सांसद बनाम सफेदपोश कारोबारी: आदित्यपुर में बढ़ते सवाल, पर्दे के पीछे कौन?
जेपी चोपड़ा की स्मृति में होने वाला रक्तदान शिविर क्यों बंद हुआ?
एसिया की पुरानी परंपराओं, नेतृत्व और औद्योगिक भूखंडों को लेकर उद्यमियों में चर्चा
देवानंद सिंह
आदित्यपुर के औद्योगिक गलियारों में इन दिनों कारोबारी रसूख, संगठनात्मक राजनीति और औद्योगिक हितों को लेकर चर्चाएं तेज हैं। मामला केवल एक सांसद और एक कारोबारी के बीच कथित तनातनी तक सीमित नहीं दिख रहा, बल्कि एसिया की कार्यशैली, पुराने सामाजिक सरोकारों, औद्योगिक भूखंडों और कथित राजनीतिक संरक्षण को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं। हालांकि, लगाए जा रहे आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और दस्तावेजी जांच जरूरी है।
कभी स्व. जेपी चोपड़ा की स्मृति में एसिया भवन में आयोजित वार्षिक रक्तदान शिविर आदित्यपुर के औद्योगिक क्षेत्र की सामाजिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता था। दावा है कि शिविर में 500 से 700 यूनिट तक रक्त संग्रह होता था। आज कई संस्थाएं बड़े स्तर पर रक्तदान शिविर आयोजित कर रही हैं, लेकिन एसिया की वह पुरानी परंपरा दिखाई नहीं देती। सवाल उठ रहा है कि आखिर यह सामाजिक अभियान क्यों बंद हुआ?
इसके साथ ही एसिया के गठन और औद्योगिक हितों के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले वरिष्ठ उद्यमियों की विरासत और संगठन की वर्तमान कार्यशैली पर भी चर्चा हो रही है। आलोचकों का आरोप है कि संगठन के मूल उद्देश्य उद्यमियों की सामूहिक समस्याओं के समाधान की जगह व्यक्तिगत प्रभाव और अधिकारियों-राजनेताओं से नजदीकी को प्राथमिकता मिल रही है। इन आरोपों पर संगठन का पक्ष सामने आना अभी बाकी है।
औद्योगिक भूखंडों का मुद्दा भी सवालों के घेरे में है। जियाडा की भूमि आवंटन संबंधी बैठकों में सक्रियता, बड़े औद्योगिक भूखंडों के इस्तेमाल और एक कथित भूखंड पर गायें बांधे जाने जैसे मामलों को लेकर उद्यमियों के बीच चर्चाएं हैं। वहीं, आरोप यह भी लगाए जा रहे हैं कि जिस औद्योगिक क्षेत्र में नए उद्योगों को जमीन मिलने में कठिनाई होती है, वहां बड़े भूखंडों के उपयोग को लेकर पारदर्शिता सुनिश्चित होनी चाहिए।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि हजारों उद्योगों और लाखों श्रमिकों के हितों से जुड़े संगठन का नेतृत्व किस दिशा में जा रहा है? क्या पुराने सामाजिक सरोकार और उद्यमियों के सामूहिक हित पीछे छूट रहे हैं? और सांसद व कारोबारी के बीच कथित दूरी के पीछे महज कारोबारी मतभेद हैं या इसके पीछे संगठनात्मक और राजनीतिक समीकरण भी हैं?
आरोप गंभीर हैं, लेकिन अंतिम सच दस्तावेज, संबंधित पक्षों के जवाब और निष्पक्ष जांच से ही सामने आएगा। फिलहाल सवाल कई हैं सांसद खामोश क्यों हैं? कारोबारी पक्ष क्या कहता है? एसिया की पुरानी परंपरा क्यों टूटी? और औद्योगिक भूखंडों को लेकर उठ रहे सवालों का जवाब कौन देगा?
धैर्य रखिए… कहानी अभी बाकी है।

