लेखक: राष्ट्र संवाद संवाददाता
स्थानीय विस्थापित परिवारों की एक बैठक गम्हरिया प्रखंड के रापचा पंचायत भवन में सम्पन्न हुई। बैठक की अध्यक्षता बोकेश्वर महतो ने किया। उक्त बैठक में प्रखंड के बादूबाद, सिधाडीह, कालिकापुर, ऊपरबेड़ा गांव के विस्थापित समेत सीतारामपुर डैम विस्थापित फाउंडेशन समिति और टाटा-कांड्रा रोड के विस्थापित परिवार के सदस्य शामिल हुए।
इस मौके पर विस्थापितों की समस्याओं, उनके अधिकारों, रोजगार, मुआवजा, पुनर्वास तथा क्षेत्र के विकास से जुड़े विभिन्न विषयों पर चर्चा की गई। इस दौरान उपस्थित लोगों ने विस्थापित परिवारों के हितों की रक्षा के लिए एकजुट होकर संघर्ष करने तथा संगठन को मजबूत बनाने पर जोर दिया।
बैठक में मुख्य रूप से मौजूद झारखंड आंदोलनकारी हरमोहन महतो ने कहा कि विस्थापित परिवारों को उनके संवैधानिक एवं कानूनी अधिकार दिलाने के लिए संगठित प्रयास आवश्यक हैं। उन्होंने सभी ग्रामीणों एवं विस्थापित परिवारों से एकजुट होकर अपनी आवाज़ बुलंद करने तथा आगामी कार्यक्रमों में सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करने की अपील की।
इस मौके पर विस्थापितों की लंबित समस्याओं को संबंधित प्रशासन एवं कंपनी प्रबंधन के समक्ष प्रभावी ढंग से उठाए जाने और सभी विस्थापितों गांवों में जनजागरूकता अभियान चलाकर अधिक से अधिक विस्थापित परिवारों को संगठन से जोड़ने का निर्णय लिया गया।
विस्थापित परिवारों की मांगें और आगे की रणनीति
गम्हरिया प्रखंड के अंतर्गत आने वाले इन गांवों के विस्थापित लंबे समय से अपने हक की लड़ाई लड़ रहे हैं। सीतारामपुर डैम परियोजना और टाटा-कांड्रा सड़क परियोजना के लिए अधिग्रहित जमीन के एवज में उचित मुआवजा, पुनर्वास पैकेज और परिवार के एक सदस्य को नौकरी की मांग प्रमुख है। बैठक में वक्ताओं ने कहा कि पूर्व में किए गए वादे पूरे नहीं हुए हैं, जिससे ग्रामीणों में रोष व्याप्त है। हरमोहन महतो ने स्पष्ट किया कि अब आश्वासन नहीं, ठोस कार्रवाई चाहिए। उन्होंने भारत के भूमि अधिग्रहण कानून और झारखंड की विस्थापन नीति का हवाला देते हुए कहा कि कानून विस्थापितों के पक्ष में है, बस उसे लागू कराने की इच्छाशक्ति प्रशासन में होनी चाहिए।
इस क्षेत्र में औद्योगिकरण और बुनियादी ढांचे के विकास के नाम पर हजारों एकड़ जमीन ली गई, लेकिन विस्थापित परिवारों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति में सुधार नहीं हुआ। रोजगार के अभाव में युवा पलायन को मजबूर हैं। बैठक में यह निर्णय लिया गया कि अगर प्रशासन और कंपनी प्रबंधन 30 दिनों के भीतर वार्ता के लिए आगे नहीं आते हैं, तो चरणबद्ध आंदोलन शुरू किया जाएगा। इसमें धरना-प्रदर्शन, सड़क जाम और अनशन जैसे कदम शामिल होंगे। संगठन को मजबूत करने के लिए हर गांव में कमेटी गठित की जाएगी।
प्रशासनिक उदासीनता और कानूनी अधिकार
झारखंड राज्य में विस्थापन एक ज्वलंत मुद्दा रहा है। संथाल परगना से लेकर कोयलांचल तक की कहानी कमोबेश एक जैसी है। रापचा पंचायत के इन गांवों की स्थिति भी अलग नहीं है। ग्रामीणों का आरोप है कि मुआवजा निर्धारण में पारदर्शिता नहीं बरती गई। कई परिवारों को आज तक पुनर्वास स्थल पर मूलभूत सुविधाएं जैसे पानी, बिजली, सड़क और स्कूल मुहैया नहीं कराई गई हैं। बोकेश्वर महतो ने अध्यक्षीय संबोधन में कहा कि हम विकास के विरोधी नहीं हैं, लेकिन विकास की कीमत गरीब आदिवासी-मूलवासी ही क्यों चुकाएं? उन्होंने झारखंड सरकार से मांग की कि विस्थापन आयोग का गठन कर लंबित मामलों का त्वरित निपटारा किया जाए।
बैठक में उपस्थित महिला प्रतिनिधियों सबिता महतो और वीणा महतो ने कहा कि विस्थापन का दंश महिलाएं सबसे ज्यादा झेलती हैं। आजीविका के साधन छिन जाने से परिवार चलाना मुश्किल हो गया है। उन्होंने रोजगार सृजन योजनाओं को विस्थापित बहुल गांवों में प्राथमिकता के आधार पर चलाने की मांग की। संजय मंडल, मनोज महाली, लखन महाली समेत अन्य युवा नेताओं ने संगठन का विस्तार डिजिटल माध्यमों से भी करने का सुझाव दिया, ताकि ज्यादा से ज्यादा युवा जुड़ सकें।
इस मौके पर संजय मंडल, मनोज महाली, लखन महाली, सबिता महतो, वीणा महतो, भरत मंडल, अजय मार्डी, बाबूलाल मार्डी, आशीष हांसदा, शिशिर मंडल, महादेव महतो, राकेश महाली समेत काफी संख्या में ग्रामीण उपस्थित थे।

