यूजीसी नियमों पर चुप्पी क्यों? सामान्य वर्ग की अनदेखी या सुनियोजित असमानता जनप्रतिनिधियों और सामाजिक संगठन की चुप्पी पर सवाल
राष्ट्र संवाद संवाददाता
जमशेदपुर/झारखंड यूजीसी द्वारा 13 जनवरी 2026 को लाए गए नए नियम, जिसे 15 जनवरी 2026 से लागू कर दिया गया, को लेकर अब गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। यह नियम सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद बनाया गया, जिसमें यूजीसी के साथ सभी दलों के विपक्षी प्रतिनिधि भी शामिल थे। बावजूद इसके, नियम लागू होने के बाद अब तक केवल 8 प्रतिशत शिकायतें दर्ज होना अपने आप में कई संदेहों को जन्म देता है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि यह नियम सामान्य वर्ग के लिए समान अवसर वाला है या असमानता को संस्थागत रूप देने वाला। कमेटियों के गठन की बात तो हो रही है, लेकिन उनमें सामान्य वर्ग के प्रतिनिधित्व को लेकर कोई स्पष्टता नहीं है।
यूजीसी के इस नियम का सच सामने आने से आखिर नेता और मुख्यधारा की मीडिया क्यों बच रही है, यह प्रश्न आम युवाओं के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है।
जनप्रतिनिधियों की चुप्पी पर सवाल
झारखंड, विशेषकर जमशेदपुर के जनप्रतिनिधियों की इस मुद्दे पर चुप्पी को संदेह की नजर से देखा जा रहा है। सांसद विद्युत वरण महतो, विधायक सरयू राय, विधायक पूर्णिमा साहू, पूर्व मंत्री बन्ना गुप्ता सहित कई प्रभावशाली राजनीतिक चेहरे अब तक इस पर खुलकर सामने नहीं आए हैं।
इतना ही नहीं, सामाजिक संगठनों के प्रमुख चेहरों—पूर्व पुलिस उपाध्यक्ष कमल किशोर, शंभू सिंह, चंद्रगुप्त सिंह, रामबाबू तिवारी, विकास सिंह, अनिल ठाकुर, अप्पू तिवारी, सुबोध श्रीवास्तव और नटू झा—की चुप्पी भी युवाओं के बीच अविश्वास को बढ़ा रही है।
बंटवारे की राजनीति या अधिकारों का हनन?
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते स्पष्टता नहीं लाई गई, तो यह मामला समाज में बंटवारे और अविश्वास को जन्म दे सकता है। ऐसे में यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या S4 का गठन सही और संतुलित तरीके से हो पाएगा।
ब्राह्मण समाज, ब्रह्मर्षि समाज, चित्रगुप्त समाज और क्षत्रिय समाज के लिए यह समय केवल प्रतिक्रिया का नहीं, बल्कि गंभीर मंथन और एकजुट निर्णय का है।
अब देखना यह है कि यूजीसी नियमों पर फैली चुप्पी कब टूटती है और जनप्रतिनिधि व सामाजिक नेतृत्व कब जनता को स्पष्ट जवाब देते हैं।

