“वह बृक्ष”–
मोहन गौतम। (खैरानी)बाक्सा-असम।।
कीड़े मकोड़े चींटियों का बसेरा हुआ करता था
भ्रमर के गुनगुनाहट और मधुमखियों के धुन
में ख़ुदको सजाता सवारता था
भले ही वह पुराना और बुढ़ा होगया था
फ़िरभी प्राणियों के होशलों के चलते
आंधी तूफानोंको भी सहन कर मर्यादापूर्ण
हर नयी किरण के आगमन का संदेश देकर
प्रकृतिको नवजीवन देता था।।
हाँ वह एक विशाल बृक्ष था
धरापर विजय पाकर
मानव तथा जीवकूलको पालन पोषन करता
पवनकी गति में पत्तोंको हिलाते हुए
अठखेलियाँ भी किया करता था।।
सालों से उन तमाम चिड़ियोंका डेरा बनकर
प्राणियों एवं पशुओं का पालनहार बनगया था
जो आज इस धरा पर न था जिसकारण
पक्षियों चीटियां कीड़ो मकौड़े में काफ़ी सुना पड़ा था।।
प्राणी एवं जीवकूल में हलचल मचगया था
धरतिका रक्षक एवं पर्यावरणका
पितामह स्वरूप माना जाता था
वह बृक्ष आज धरा पर न था।।

