मुक्त हो जाऊं
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कभी – कभी चाहती हूं,
बाहर निकल जाऊं मैं
अपने नाम और पहचान की परिधि से।
मुक्त हो जाऊं ,
अपने होने के अहसास से।
दुनिया भर का दिखावा और
दिखावे से भरी दुनिया के बीच
कसमसाती मेरी समझ अब
क्षण भर नहीं ढोना चाहती
संवेदनाओं की शुष्कता
और तथाकथित संबंधों की बोझिलता ।
अब चेतना चाहती है ,
जीवंतता किसी नदी की ,
निर्भिकता हिमगिरि की
और दृढ़ता किसी पीपल की।
हे प्रकृति, तू गुरु है ,
सीखना है मुझे तुझसे
रखना महफूज खुद को
अपने ही भीतर
बाहरी कोलाहल से बचाकर !
:- डॉ कल्याणी कबीर

