मुद्दा बड़ा है, लेकिन विपक्ष की एकजुटता की परीक्षा भी
देवानंद सिंह
चुनाव आयोग और विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को लेकर विपक्ष लगातार सवाल उठा रहा है। इसी मुद्दे पर 30 सितंबर को दिल्ली के कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में इंडिया गठबंधन की बैठक प्रस्तावित है। लेकिन बैठक से पहले ही घटक दलों की उपस्थिति को लेकर जो तस्वीर सामने आई है, उसने एक अहम सवाल खड़ा कर दिया है क्या विपक्ष चुनावी मतभेदों से ऊपर उठकर किसी साझा मुद्दे पर एकजुट हो पाएगा?
लोकतंत्र में मतदाता सूची महज कागज का दस्तावेज नहीं है। यही सूची तय करती है कि कौन अपने मताधिकार का इस्तेमाल कर सकेगा। इसलिए नाम जोड़ने, हटाने या सत्यापन की प्रक्रिया में पारदर्शिता और स्पष्ट नियम बेहद जरूरी हैं। निर्वाचन आयोग को भी यह भरोसा कायम रखना होगा कि पूरी प्रक्रिया निष्पक्ष, पारदर्शी और समान मानकों के आधार पर चल रही है। दूसरी ओर, राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी है कि वे गंभीर आरोपों को प्रमाण और दस्तावेजों के साथ जनता के सामने रखें।
दिलचस्प यह है कि जिन दलों ने अलग-अलग राज्यों में एक-दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़ा है, वे राष्ट्रीय स्तर पर चुनाव आयोग और एसआईआर के सवाल पर एक मंच तलाश रहे हैं। कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के बीच दिल्ली की राजनीति में लंबे समय से प्रतिस्पर्धा रही है। तमिलनाडु में डीएमके और कांग्रेस के रिश्तों में भी चुनावी परिस्थितियों के बाद दूरी की खबरें सामने आई हैं। समाजवादी पार्टी भी उत्तर प्रदेश की अपनी राजनीतिक प्राथमिकताओं के साथ आगे बढ़ रही है।
अखिलेश यादव का बैठक में व्यक्तिगत रूप से शामिल न होना, लेकिन प्रतिनिधियों का भेजा जाना, अपने आप में गठबंधन से दूरी का अंतिम प्रमाण नहीं माना जा सकता। इसी तरह आप और डीएमके की अनुपस्थिति को भी उसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए जिसमें इन दलों की अपनी राजनीतिक परिस्थितियां हैं।
असल सवाल यह है कि क्या विपक्ष के पास केवल विरोध दर्ज कराने की रणनीति है या वह निर्वाचन सुधार, मतदाता सूची की पारदर्शिता और चुनावी संस्थाओं की जवाबदेही को लेकर कोई ठोस वैकल्पिक प्रस्ताव भी सामने रखेगा। क्योंकि लोकतंत्र में केवल यह कहना पर्याप्त नहीं कि व्यवस्था में गड़बड़ी है; जनता यह भी जानना चाहती है कि समाधान क्या है।
इंडिया गठबंधन के सामने इसलिए दोहरी चुनौती है एक तरफ चुनाव आयोग और एसआईआर से जुड़े सवालों को तथ्य के आधार पर उठाना और दूसरी तरफ अपने भीतर के राजनीतिक मतभेदों के बावजूद न्यूनतम साझा एजेंडा तैयार करना। बैठक में यदि आरोपों से आगे बढ़कर ठोस तथ्य, कानूनी विकल्प और सुधारों की रूपरेखा सामने आती है, तो बहस अधिक सार्थक होगी। आखिरकार चुनाव आयोग पर भरोसा सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों के लिए समान रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि लोकतंत्र की विश्वसनीयता किसी एक दल की नहीं, पूरे देश की संपत्ति है।

