राष्ट्र संवाद की २५ वर्षों की गौरवमयी यात्रा: सत्य और निष्ठा का एक अनूठा उदाहरण
भारतीय समाज में एक प्रसिद्ध उक्ति है— “सत्यमेव जयते” (सत्य की ही जीत होती है)। पत्रकारिता जैसे चुनौतीपूर्ण क्षेत्र में इसी सत्य को आधार बनाकर सफलता के २५ गौरवमयी वर्ष पूरे करना एक विरल उपलब्धि है। जमशेदपुर से प्रकाशित और पत्रकारिता के मूल्यों को सर्वोच्च स्थान देने वाली ‘राष्ट्र संवाद’ पत्रिका ने आज अपनी रजत जयंती (Silver Jubilee) पूर्ण की है। इस लंबी यात्रा में यह समाचार समूह केवल खबरों का संग्रह मात्र नहीं रहा, बल्कि जनहित की एक सशक्त आवाज़ बनकर उभरा है।
मूल्यों की पत्रकारिता और ‘राष्ट्र संवाद’—
पिछले २५ वर्षों से ‘राष्ट्र संवाद’ ने निष्पक्षता और जन-सरोकारों को अपनी प्राथमिकता बनाए रखा है। आज के डिजिटल युग में, जहाँ सूचनाओं की भीड़ में असली सच अक्सर कहीं खो जाता है, राष्ट्र संवाद ने अपने प्रिंट संस्करण, न्यूज पोर्टल और डिजिटल माध्यमों के जरिए समाज को सही दिशा दिखाने का महत्वपूर्ण कार्य किया है। जमशेदपुर (पूर्वी) की विधायिका पूर्णिमा साहु के शब्दों में, इस पत्रिका ने समाज, राष्ट्र और जनहित से जुड़े मुद्दों को हमेशा गरिमापूर्ण ढंग से उठाकर एक सराहनीय भूमिका निभाई है।
संपादक देवानंद सिंह: एक समझौताविहीन कलम योद्धा—
किसी भी संस्थान की सफलता उसके नेतृत्व पर निर्भर करती है। राष्ट्र संवाद के संपादक देवानंद सिंह एक ऐसे व्यक्तित्व हैं, जिनकी प्रतिबद्धता और ईमानदारी आज के युवा पत्रकारों के लिए प्रेरणा का स्रोत है। उनका अटूट विश्वास है कि— “सत्य की पत्रकारिता में समझौते का कोई स्थान नहीं होता।”
व्यक्तिगत रूप से मैं लंबे समय से इस पत्रिका के संपादकीय पृष्ठ (Editorial Page) पर नियमित रूप से लिखता आ रहा हूँ। संपादक महोदय के साथ काम करने के अपने अनुभव से मैं कह सकता हूँ कि वे न केवल एक कुशल संपादक हैं, बल्कि एक अत्यंत भद्र और सहृदय व्यक्ति भी हैं। लेखकों को वे जो सम्मान और प्रोत्साहन देते हैं, वह वास्तव में दुर्लभ है।
संघर्ष और सफलता की गाथा—
३२ पन्नों की एक श्वेत-श्याम (Black & White) मासिक पत्रिका से शुरू हुआ यह सफर आज एक विशाल मीडिया समूह में बदल चुका है। यह यात्रा आसान नहीं थी। आर्थिक चुनौतियों और सामाजिक दबावों को दरकिनार कर, अपनी जमा-पूंजी खर्च करके भी उन्होंने इस पत्रिका को जीवंत बनाए रखा। इसके माध्यम से उन्होंने न केवल पत्रकारिता को आगे बढ़ाया, बल्कि कई लेखकों और कर्मचारियों को प्रोत्साहित कर एक स्वस्थ कार्य-संस्कृति विकसित की।
”भय या किसी को संतुष्ट करने की लालसा का त्याग कर, केवल सत्य के पक्ष में खड़े रहना ही राष्ट्र संवाद का मूल मंत्र है।”
बाधाओं को चीरकर निरंतर प्रगति—
किसी भी महान कार्य की तरह पत्रकारिता के इस काँटों भरे मार्ग में कुछ विशेष बाधाएँ आना स्वाभाविक है। कभी आर्थिक संकट, कभी राजनीतिक दबाव तो कभी सामाजिक चुनौतियां सामने आ सकती हैं। लेकिन राष्ट्र संवाद की यात्रा ने यह सिद्ध कर दिया है कि ऐसी बाधाएं कभी स्थायी नहीं होतीं। सत्य की शक्ति और देवानंद सिंह जी जैसे व्यक्तित्व के दृढ़ संकल्प के सामने कोई भी बाधा टिक नहीं सकती। ये बाधाएं क्षणिक हैं, जबकि राष्ट्र संवाद की निष्ठा और इसकी गौरवमयी यात्रा चिरस्थायी है।
सरकार और प्रबुद्ध वर्ग से एक आह्वान—
किसी एक व्यक्ति द्वारा अपने जुनून और निजी संसाधनों के बल पर एक समाचार पत्र को २५ वर्षों तक निरंतर चलाना कोई साधारण बात नहीं है। पत्रकारिता की इस निर्भीक यात्रा को और अधिक सशक्त बनाने के लिए सरकार और समाज के जागरूक वर्ग का सहयोग अत्यंत आवश्यक है। चूंकि ‘राष्ट्र संवाद’ सदैव समाज का दर्पण बना रहा है, इसलिए मैं तहे दिल से यह चाहता हूँ कि इसे सरकारी स्तर पर प्रोत्साहन और प्रबुद्ध समाज का सक्रिय सहयोग प्राप्त हो। जब समाज और शासन ऐसे संस्थानों का साथ देंगे, तभी लोकतंत्र का यह चौथा स्तंभ और अधिक मजबूत होगा।
निष्कर्ष—
राष्ट्र संवाद आज निर्भीकता का पर्याय बन चुका है। सुधीर कुमार पप्पू जैसे प्रतिष्ठित व्यक्तियों ने भी इसकी सत्यनिष्ठा की सराहना की है। मुझे पूर्ण विश्वास है कि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में राष्ट्र संवाद भविष्य में भी अपनी गरिमा को अक्षुण्ण बनाए रखेगा।
इस शुभ अवसर पर मैं ‘राष्ट्र संवाद’ परिवार को अपनी हार्दिक शुभकामनाएं देता हूँ और श्रद्धेय संपादक देवानंद सिंह जी के प्रति सादर प्रणाम व्यक्त करता हूँ। उनके ओजस्वी नेतृत्व में यह पत्रिका पत्रकारिता के जगत में नित नई ऊंचाइयों को छुए, यही मेरी मंगलकामना है।
मूल लेखिका
मनीषा शर्मा
अनुवादक:– रितेश शर्मा
पता- जलुकबाड़ी, गुवाहाटी

