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    Home » मुंबई में गैस किल्लत: भूखे सोने को मजबूर मजदूर परिवार
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    मुंबई में गैस किल्लत: भूखे सोने को मजबूर मजदूर परिवार

    Devanand SinghBy Devanand SinghMarch 17, 2026No Comments4 Mins Read
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    मुंबई में गैस किल्लत
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    मुंबई पर यह ग्राउंड रिपोर्ट।और ठाणे में गैस किल्लत ने मजदूर और गरीब परिवारों की कमर तोड़ दी है। पढ़ें कालाबाजारी, महंगाई और प्रशासन की नाकामी 

    राष्ट्र संवाद
    मुंबई (इंद्र यादव) मुंबई की चकाचौंध और ठाणे की चिमनियों से निकलते धुएं के बीच एक खौफनाक सन्नाटा पसरा है। यह सन्नाटा उन घरों का है जहाँ आज शाम की चाय नहीं बनी और रात की रोटी के लाले पड़ गए हैं। गैस की किल्लत ने केवल होटलों की भट्ठियां ही नहीं बुझाईं, बल्कि उन लाखों किरायेदार परिवारों की उम्मीदों पर भी पानी फेर दिया है, जो हर महीने अपनी गाढ़ी कमाई का बड़ा हिस्सा सिर छुपाने की जगह और पेट भरने के राशन पर खर्च करते हैं।

    किराये के कमरे में ‘दोहरी मार’ और ‘तिहरा दर्द’

    एक मजदूर जब गांव छोड़कर मुंबई-ठाणे आता है, तो वह अकेला नहीं होता; उसके साथ उसकी पत्नी के सपने और बच्चों का भविष्य होता है। आज स्थिति यह है!
    ब्लैक मार्केटिंग का बोझ: सरकारी रेट पर सिलेंडर न मिलने के कारण मजबूरन ‘ब्लैक’ में कई हजार रुपये देने पड़ रहे हैं। एक मजदूर जिसकी दिहाड़ी ही 400-500 रुपये है, वह तीन दिन की कमाई सिर्फ एक सिलेंडर पर कैसे फूंक दे!
    मकान मालिक का दबाव: कई चालों में मकान मालिक गैस कनेक्शन के नाम पर अतिरिक्त पैसे वसूलते हैं। किल्लत के इस दौर में मजदूरों को धमकाया जा रहा है— “गैस नहीं है तो बाहर जाकर खाओ, कमरे में कोयला मत जलाओ।” लेकिन बाहर खाने की हैसियत इस मजदूर की नहीं है।

    ममता की अग्निपरीक्षा और धुएं में घुटता बचपन

    घर की महिलाओं के लिए यह दौर किसी त्रासदी से कम नहीं है। गैस न मिलने पर वे पुराने दौर की तरफ मुड़ने को मजबूर हैं, लेकिन मुंबई की ‘चाल’ में वह भी मुमकिन नहीं।
    स्वास्थ्य का संकट: 10×10 के उस छोटे से कमरे में जहाँ एक खिड़की तक ढंग से नहीं खुलती, वहाँ कोयला या लकड़ी जलाना किसी ‘धीमे जहर’ से कम नहीं है।
    बच्चों की पढ़ाई और भूख: “कल स्कूल जाना है, माँ टिफिन में क्या दोगी?” इस मासूम सवाल का जवाब उस माँ के पास नहीं है जिसके पास गैस का खाली सिलेंडर एक कोने में पड़ा है। बच्चे खाली पेट सो रहे हैं और माँ रात भर जागकर अगले दिन की कतार के बारे में सोच रही है।

    ‘टिफिन कल्चर’ पर ताला: कारखानों में खाली पेट काम

    ठाणे के औद्योगिक क्षेत्रों (MIDC) की जान यहाँ का ‘टिफिन’ है। हजारों मजदूर सुबह अपने घर से जो टिफिन लेकर निकलते हैं, वही उनकी दिनभर की ऊर्जा का स्रोत होता है।
    भूखा मजदूर, कमजोर नींव: जब घर में चूल्हा ही नहीं जला, तो टिफिन खाली रहा। खाली पेट भारी मशीनों पर काम करना न केवल मुश्किल है, बल्कि खतरनाक भी है। हादसे बढ़ रहे हैं क्योंकि मजदूर का ध्यान काम पर कम और घर की ‘खाली हांडी’ पर ज्यादा है।

    सत्ता की चौखट पर खड़े तीखे सवाल

    प्रशासन और तेल कंपनियों की चुप्पी यह दर्शाती है कि उन्हें इस ‘जमीनी हकीकत’ से कोई सरोकार नहीं है।

    “अमीर बनाम गरीब: बड़े टावरों में रहने वालों के लिए पाइपलाइन (PNG) की निर्बाध सप्लाई है, तो फिर सिर्फ झोपड़पट्टियों और चालों के हिस्से में ही ये ‘कतारें’ क्यों आईं” – श्री रामधनी शर्मा

    सब्सिडी का छलावा: सब्सिडी के पैसे खाते में आने की बात कही जाती है, पर जब गैस ही नहीं मिल रही, तो वह सब्सिडी किस काम की? क्या यह सिर्फ कागजी विकास है” – श्री जयराम वालनकर

    “कालाबाजारी का संरक्षण: क्या यह मुमकिन है कि हजारों सिलेंडर गायब हो जाएं और पुलिस या प्रशासन को खबर न हो? यह किल्लत ‘प्राकृतिक’ नहीं, बल्कि ‘मानव निर्मित’ लगती है ताकि बिचौलिए अपनी जेबें गरम कर सकें” – श्री रूपेश तिवारी,दुकानदार

    ज्वालामुखी के मुहाने पर खड़ा शहर

    मुंबई और ठाणे का मजदूर अब ‘लाचार’ नहीं, बल्कि ‘आक्रोशित’ है। इतिहास गवाह है कि जब-जब मजदूर के घर की आग बुझी है, तब-तब सत्ता के गलियारों में हलचल तेज हुई है। यह सिर्फ गैस की कमी नहीं है, यह उस भरोसे की कमी है जो मजदूर ने सरकार पर किया था।

    “साहब” हम शहर बनाते हैं, उसे सजाते हैं। अगर हमें ही भूखा रखोगे, तो यह चमक-धमक ज्यादा दिन नहीं टिकेगी।” — यह चेतावनी नहीं, बल्कि उस हर मजदूर की आवाज़ है जो आज खाली सिलेंडर पकड़े कतार में खड़ा है।

    “महल सजाने वालों के घर आज अंधेरा है, चिराग बुझा है जिसका, वही सवेरा है!”

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