भगवान विश्वकर्मा : सृष्टि के प्रथम शिल्प एवं वास्तुकार
• प्रमोद दीक्षित मलय
महाभारत में वर्णन आता है कि जब कुरु वंश में हस्तिनापुर राज्य का बंटवारा हुआ तो कौरवों को पूर्ण विकसित सुव्यवस्थित कला, शिल्प, संस्कृति से सुसज्जित नगर हस्तिनापुर प्राप्त हुआ तथा पांडवों को ऊबड़-खाबड़ पठार एवं कानन युक्त खांडव वन। जब पांडव मार्गदर्शक भगवान श्रीकृष्ण के साथ खांडव वन पहुंचे तो किंकर्तव्यविमूढ़ खड़े हो विचारमग्न हो गये। श्रीकृष्ण ने नैराश्य के सागर में डूबते-उतराते पांडवों को देख स्नेह-सम्बल दिया और नगर निर्माण हेतु देवशिल्पी भगवान विश्वकर्मा का आह्वान किया। भगवान विश्वकर्मा मायावी कला में निष्णात अपने पुत्र मय के साथ प्रकट हो नगर निर्माण में संलग्न हो गये। अपने कला-कौशल से अल्प समय में ही भव्य भवन, आकर्षक महल, उपवन-वाटिका, सरोवर और सड़कें तैयार कर दीं। इस इंद्रप्रस्थ नगर की राजसभा को अद्भुत मायावी कला से निर्माण किया जिसमें जल में थल और थल में जल का भान हो जाता था। इसी भूमि पर ब्रह्मा द्वारा निर्मित प्राचीन प्रलयंकारी देव धनुष गांडीव मिला जिसकी उचित साज-सज्जा कर विश्वकर्मा ने की, जिसे वरुण देव द्वारा अर्जुन को प्रदान किया गया। अस्त्र-शस्त्र आयुध सामग्री एवं रथ निर्माता, शिल्प, स्थापत्य के वास्तुकार भगवान विश्वकर्मा की जयंती प्रत्येक वर्ष भाद्रपद माह में मना कर श्रम कलासाधक अपने भविष्य की बेहतरी और कार्यस्थल में सुख-शांति की कामना करते हैं।
भगवान विश्वकर्मा को देवशिल्पी कहा जाता है। इन्होंने सतयुग में स्वर्गलोक, देवेश इंद्र हेतु इंद्रपुरी, त्रेता में कोषाधिपति कुबेर हेतु सोने की लंका और पुष्पक विमान, द्वापर में श्रीकृष्ण की नगरी द्वारका और कलियुग में हस्तिनापुर एवं इंद्रप्रस्थ की रचना की। इतना ही नहीं भगवान विश्वकर्मा ने देवताओं के लिए रथ एवं अस्त्र-शस्त्रों का भी निर्माण किया। गरुणध्वज नारायण विष्णु का सुदर्शन चक्र, महाकालेश्वर शंकर का ‘विजय’ नामक त्रिशूल, जगन्नाथ मंदिर एवं कृष्ण-बलराम एवं सुभद्रा की मूर्तियां, ऋषि दधीचि की अस्थियों से निर्मित इंद्रायुध वज्र आदि का निर्माण भगवान विश्वकर्मा ने ही किया है। भगवान विश्वकर्मा के बारे में ऋग्वेद एवं पुराणों में वर्णन मिलता है। स्कंद पुराण, वायु पुराण, अग्नि पुराण एवं विष्णु पुराण में विश्वकर्मा का काष्ठ, धातु, स्थापत्य, प्रस्तर शिल्प एवं ताम्रकला का वास्तुकार कह अर्चन-वंदन किया गया है। वह उपर्युक्त पंचकलाओं में प्रवीण एवं वस्तुओं की आकृति, आकार-प्रकार, सिद्धांत एवं निर्माण विधि के ज्ञाता एवं जनक हैं। शिल्प शास्त्रीय ग्रंथों में उनके पांच पुत्र मनु, मय, त्वष्टा, शिल्पी एवं देवज्ञ बतलाए गये हैं जो लोकजीवन की पांच अलग-अलग कलाओं में दक्ष हैं। मनु लौह कला, मय काष्ठ कला, त्वष्टा दिव्य अस्त्र-शस्त्र एवं आभूषण निर्माण कला, शिल्पी प्रस्तर कला एवं देवज्ञ ताम्रकला में दक्ष हैं। वर्तमान समय में इन पांचों के वंशज ही लुहार, बढ़ई, स्वर्णकार, शिल्पकार ठठेरा, ताम्रकार आदि समूहों में अपने कार्यों से लोकहित का कार्य कर रहे हैं।
वस्तुत: भगवान विश्वकर्मा कला-कौशल सम्पन्न श्रमशील समुदाय के आराध्य देव हैं जो लोक रचना में सतत सक्रिय एवं सहभागी हैं। विश्वकर्मा जयंती के अवसर पर सुनार, सुथार, लुहार, ठठेरा, मैकेनिक, कल-कारखानों में काम करने वाले श्रमिक, आयुध निर्माण केंद्र, रेलवे अन्यान्य ऐसे विभाग जहां मशीन एवं औजारों के माध्यम से कार्य संपादित किए जाते हैं, वे सभी व्यक्ति विश्वकर्मा जयंती के दिन कार्य बंद करके अपने औजारों एवं मशीनों को साफ-स्वच्छ कर यथावश्यक रंग-रोगन करते हैं। तत्पश्चात पवित्र जल से भूमि सिंचित कर उच्चासन में भगवान विश्वकर्मा का छवि चित्र स्थापित कर पूजन कर नैवेद्य का भोग लगाते हैं। दूकानों एवं कल-कारखानों को फूलों, केला एवं आम के पत्तों से सजाया जाता है। सम्मिलित होकर भगवान विश्वकर्मा से प्रार्थना करते हैं कि कार्यस्थल में सुख-शांति एवं समृद्धि का वास रहे, सभी स्वस्थ एवं प्रसन्न रहें तथा उनके कला-कौशल को यश प्राप्त हो तथा बेहतर भविष्य के साथ कामकाजी स्थिति हमेशा सुरक्षित और सफल रहें।
भगवान विश्वकर्मा जयंती भारत एवं नेपाल में प्रमुखता से मनाई जाती है। भारत में इस अवसर पर उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, दिल्ली, राजस्थान, हरियाणा, बंगाल, बिहार, ओडिसा, कर्नाटक, त्रिपुरा आदि राज्यों में सर्वाधिक हर्षोल्लास दिखाई देता है। निर्विवाद रूप से भगवान विश्वकर्मा लोक कल्याण के देवता हैं। वह समाज को एक सूत्र में पिरोने वाले पावन भाव के प्रणेता है। लोक रचना की यशस्वी रचनात्मक गाथा हैं। भगवान विश्वकर्मा सम्पूर्ण मानवता के हितैषी एवं शिल्पकला के मार्गदर्शक हैं। समाज में लोक रचना का भाव अनवरत अविच्छिन्न बना रहे, यही कामना है।
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लेखक शिक्षक एवं शैक्षिक संवाद मंच के संस्थापक हैं।
बांदा, उत्तर प्रदेश
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