच्चाई है कि बिहार में “गठबंधन मजबूरी सी हो गई है। असल में, बिहार में कभी किसी एक पार्टी को 35% से ज़्यादा वोट नहीं मिले। भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की बात करें तो बिहार में कभी भी वह अपने दम पर सरकार नहीं बना पाई है। जितने भी समय बीजेपी बिहार की सत्ता में रही है, वो जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) के सहारे और नीतीश कुमार के नेतृत्व में ही रही है।

     

     

    साल 2015 में जब बीजेपी ने जेडीयू से अलग होकर चुनाव लड़ा, तो पार्टी सिर्फ़ 53 सीटों पर सिमट गई थी। वहीं 2020 में पार्टी ने जेडीयू के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ा, तो बीजेपी को 74 और जेडीयू को सिर्फ़ 43 सीट मिली थी। बीजेपी 2020 में जेडीयू से बड़ी पार्टी बनी थी लेकिन उसने अपना मुख्यमंत्री नहीं बनाया। पार्टी को बिहार की जातीय संरचना के चलते नीतीश का साथ किसी भी क़ीमत पर चाहिए। नीतीश के साथ नहीं रहने पर उसकी स्थिति 2015 जैसी हो जाती है।
    यानी, अकेले दम पर कोई पार्टी यहां जीत नहीं पाती है, इसलिए सबको दोस्ती करनी पड़ती है। ये सिलसिला समाज की अलग-अलग जातियों से शुरू हुआ और अब राजनीति की मजबूरी बन गया है। जितनी जातियां, उतने नेता और सबको थोड़ा-थोड़ा हिस्सा चाहिए। नतीजा ये हुआ कि जनता आज तक नहीं समझ पाई कि असली जिम्मेदारी किसकी है ?

    हालांकि जाति आधारित राजनीति को तोड़ने की बिहार में पहली बार कोशिश की गई है और यह कोशिश करने वाला कोई और नहीं बल्कि जाना पहचाना नाम प्रशांत किशोर हैं। उनकी पार्टी जनसुराज इस बार के चुनाव में बिना किसी दूसरे दलों के साथ गठबंधन कर दमखम के साथ लगी हुई है। बिना किसी जाति धर्म आदि को देखते हुए जनसुराज ने पढ़े लिखे कैंडिडेट्स उतारे हैं लेकिन रिजल्ट क्या रहता है, यह देखने वाली बात होगी।

    अगर जनसुराज कुछ करिश्मा करने में सफल हो जाता है तो बिहार में एक अलग तरह की राजनीति की बुनियाद पड़ जाएगी जो आने वाले समय के लिए निसंदेह अच्छा रहेगा लेकिन बिहार जैसे राज्य जहां जाति आधारित राजनीति ही होती रही है वहां जनसुराज की सोच कितना असर डाल पाती है यह देखने वाली बात होगी।

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