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    Home » सत्तनकुलम कस्टोडियल डेथ: 9 पुलिसकर्मियों को फांसी | राष्ट्र संवाद
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    सत्तनकुलम कस्टोडियल डेथ: 9 पुलिसकर्मियों को फांसी | राष्ट्र संवाद

    Devanand SinghBy Devanand SinghApril 8, 2026No Comments3 Mins Read
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    तमिलनाडु के ‘सत्तनकुलम कस्टोडियल डेथ’ केस में 9 पुलिसकर्मियों को मौत की सजा। जयराज और बेनिक्स को मिले ऐतिहासिक न्याय पर ‘राष्ट्र संवाद’ का संपादकीय पढ़ें।

    राष्ट्र संवाद डेस्क
    तमिलनाडु (इंद्र यादव) मदुरै की अदालत का हालिया फैसला भारतीय न्याय व्यवस्था के इतिहास में एक मील का पत्थर बनकर उभरा है। सत्तनकुलम कस्टोडियल डेथ केस में 9 पुलिसकर्मियों को मौत की सजा सुनाना न सिर्फ एक कानूनी निर्णय है, बल्कि यह उस भरोसे की पुनर्स्थापना भी है, जो आम नागरिक कानून और व्यवस्था से अपेक्षा करता है। वर्दी, जो सुरक्षा और सेवा का प्रतीक मानी जाती है, जब भय और अत्याचार का माध्यम बन जाए, तब ऐसे कठोर फैसले ही व्यवस्था को संतुलित करते हैं।
    19 जून 2020 की घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया था। 59 वर्षीय जयराज और उनके पुत्र बेनिक्स के साथ जो हुआ, वह केवल पुलिसिया ज्यादती नहीं, बल्कि मानवता पर सीधा प्रहार था। एक मामूली आरोप—दुकान कुछ मिनट अधिक खुली रहने का—इतना भयावह रूप ले लेगा, इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। थाने के भीतर जिस तरह की बर्बरता सामने आई, उसने यह सवाल खड़ा किया कि क्या कानून के रखवाले खुद कानून से ऊपर हो गए हैं?

    सत्तनकुलम कस्टोडियल डेथ
    अदालत में पेश गवाहियों और पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने उस रात की क्रूरता को उजागर कर दिया। शरीर पर दर्जनों घाव, अमानवीय व्यवहार और अंततः दोनों की मौत—यह सब किसी सभ्य समाज के लिए कलंक से कम नहीं। ऐसे में एक महिला कॉन्स्टेबल का साहसिक बयान और समाज की जागरूकता इस मामले को न्याय तक पहुंचाने में निर्णायक साबित हुई।
    अदालत द्वारा इंस्पेक्टर से लेकर कॉन्स्टेबल तक सभी दोषियों को कठोर सजा देना यह स्पष्ट करता है कि कानून की नजर में कोई भी बड़ा या छोटा नहीं है। यह फैसला उन सभी के लिए चेतावनी है जो सत्ता या पद के मद में अपने अधिकारों का दुरुपयोग करते हैं। साथ ही, यह आम जनता के लिए एक संदेश भी है कि अन्याय के खिलाफ आवाज उठाना व्यर्थ नहीं जाता।
    राष्ट्र संवाद संपादकीय आलेख यह भी रेखांकित करता है कि पुलिस सुधार और जवाबदेही की दिशा में अभी बहुत काम किया जाना बाकी है। केवल सजा देना पर्याप्त नहीं, बल्कि ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए संस्थागत बदलाव जरूरी हैं। प्रशिक्षण, निगरानी और पारदर्शिता को और मजबूत करना होगा।
    जयराज और बेनिक्स की मौत एक ऐसी त्रासदी है, जिसे भुलाया नहीं जा सकता। लेकिन यह फैसला यह विश्वास जरूर जगाता है कि न्याय देर से ही सही, मिलता जरूर है। समाज और व्यवस्था दोनों के लिए यह समय आत्ममंथन का है—ताकि ‘रक्षक’ हमेशा ‘रक्षक’ ही बना रहे, ‘भक्षक’ न बनने पाए।

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