लेखक: डॉ. घनश्याम भारतीय
अयोध्या में मछली पर महाभारत की यह घटना सावन माह के अंतिम सोमवार को घटी जब कांग्रेस नेता रामनिहाल निषाद के सम्मान समारोह में मछली भात परोसा गया।
अयोध्या में मछली पर महाभारत: वायरल वीडियो से भड़का विवाद
उमड़ते घुमड़ते बादलों के बीच श्रद्धा और आस्था को जीवन्त करता सावन का महीना बीत गया, परंतु इस बार का सावन मछली पर महाभारत को लेकर बहुत दिनों तक याद किया जाता रहेगा। ऐसा इसलिए भी क्योंकि मछली को लेकर आस्था की नगरी अयोध्या में जिस तरह की सियासत हुई वह भविष्य की राजनीति के लिए अच्छा संकेत नहीं है। रामनगरी की पावन भूमि पर सियासी तालाब से निकलकर कड़ाही तक पहुंची मछली को लेकर छिड़ी महाभारत पर हो रही हर चर्चा बे मतलब कही जा सकती है। कहा जा सकता है कि मछली भात पार्टी को तूल देकर जनता को जरूरी और असल मुद्दों से भटकाने की कोशिश भी हो रही है।
बात यह ध्यान देने की है कि राम जन्मभूमि से लगभग 31 किमी दूर तारुन बाजार के एक मैरेज लॉन में 24 अगस्त को सावन के अंतिम सोमवार को कांग्रेस नेता रामनिहाल निषाद ने एक सम्मान समारोह का आयोजन किया था। जिसमें शामिल होने के लिए कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय राय आये थे। कार्यक्रम में पहुंचने से पहले श्री राय रामजन्मभूमि और हनुमान गढ़ी में दर्शन पूजन किया। उसके बाद सीधे उस कार्यक्रम में पहुंचे जो सियासी महाभारत का कारण बना है। ऐसा इसलिए भी क्योंकि कार्यक्रम में खान-पान का एक वीडियो वायरल हो गया। वायरल वीडियो में लोग मछली भात खाते नजर आए। वह भी सावन में एकादशी को। बस इसी बात को लेकर लोगों ने अपने-अपने तरकश के तीर निकाल कर एक दूसरे पर वार करना शुरू कर दिया।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना मामला
अयोध्या से निकलकर यह मामला मीडिया के जरिये आरोपों प्रत्यारोपों के बीच अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया। धार्मिक आस्था, परंपरा और सार्वजनिक स्थलों की मर्यादा से जुड़े सवालों ने मामले को तूल दिया। देखते ही देखते मछली भात का मुद्दा धार्मिक रणक्षेत्र से निकलकर राजनीतिक और सामाजिक बहस में बदल गया। अलग-अलग पक्षों की ओर से सामने आ रहे बयानों ने माहौल को खूब गरम किया।
एक पक्ष जहां धार्मिक नगरी की गरिमा और उसकी मर्यादा के साथ श्रद्धालुओं की भावनाओं का हवाला देता रहा वहीं दूसरा पक्ष इसे सामान्य गतिविधि बताते हुए अनावश्यक विवाद खड़ा करने की बात कर रहा है। सोशल मीडिया ने भी आग में घी का ही काम किया। इस मामले को ऐसे प्रस्तुत किया जा रहा है मानो सावन में मछली भात खाकर बहुत बड़ा पाप कर दिया गया हो। इसी बीच एक टीवी डिबेट में कांग्रेस के प्रवक्ता कुंवर सिंह निषाद और हनुमानगढ़ी के संत राजू दास के बीच अमर्यादित शब्दों की हुई बौछार ने मामले को और तूल दे दिया।
अयोध्या की संवेदनशीलता और स्थानीय लोगों की राय
अयोध्या में देश-विदेश से प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। ऐसे में यहां होने वाली छोटी से छोटी घटना भी व्यापक चर्चा का विषय बन जाती है। स्थानीय लोगों का कहना है कि धार्मिक नगरी की पहचान और आपसी सौहार्द को ध्यान में रखते हुए किसी भी विवाद का समाधान शांतिपूर्ण तरीके से होना चाहिए। इसके बावजूद मछली पार्टी को लेकर शुरू हुआ विवाद धीरे-धीरे अब सियासी रंग लेता जा रहा है।
कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष अजय राय ने सीधे तौर पर कह दिया कि वह हनुमानगढ़ी गए। पूजा अर्चन किया। उसके बाद कार्यक्रम में आए। जिसके संपन्न होने के बाद सीधे लखनऊ चले गए। चूंकि उस दिन उनका एकादशी का व्रत था। इसलिए कुछ भी खाने पीने का औचित्य ही नहीं उठाता। उन्होंने सीधे तौर पर ऐलान किया यदि कोई यह साबित कर दे कि उन्होंने मछली भात खाया तो वे राजनीति से संन्यास ले लेंगे। इसके बावजूद भी लोग मामले को लगातार तूल दे रहे हैं।
निषाद समुदाय की आजीविका और दोहरे मापदंड का सवाल
बात यह भी सामने आई कि वह निषादों का कार्यक्रम था। दुनिया जानती है कि निषाद समुदाय का मुख्य पेशा मछली पालना, पकड़ना और उसका व्यवसाय करना है। ऐसे में वह मछली नहीं खाएगा तो आखिर क्या खाएगा। दूसरी तरफ जब हिंदू बस्तियों के इर्द-गिर्द किसी मुसलमान की गलती से गोमांस का टुकड़ा मिल जाता है तो सभी हिंदुओं की आस्था प्रभावित होने लगती है। ठीक उसी तरह से जब हिंदुओं का एक बड़ा समूह सावन के महीने में मांसाहार से परहेज करता है तब उसे दिखाकर मांसाहार करना उसे चिढ़ाने से कम नहीं है। ऐसा इसलिए क्योंकि खाया सो खाया मगर उसका वीडियो वायरल कर दिया। जाहिर सी बात है जिसने वीडियो बनाकर वायरल किया वह भी इस पार्टी में ही शामिल रहा होगा।
खास बात यह है कि मछली पार्टी को लेकर निषाद समुदाय को ही निशाने पर रखा गया। चाहे वह सत्ता पक्ष हो या विपक्ष सभी ने इस समुदाय पर उंगलियां उठाई। जबकि निषाद समुदाय धर्म और आस्था के प्रति किसी से पीछे नहीं है। इससे खिन्न निषाद समुदाय के पढ़े-लिखे लोगों का यह कथन बहुत कुछ सोचने को मजबूर करता है कि सावन के महीने में या किसी अन्य पवित्र मौके पर चोरी, हत्या, लूट और दुष्कर्म जैसी वारदात को अंजाम देना क्या उतना पाप नहीं है जितना सावन में मछली खा लेने से हो गया।
परंपराओं में बदलाव और शराब बनाम मांस की नीति
एक और बात जो थोड़ी अटपटी जरूरी है परंतु प्रसंगवश उसे कहना आवश्यक है। मुझे याद है कि मेरे बचपन के दिनों से लेकर अब से करीब 20 वर्ष पूर्व तक जब बड़े शहरों को छोड़ ग्रामीण क्षेत्रों में कांवरियों की संख्या न के बराबर थी, तब सावन के प्रमुख पर्व नाग पंचमी पर सुबह घर के बुजुर्ग नाग देवता को दूध लावा चढ़ाने निकलते थे। युवतियां और महिलाएं पेड़ों पर पड़े झूले झूलती थी। किशोर वय लोग डंडा लेकर गांव के किनारे तालाब में गांव की लड़कियों द्वारा फेंकी गई गुड़िया को पीटते थे। बदले में लड़कियों से प्राप्त भीगा चना लेकर घर लौटते थे। इसके बाद युवा कुश्ती और कबड्डी खेलते थे। जगह-जगह आल्हा गायन होता था। इसी बीच बुजुर्ग वे चाहे जिस जाति और समुदाय के हो हर हाल में मांस खरीद कर लाते थे। दिन में ही उसका सेवन करते थे। यही नहीं एक दूसरे के घर जाने पर इसी मांसाहार से स्वागत भी किया जाता था। तब किसी की आस्था प्रभावित नहीं होती थी। लेकिन इधर करीब दो दशक से जब से कांवर यात्रा में लोगों की तादाद बढ़ी तब से मांस मछली के सेवन और बिक्री पर बड़ा प्रतिबंध सामने आया। उत्तर प्रदेश के तरकुलहा गोरखपुर मंदिर में हर समय और अंबेडकरनगर के साबुकपुर के प्राचीन दुर्गा मंदिर में नवरात्रि की अष्टमी नवमी को दी जाने वाली बकरे की बलि पर भी रोक लगनी चाहिए।
अब सवाल उठता है कि मांस मछली खाकर कोई व्यक्ति अपराधिक कदम तो नहीं उठा सकता, लेकिन शराब पीकर सारे अपराध किए जा सकते हैं। इसके बावजूद भी सावन में मांस मछली को प्रतिबंधित करते हुए शराब की बिक्री को खुलेआम छूट देना दोहरी नीति नहीं तो और क्या है। आम तौर पर मांस मछली बेचने वाले छोटी पूंजी के गरीब लोग और शराब के कारोबारी बड़े-बड़े धन्ना सेठ होते हैं। जिनके कारोबार पर न रोक लगाकर छोटे और गरीब लोगों के व्यवसाय को बंद कराना भी खुद में बड़ा सवाल है। जिसका उत्तर शायद ही किसी के पास हो। अयोध्या के बारे में अधिक जानें

