दलमा में सवाल सिर्फ रिजॉर्ट का नहीं, जवाबदेही का भी
राष्ट्र संवाद संवाददाता
दलमा वन्यजीव अभयारण्य केवल जंगल और वन्यजीवों का क्षेत्र नहीं, बल्कि झारखंड की महत्वपूर्ण प्राकृतिक धरोहर है। ऐसे संवेदनशील क्षेत्र में करोड़ों रुपये की किसी परियोजना से जुड़े सवाल उठें तो वन विभाग की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। करीब 11 करोड़ रुपये के प्रस्तावित या निर्माणाधीन एको रिट्रीट रिजॉर्ट को लेकर सामने आ रही परस्पर विरोधी सूचनाएं इसी कारण गंभीरता से लिए जाने की जरूरत है।
यदि परियोजना का कोई हिस्सा आपत्ति के बाद रुका है, तो विभाग को स्पष्ट करना चाहिए कि आपत्ति किस आधार पर हुई, निर्माण की वर्तमान वैधानिक स्थिति क्या है और अब तक सरकारी स्तर पर क्या कार्रवाई की गई है। यदि निर्माणाधीन हिस्से को तोड़े जाने या सामग्री हटाए जाने की चर्चा निराधार है, तो विभाग को मौके की वास्तविक स्थिति सार्वजनिक करने में संकोच नहीं होना चाहिए।
दूसरा महत्वपूर्ण प्रश्न सेवानिवृत्त रेंजर दिनेश चंद्र की कथित विभागीय सक्रियता से जुड़ा है। यदि उनका सेवा विस्तार फरवरी 2026 में समाप्त हो चुका है और उसके बाद कोई नया आदेश जारी नहीं हुआ, तो विभाग को उनकी वर्तमान भूमिका और अधिकार स्पष्ट करने चाहिए। आखिर किस हैसियत से वे विभागीय गतिविधियों या बैठकों में शामिल हो रहे हैं?
लोकतंत्र में सवाल उठाना विरोध नहीं, जवाबदेही का हिस्सा है। पत्रकारों को मौके पर जाने से रोके जाने की बात भी सामने आई है, जिसकी स्थिति और आधार स्पष्ट होना चाहिए। दलमा के मामले में वन विभाग को आरोप-प्रत्यारोप से ऊपर उठकर दस्तावेज, आदेश और वास्तविक स्थिति सार्वजनिक करनी चाहिए। पारदर्शिता ही संदेह का सबसे प्रभावी समाधान है।

